Śakuntalā’s Satya-Discourse and the Recognition of Bharata (शकुन्तला–सत्योपदेशः; भरतप्रतिग्रहः)
अपन बक। है २ >> $. दूरवर्ती शत्रुपर गदा फेंकना 'प्रक्षे' कहलाता है। २. समीपवर्ती शत्रुपर गदाकी कोटिसे प्रहार करना “विक्षेप” कहा गया है। ३. जब शत्रु बहुत हों तो सब ओर गदाको घुमाते हुए शत्रुओंपर उसका प्रहार करना “परिक्षेप” है। ४. गदाके अग्रभागसे मारना “अभिक्षेप” कहलाता है। एकोनसप्ततितमो<ध्याय: दुष्पन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना जनमेजय उवाच सम्भवं भरतस्याहं चरितं च महामते: । शकुन्तलाय श्रोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः,जनमेजय बोले--ब्रह्मन! मैं परम बुद्धिमान् भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथा शकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसंगको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ
Janamejaya uvāca—sambhavaṃ Bharatasya ahaṃ caritaṃ ca mahāmate | Śakuntalāyāḥ utpattiṃ śrotum icchāmi tattvataḥ ||
Janamejaya said: “O great-minded sage, I wish to hear in truth the birth of Bharata and the account of his life, and also the circumstances of Śakuntalā’s origin.”
जनमेजय उवाच