Adhyāya 227: Duryodhana’s Deliberation and the Ghoṣa-yātrā Pretext
Dvaita-vana
अग्निर्भूत्वा नैगमेयश्छागवक्त्रो बहुप्रज: । रमयामास शैलस्थं बालं॑ क्रीडनकैरिव,वेदप्रतिपादित अग्नि बकरेका-सा मुख बनाकर अनेक संतानोंके साथ उपस्थित हो पर्वतशिखर पर निवास करनेवाले बालक स्कन्दका इस प्रकार मन बहलाने लगे, मानो उन्हें खिलौनोंसे खेला रहे हों
मार्कण्डेय उवाच