समुद्रदर्शनं दैत्यपुरोपगमनं च
Ocean Vision and Approach to the Daitya City
स शैलमासाद्य किरीटमाली महेन्द्रवाहादवरुह्म तस्मात् । धौम्यस्य पादावभिवाद्य धीमा- नजातशत्रोस्तदनन्तरं च,पर्वतपर पहुँचकर बुद्धिमान् किरीटधारी अर्जुन देवराज इन्द्रके उस दिव्य रथसे उतर पड़े। उस समय सबसे पहले उन्होंने महर्षि धौम्यके दोनों चरणोंमें मस्तक झुकाया। तदनन्तर अजातशत्रु युधिष्ठिर तथा भीमसेनके चरणोंमें प्रणाम किया। इसके बाद नकुल और सहदेवने आकर अर्जुनको प्रणाम किया तत्पश्चात् द्रौपदीसे मिलकर अर्जुनने उसे बहुत आश्वासन दिया और अपने भाई युधिष्ठिरके समीप आकर वे विनीत भावसे खड़े हो गये
sa śailam āsādya kirīṭamālī mahendrāvāhād avaruhya tasmāt | dhaumyasya pādāv abhivādya dhīmān ajātaśatroḥ tad-anantaraṃ ca ||
Setibanya di gunung, Arjuna yang bermahkota—bijak dan terkendali—turun dari kereta ilahi Mahendra. Mula-mula ia menundukkan kepala di kaki resi Dhaumya; sesudah itu ia memberi hormat pula kepada Ajātaśatru, Yudhiṣṭhira.
वैशम्पायन उवाच