अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति
Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence
आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्न । अहमभ्न रात्रिश्ष॒ उभे च संध्ये धर्मश्न जानाति नरस्य वृत्तम्,'सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, जल, हृदय, यमराज, दिन, रात, दोनों संध्याएँ और धर्म--ये सभी मनुष्यके भले-बुरे आचार-व्यवहारको जानते हैं
दुष्यन्त उवाच