Skanda-janma: Śivā/Svāhā, Agni, and the Manifestation of Guha
Mahābhārata 3.214
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्त: सुखं स्वपेत् । निवाते वा यथा दीपो दीप्येत् कुशलदीपित:,जैसे भोजन आदिसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे सोता है और जैसे वायुरहित स्थानमें चतुर मनुष्यके द्वारा जलाया हुआ दीप निश्चलभावसे प्रकाशित होता है; ऐसा ही लक्षण चित्तकी पवित्रताका भी है
व्याध उवाच