Āraṇyaka Parva, Adhyāya 233 — Pandavas Mobilize; Arjuna’s Conciliation and the Onset of Combat
षष्ठीप्रियश्व धर्मात्मा पवित्रो मातृवत्सल: । कन्याभर्ता विभक्तश्च स्वाहेयो रेवतीसुत:,मार्कण्डेयजी बोले--राजन्! आग्नेय, स्कन्द, दीप्तकीर्ति, अनामय, मयूरकेतु, धर्मात्मा, भूतेश, महिषमर्दन, कामजित, कामद, कान्त, सत्यवाक्, भुवनेश्वर, शिशु, शीघ्र, शुचि, चण्ड, दीप्तवर्ण, शुभानन, अमोघ, अनघ, रौद्र, प्रिय, चन्द्रानन, दीप्तशक्ति, प्रशान्तात्मा, भद्गरकृत, कूटमोहन, षष्ठीप्रिय, धर्मात्मा, पवित्र, मातृवत्सल, कन्याभर्ता, विभक्त, स्वाहेय, रेवतीसुत, प्रभु, नेता, विशाख, नैगमेय, सुदुश्चर, सुव्रत, ललित, बाल- क्रीडनकप्रिय, आकाशचारी, ब्रह्मचारी, शूर, शंखणोद्धव, विश्वामित्रप्रिय, देवसेनाप्रिय, वासुदेवप्रिय, प्रिय और प्रियकृत--ये कार्तिकेयजीके दिव्य नाम हैं। जो इनका पाठ करता है, वह धन, कीर्ति तथा स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है
ṣaṣṭhīpriyaśva dharmātmā pavitro mātṛvatsalaḥ | kanyābhartā vibhaktaś ca svāheyo revatīsutaḥ ||
Mārkaṇḍeya said: “O King, (Skanda) is called ‘He who loves the sixth (lunar day)’, ‘righteous-souled’, ‘pure’, and ‘affectionate to mothers’. He is also known as ‘protector of maidens’, ‘the distinct/separate one’, ‘son of Svāhā’, and ‘son of Revatī’.”
मार्कण्डेय उवाच