Mind as Charioteer; Kṣetrajña, Tapas, and Dhyāna-Yoga
Adhyātma-Upadeśa
सम॑ संज्ञानुगश्वचैव स सर्वत्र व्यवस्थित: । उपभुड्धक्ते सदा सत्त्वमप: पुष्करपर्णवत्,वह क्षेत्रज्ञ समभावसे सर्वत्र भलीभाँति स्थित हुआ ज्ञानका अनुसरण करता है। जैसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रटरकर जलको धारण करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ सदा सत्त्वका उपभोग करता है
वायुदेव उवाच