अर्जुनस्य तीर्थयात्रा तथा मणलूर-सम्बन्धः
Arjuna’s Pilgrimage and the Maṇalūra Alliance
कथयामास कृष्णायै भगवन्तमुपस्थितम् | श्रुत्वैतद् द्रौपदी चापि शुचिर्भूत्वा समाहिता,फिर आशीर्वादसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करके बोले--“तुम भी बैठो।” नारदकी आज्ञा पाकर राजा युधिष्छिर बैठे और कृष्णाको कहला दिया कि स्वयं भगवान् नारदजी पधारे हैं। यह सुनकर द्रौपदी भी पवित्र एवं एकाग्रचित हो उसी स्थानपर गयी, जहाँ पाण्डवोंके साथ नारदजी विराजमान थे। धर्मका आचरण करनेवाली कृष्णा देवर्षिके चरणोंमें प्रणाम करके अपने अंगोंको ढके हुए हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। धर्मात्मा एवं सत्यवादी मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारदने राजकुमारी द्रौपदीको नाना प्रकारके आशीर्वाद देकर उस सती-साध्वी देवीसे कहा, “अब तुम भीतर जाओ।' कृष्णाके चले जानेपर भगवान् देवर्षिने एकान्तमें युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंसे कहा
kathayāmāsa kṛṣṇāyai bhagavantam upasthitam | śrutvaitad draupadī cāpi śucir bhūtvā samāhitā ||
Vaiśampāyana said: He informed Kṛṣṇā (Draupadī) that the venerable one had arrived and was present. Hearing this, Draupadī too became purified in mind and, composed and attentive, prepared to approach—signaling the proper dharmic response of reverence and self-restraint upon the coming of a great sage.
वैशम्पायन उवाच