Adhyaya 141
Anushasana ParvaAdhyaya 14127 Verses

Adhyaya 141

अत्रेः तपोबलप्रकाशः तथा च्यवनस्य सोमाधिकारः (Atri’s Illumination by Tapas; Cyavana and Soma-Entitlement)

Upa-parva: Ṛṣi-karmānukīrtana (Exempla of Sage-Acts: Atri and Cyavana)

This adhyāya is presented as a narrated instruction: after a prompt to “listen” (śṛṇu), the account first depicts devas and dānavas engaged amid oppressive darkness (tamas), with Svarbhānu striking the Moon and Sun, resulting in the devas’ vulnerability. The devas encounter the ascetic Atri in the forest and petition protection; Atri, described as self-controlled and tranquil, generates illumination through tapas, restoring visibility and enabling the devas’ strategic recovery against the opposing host. The discourse then pivots to Cyavana: he insists that the Aśvins be permitted to drink Soma alongside the devas. Indra objects on grounds of exclusion and non-recognition; Cyavana threatens coercive consequence and initiates ritual action. Indra advances with a mountain and vajra but is immobilized by Cyavana’s ascetic potency; Cyavana manifests a formidable ‘Mada’ (intoxicating force) that compels the devas to negotiate. Indra submits; the Aśvins gain Soma-rights. Finally, Cyavana retracts and apportions ‘mada’ into gambling, hunting, drinking, and sexual excess, concluding with an explicit warning that these lead to human ruin and should be avoided. The chapter thus links cosmic order, ritual entitlement, and personal ethics through exemplary jurisprudence and restraint.

Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न उठता है—हव्य-कव्य के प्रतिग्रह और नाना प्रकार के भोज्य पदार्थों के सेवन/ग्रहण में ब्राह्मणों पर जो पाप-छाया पड़ती है, उससे मुक्ति का निश्चित प्रायश्चित्त क्या है? → भीष्म क्रमशः उन पदार्थों की सूची और उनके अनुसार शुद्धि-विधान बताते हैं—कहीं त्रिसंध्या स्नान, कहीं जप-होम, कहीं विशेष शान्ति; और यह भी कि श्राद्ध-अन्न, कृष्णपक्ष, अपराह्न-काल आदि के नियम क्यों नियत हैं। नियमों की सूक्ष्मता बढ़ती जाती है, क्योंकि एक ही ‘भोजन’ अलग संदर्भ में पुण्य भी बन सकता है और दोष भी। → निर्णायक बिंदु यह है कि प्रतिग्रह/भोजन का दोष ‘वस्तु’ से उतना नहीं, जितना ‘संदर्भ’ (कर्ता-जाति, काल, विधि, उद्देश्य) से बनता है—इसीलिए गन्ना-तेल-कुश जैसे प्रतिग्रह पर त्रिकाल स्नान, शूद्र-सहभोजन/अशौच-स्पर्श जैसी स्थितियों पर शान्तिहोम और गायत्री, रैवत-साम, पवित्रेष्टि, कृष्णमाण्ड-अनुवाक, अघमर्षण-जप आदि का विधान आता है; और कुछ दानों/प्रतिग्रहों को सुवर्ण-दान तुल्य प्रायश्चित्त से समतुल्य ठहराया जाता है। → भीष्म प्रायश्चित्त-विधि को ‘व्यवहार-धर्म’ की तरह व्यवस्थित कर देते हैं—कौन-सा प्रतिग्रह/भोजन किस शुद्धि से शुद्ध होता है, श्राद्ध का अपराह्न-नियम किस अर्थ से जुड़ा है, और प्रायश्चित्त के बाद ब्राह्मण कैसे ‘सिद्धि’ पाकर आपत्ति से बचता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भोज्याभोज्यान्नकथन नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १३५ ॥। षट्त्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्षित्त युधिषछ्िर उवाच उक्तास्तु भवता भोज्यास्तथाभोज्याश्व्‌ सर्वश: । अत्र मे प्रश्रसंदेहस्तन्मे वद पितामह,युधिष्ठिने कहा--पितामह! आपने भोज्यान्न और अभोज्यान्न सभी तरहके मनुष्योंका वर्णन किया; किंतु इस विषयमें मुझे पूछनेयोग्य एक संदेह उत्पन्न हो गया। उसका मेरे लिये समाधान कीजिये

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai kakek yang mulia, engkau telah menjelaskan sepenuhnya mana yang patut diterima dan mana yang tidak patut. Namun tentang hal ini juga timbul keraguan dalam benakku—mohon jelaskan dan luruskan bagiku.”

