तावन्योन्यं शरै: संख्ये संछाद्य सुमहारथै: । पुनः पूर्णायतोत्सूष्टविंव्यघाते परस्परम्,वे दोनों विशाल रथपर आरूढ़ हो युद्धसस््थलमें एक-दूसरेको अपने बाणोंद्वारा आच्छादित करके पुनः धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा परस्पर आघात- प्रत्याघात करने लगे
संजय उवाच