Droṇa-parva Adhyāya 114 — Karṇa–Bhīmasena Missile Exchange, Disarmament, and Arjuna’s Intervention
जब वे पी चुके तो उन्हें टहलाया और नहलाया गया। उसके बाद दाना और चारा खिलाया गया। फिर उन्हें सब प्रकारसे सुसज्जित किया गया। उनके अंगोंमें गड़े हुए बाण पहले ही निकाल दिये गये थे। वे चारों घोड़े सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे। उन योग्य अश्वोंकी कान्ति सुवर्णके समान थी। वे सुशिक्षित और शीघ्रगामी थे। उनके मनमें हर्ष और उत्साह था। तनिक भी व्यग्रता नहीं थी। उन्हें विधिपूर्वक सजाया गया था। स्वर्णमय अलंकारोंसे अलंकृत उन अभश्वोंको सारथिने विधिपूर्वक रथमें जोता। वह रथ सुवर्णमय केशरोंसे सुशोभित सिंहके चिह्लवाले विशाल ध्वजसे सम्पन्न था। मणियों और मूँगोंसे चित्रित सोनेकी शलाकाओंसे शोभायमान एवं श्वेत पताकाओंसे अलंकृत था। उस रथके ऊपर स्वर्णमय दण्डसे विभूषित छत्र तना हुआ था तथा रथके भीतर नाना प्रकारके शस्त्र तथा अन्य आवश्यक सामान रखे गये थे ।। ५५-- ५९ || दारुकस्यानुजो भ्राता सूतस्तस्य प्रिय: सखा । न्यवेदयद् रथं युक्त वासवस्येव मातलि:,जैसे मातलि इन्द्रका सारथि और सखा भी है, उसी प्रकार दारुकका छोटा भाई सात्यकिका सारथि और प्रिय सखा था। उसने सात्यकिको यह सूचना दी कि रथ जोतकर तैयार है
sañjaya uvāca | dārukasya anujo bhrātā sūtas tasya priyaḥ sakhā | nyavedayad rathaṃ yuktaṃ vāsavasyeva mātaliḥ ||
Sañjaya said: Dāruka’s younger brother—who served as Sātyaki’s charioteer and was also his dear companion—reported that the chariot had been properly yoked and made ready, just as Mātali, both charioteer and trusted friend of Vāsava (Indra), would do. The scene underscores disciplined preparedness in war: careful readiness and loyal service are treated as ethical duties that sustain a warrior’s resolve and effectiveness.
संजय उवाच