Verse 2

ब्राह्मणानां विशेषेण हव्यकव्यप्रतिग्रहे । नानाविधेषु भोज्येषु प्रायश्चित्तानि शंस मे,प्राय: ब्राह्मणोंको ही हव्य और कव्यका प्रतिग्रह लेना पड़ता है और उन्हें ही नाना प्रकारके अन्न ग्रहण करनेका अवसर आता है। ऐसी दशामें उन्हें पाप लगते हैं, उनका क्या प्रायश्चित्त है? यह मुझे बतावें

Yudhiṣṭhira berkata: “Terutama bagi para brahmana—yang harus menerima persembahan bagi para dewa (havis) dan bagi para leluhur (kavya), serta dapat berhadapan dengan beragam jenis makanan—penebusan (prāyaścitta) apa yang ditetapkan? Mohon jelaskan kepadaku.”

Verse 3

भीष्य उवाच हन्त वक्ष्यामि ते राजन्‌ ब्राह्मणानां महात्मनाम्‌ | प्रतिग्रहेषु भोज्ये च मुच्यते येन पाप्मन:,भीष्मजीने कहा--राजन! महात्मा ब्राह्मणोंको प्रतिग्रह लेने और भोजन करनेके पापसे जिस प्रकार छुटकारा मिलता है, वह प्रायश्ित्त मैं बता रहा हूँ, सुनो

Bhīṣma berkata: “Wahai Raja, akan kukatakan kepadamu bagaimana para brāhmaṇa yang berhati luhur terbebas dari dosa yang timbul karena menerima pemberian (pratigraha) dan karena makan; dengarkanlah.”

Verse 4

घृतप्रतिग्रहे चैव सावित्री समिदाहुति: । तिलप्रतिग्रहे चैव सममेतद्‌ युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! ब्राह्मण यदि घीका दान ले तो गायत्री-मन्त्र पढ़कर अग्निमें समिधाकी आहुति दे। तिलका दान लेनेपर भी यही प्रायश्चित्त करना चाहिये। ये दोनों कार्य समान हैं

Wahai Yudhiṣṭhira, bila seorang brāhmaṇa menerima ghee sebagai pemberian, hendaknya ia mempersembahkan sebatang kayu bakar (samidh) ke dalam api suci sambil melafalkan mantra Sāvitrī (Gāyatrī). Bila ia menerima wijen, penebusan yang sama dilakukan; keduanya setara.

Verse 5

मांसप्रतिग्रहे चैव मधुनो लवणस्य च । आदित्योदयन स्थित्वा पूतो भवति ब्राह्मण:,फलका गुद्दा, मधु और नमकका दान लेनेपर उस समयसे लेकर सूर्योदयतक खड़े रहनेसे ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है

Bila seorang brāhmaṇa menerima daging, madu, atau garam sebagai pemberian, ia menjadi suci dengan berdiri (dalam laku tapa) sejak saat itu hingga terbit matahari.

Verse 6

काउ्चनं प्रतिगृह्मयाथ जपमानो गुरुश्रुतिम्‌ । कृष्णायसं च विवृतं धारयन्‌ मुच्यते द्विज:,सुवर्णका दान लेकर गायत्री-मन्त्रका जप करने और खुले तौरपर काले लोहेका दंड धारण करनेसे ब्राह्मण उसके दोषसे छुटकारा पाता है

Seorang dvija terbebas dari cela itu bila ia menerima emas (sebagaimana ditetapkan), sambil melafalkan Gāyatrī yang diajarkan guru, dan secara terbuka memanggul tongkat dari besi hitam.

