शृङ्गिशापः—तक्षककाश्यपसंवादः (Śṛṅgī’s Curse and the Takṣaka–Kāśyapa Dialogue)
तत्र चोत्पत्स्यते जन्तुर्भवतां तारणाय वै । शाश्वताश्चाव्ययाश्वैव तिष्ठन्तु पितरो मम,वैसे विवाहसे जो पत्नी मिलेगी, उसीके गर्भसे आपलोगोंको तारनेके लिये कोई प्राणी उत्पन्न होगा। मैं चाहता हूँ मेरे पितर नित्य शाश्वत लोकोंमें बने रहें, वहाँ वे अक्षय सुखके भागी हों
तक्षक उवाच