Dvārakā’s Distress and the Saubha Engagement (द्वारकाव्यग्रता तथा सौभयुद्धम्)
ततः शतघ्नीश्ष महागदाश्ष दीप्तांक्ष शूलान् मुसलानसीं श्व॒ चिक्षेप रोषान्मयि मन्दबुद्धि: शाल्वो महाराज जयाभिकाडुक्षी,महाराज! वहाँसे विजयकी इच्छा रखनेवाले मन्दबुद्धि शाल्वने क्रोधमें भरकर मेरे ऊपर शतघ्नियाँ, बड़ी-बड़ी गदाएँ, प्रजजलित शूल, मुसल और खड्ग फेंके
वायुदेव उवाच