Verse 7

एवं प्रतिगृहीते5थ धने वस्त्रे तथा स्त्रियाम्‌ । एवमेव नरश्रेष्ठ सुवर्णस्य प्रतिग्रहे

Demikian pula, wahai insan terbaik: bila seseorang telah menerima harta, pakaian, bahkan seorang perempuan sebagai pemberian atau dalam ketergantungan, maka prinsip yang sama berlaku—sebagaimana dalam penerimaan emas.

Verse 8

इक्षुतैलपवित्राणां त्रिसंध्ये5प्सु निगनज्जनम्‌,गन्ना, तेल और कुशोंका प्रतिग्रह स्वीकार करनेपर त्रिकाल स्नान करना चाहिये। धान, फूल, फल, जल, पूआ, जौकी लपसी और दही-दूधका दान लेनेपर सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये

Bhīṣma berkata: “Bila seseorang menerima tebu, minyak, atau rumput darbha (kuśa) yang suci sebagai pemberian, hendaklah ia melakukan mandi penyucian di air pada tiga waktu peralihan harian—pagi, tengah hari, dan senja. Dan bila ia menerima pemberian berupa padi/beras, bunga, buah, air, olahan dari tepung, bubur jelai, dadih, atau susu, hendaklah ia melafalkan mantra Gāyatrī (Sāvitrī) seratus kali.”

Verse 9

व्रीहौ पुष्पे फले चैव जले पिष्टमये तथा । यावके दधिदुग्धे च सावित्रीं शतशो5न्विताम्‌,गन्ना, तेल और कुशोंका प्रतिग्रह स्वीकार करनेपर त्रिकाल स्नान करना चाहिये। धान, फूल, फल, जल, पूआ, जौकी लपसी और दही-दूधका दान लेनेपर सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये

Bhīṣma berkata: “Bila seseorang menerima beras/padi, bunga, buah, air, olahan dari tepung, bubur jelai, dadih, atau susu sebagai pemberian, hendaklah ia menerimanya sambil mengiringinya dengan pelafalan mantra Sāvitrī (Gāyatrī) berulang-ulang—ratusan kali.”

Verse 10

उपानहौ च च्छत्र॑ च प्रतिगृह्मौर्ध्वदेहिके । जपेच्छतं समायुक्तस्तेन मुच्येत पाप्मना,श्राद्धमें जूता और छाता ग्रहण करनेपर एकाग्रचित्त हो यदि सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करे तो उस प्रतिग्रहके दोषसे छुटकारा मिल जाता है

Bhīṣma berkata: “Dalam upacara ūrdhva-dehika (śrāddha), bila seseorang menerima alas kaki dan payung sebagai pemberian, hendaklah ia—dengan batin terhimpun—melafalkan mantra Gāyatrī seratus kali. Dengan disiplin japa itu, ia terbebas dari dosa yang timbul karena penerimaan tersebut.”

Verse 11

क्षेत्रप्रतिग्रहे चैव ग्रहसूतकयोस्तथा । त्रीणि रात्राण्युपोषित्वा तेन पापाद्‌ विमुच्यते,>ग्रहणके समय अथवा अशौचमें किसीके दिये हुए खेतका दान स्वीकार करनेपर तीन रात उपवास करनेसे उसके दोषसे छुटकारा मिलता है

Bhīṣma berkata: “Bila seseorang menerima pemberian tanah—terutama pada saat gerhana atau ketika berada dalam masa ketidak-sucian ritual (sūtaka)—hendaklah ia menebusnya dengan berpuasa selama tiga malam; dengan laku itu ia terbebas dari dosa yang timbul.”

Verse 12

कृष्णपक्षे तु यः श्राद्धं पितृणामश्नुते द्विज: । अन्नमेतदहोरात्रात्‌ पूतो भवति ब्राह्मण:,जो द्विज कृष्णपक्षमें किये हुए पितृश्राद्धका अन्न भोजन करता है, वह एक दिन और एक रात बीत जानेपर शुद्ध होता है

Bhīṣma berkata: “Seorang dwija yang memakan makanan śrāddha bagi para leluhur yang dilakukan pada paruh gelap bulan (kṛṣṇa-pakṣa) menjadi suci kembali setelah berlalu satu siang dan satu malam.”

