Plakṣāvataraṇa–Yamunā Tīrtha and Prajāpati’s Vedī
Kurukṣetra Threshold
अत्रैव नाहुषो राजा राजन् क्रतुभिरिष्टवान् । ययातिर्बहुरत्नौधैर्यत्रेन्द्रो मुदमभ्यगात्,राजन्! नहुषनन्दन राजा ययातिने यहीं प्रचुर रत्नराशिकी दक्षिणासे युक्त अनेक यज्ञोंद्वारा भगवानका यजन किया था। उन यज्ञोंमें इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई थी
लोगश उवाच