धृतराष्ट्रविलापः — Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Inquiry (Śalya-parva, Adhyāya 2)
कि पुन: सहिता वीरा: कृतवैराश्न पाण्डवै: । “महाराज! मेरे इन सहयोगियोंमेंसे एक-एक वीर भी समरांगणमें कुपित होकर मुझपर आक्रमण करनेवाले समस्त पाण्डवोंको रोकनेमें समर्थ हैं। फिर यदि पाण्डवोंके साथ वैर रखनेवाले ये सारे वीर एक साथ होकर युद्ध करें तब क्या नहीं कर सकते
धघतयाट्र उवाच