अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति
Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence
यथा हवाहवनीयोड<ग्निर्गा्हपत्यात् प्रणीयते । तथा त्वत्त: प्रसूतो5यं त्वमेक: सन् द्विधा कृत:,जैसे गार्हपत्य अग्निसे आहवनीय अग्निका प्रणयन (प्राकट्य) होता है, उसी प्रकार यह बालक आपसे उत्पन्न हुआ है, मानो आप एक होकर भी अब दो रूपोंमें प्रकट हो गये हैं। राजन! आजसे कुछ वर्ष पहले आप शिकार खेलने वनमें गये थे। वहाँ एक हिंसक पशुके पीछे आकृष्ट हो आप दौड़ते हुए मेरे पिताजीके आश्रमपर पहुँच गये, जहाँ मुझ कुमारी कन्याको आपने गान्धर्व विवाहद्वारा पत्नीरूपमें प्राप्त किया
yathā havāhavānīyo 'gnir gārhapatyāt praṇīyate | tathā tvattaḥ prasūto 'yaṃ tvam ekaḥ san dvidhā kṛtaḥ ||
Duṣyanta said: “Just as the Āhavanīya fire is brought forth from the Gārhapatya fire, so has this child been born from you. Though you are one, you now appear as two—yourself and your son.”
दुष्यन्त उवाच