Kuvalāśva’s Lineage and Uttaṅka’s Petition concerning Dhundhu (धुन्धु-प्रसङ्गः)
अथीनां राजे पितादादब्रवीच्चैनामेनं राजानं शुश्रूषस्वेति,ै है ॥ है ५ । 9 /“३| पर ५ | कट शक बः #म ०. किन ७-८ »* *_ | पक” आर. जे क््बुटूप््> पप - २ ुत--+काज पा आल व रा ७” ५७ ८७,५२० ञ ययातिसे ब्राह्णकी याचना “तब पिता मण्डूकराजने अपनी पुत्री सुशोभना महाराज परीक्षितको समर्पित कर दी और उससे कहा--'बेटी! सदा राजाकी सेवा करती रहना।' ऐसा कहकर मण्डूकराजने जब अपनी पुत्रीके अपराधको याद किया, तब उसे क्रोध हो आया और उसने उसे शाप देते हुए कहा--“अरी! तूने बहुत-से राजाओंको धोखा दिया है, इसलिये तेरी संतानें ब्राह्मणविरोधी होंगी; क्योंकि तू बड़ी झूठी है”
atha enāṃ rājñe pitā dattābravīc cainām—enaṃ rājānaṃ śuśrūṣasveti ha
Kemudian ayahnya, sang raja katak, menyerahkan Suśobhanā kepada raja dan berpesan: “Anakku, layani raja ini senantiasa dengan setia.”
वैशम्पायन उवाच