Svargārohaṇa-parva Adhyāya 2 — Yudhiṣṭhira’s Inquiry for His Kin and the Vision of a Punitive Realm
स ता गिर: पुरस्ताद वै श्रुतपूर्वा पुन: पुन: । ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानत पाण्डव:,महान् कष्ट और दु:खमें पड़े हुए प्राणियोंकी वे ही पहलेकी सुनी हुई करुणाजनक बातें सामनेकी ओरसे बारंबार उनके कानोंमें पड़ने लगीं तो भी वे पाण्डुकुमार उन्हें पहचान न सके
वैशम्पायन उवाच