अविध्यद् दशभिर्भ॑ष्म॑ छिन्नधन्वानमाहवे । सारथिं दशभिश्चास्य ध्वजं चैकेन चिच्छिदे,अताडयन् रणे भीष्मं सहिता: सर्वसृञज्जया: । समस्त सूंजय वीर एक साथ संगठित हो भयंकर शतघ्नी, परिघ, फरसे, मुद्गर, मुसल, प्रास, गोफन, स्वर्णमय पंखवाले बाण, शक्ति, तोमर, कम्पन, नाराच, वत्सदन््त और भुशुण्डी आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा रणभूमिमें भीष्मको सब ओरसे पीड़ा देने लगे भीष्मजीका धनुष कट गया था। उसी अवस्थामें अर्जुनसे सुरक्षित शिखण्डीने दस बाणोंसे उन्हें और दस बाणोंसे उनके सारथिको भी घायल कर दिया। तत्पश्चात् एक बाणसे ध्वजको काट गिराया। तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले गंगानन्दन भीष्मने दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर तीखे बाणोंसे अर्जुनको घायल करना आरम्भ किया। यह देख अर्जुनने उस धनुषको भी तीन पैने बाणोंद्वारा काट डाला
sañjaya uvāca | avidhyad daśabhir bhīṣmaṃ chinnadhanvān amāhave | sārathiṃ daśabhiś cāsya dhvajaṃ caikena cicchide |
Sañjaya said: In the battle, Śikhaṇḍin struck Bhīṣma—whose bow had been cut—with ten arrows. He also pierced Bhīṣma’s charioteer with ten arrows, and with a single arrow he severed the banner. The scene underscores the ruthless mechanics of war: once a warrior is disarmed, the fight turns into a contest of protection, vulnerability, and tactical advantage, even against a venerable elder like Bhīṣma.
संजय उवाच