Verse 13

न च संध्यामुपासीत न च जाप्य॑ प्रवर्तयेत्‌ । न संकिरेत्‌ तदन्नं च ततः पूर्येत ब्राह्मण:,ब्राह्मण जिस दिन श्राद्धका अन्न भोजन करे, उस दिन संध्या, गायत्री-जप और दुबारा भोजन त्याग दे। इससे उसकी शुद्धि होती है

Pada hari seorang brāhmana menyantap makanan persembahan śrāddha, ia tidak melakukan pemujaan sandhyā, tidak memulai japa (seperti Gāyatrī), dan tidak makan lagi. Dengan menahan diri demikian, kemurnian ritusnya pulih dan terpelihara.

Verse 14

इत्यर्थमपराह्ले तु पितृणां श्राद्धमुच्यते । यथोक्तानां यदश्नीयुरत्रल्यिणा: पूर्वकीर्तिता:,इसीलिये अपराह्नलकालमें पितरोंके श्राद्धका विधान किया गया है। (जिससे सबेरेकी संध्योपासना हो जाय और शामको पुनर्भोजनकी आवश्यकता ही न पड़े) ब्राह्मणोंको एक दिन पहले श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहिये। जिससे वे पूर्वोक्त प्रकारसे विशुद्ध पुरुषोंके यहाँ यथावत्‌ रूपसे भोजन कर सकें

Karena itulah śrāddha bagi para Pitṛ ditetapkan pada waktu sore (afternoon), agar mereka yang telah disebutkan sebelumnya sebagai layak dan berkelakuan suci dapat makan di sana menurut tata cara yang ditentukan.

Verse 15

मृतकस्य तृतीयाहे ब्राह्मणो योऊन्नमश्रुते । स त्रिवेलं समुन्मज्ज्य द्वादशाहेन शुध्यति

Seorang brāhmana yang menyantap makanan pada hari ketiga setelah kematian seseorang menjadi suci kembali pada hari kedua belas, setelah melakukan mandi ritus pada tiga waktu yang ditetapkan.

Verse 16

जिसके घर किसीकी मृत्यु हुई हो, उसके यहाँ मरणाशौचके तीसरे दिन अन्न ग्रहण करनेवाला ब्राह्मण बारह दिनोंतक त्रिकाल स्नान करनेसे शुद्ध होता है ।। द्वादशाहे व्यतीते तु कृतशौचो विशेषतः । ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्त्वा मुच्यते तेन पाप्मना,बारह दिनोंतक स्नानका नियम पूर्ण हो जानेपर तेरहवें दिन वह विशेषरूपसे स्नान आदिके द्वारा पवित्र हो ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन करावे। तब उस पापसे मुक्त हो सकता है

Setelah dua belas hari berlalu dan tata cara penyucian diselesaikan, ia menjadi suci secara khusus. Dengan mempersembahkan havis kepada para brāhmana, ia terbebas dari noda dosa yang terkait dengan ketidakmurnian karena kematian.

Verse 17

मृतस्य दशरात्रेण प्रायश्चित्तानि दापयेत्‌ सावित्री रैवतीमिष्टिं कृूष्माण्डमघमर्षणम्‌,जो मनुष्य किसीके यहाँ मरणाशौचमें दस दिनतक अन्न खाता है, उसे गायत्री-मन्त्र, रैवत शाम, पवित्रेष्टि कृष्माण्ड अनुवाक्‌ और अघमर्षणका जप करके उस दोषका प्रायश्ित्त करना चाहिये

Jika selama sepuluh malam masa ketidakmurnian setelah kematian seseorang ada yang makan di rumah orang lain, hendaknya ia dikenai penebusan (prāyaścitta): melafalkan mantra Sāvitrī (Gāyatrī), menjalankan ritus Raivatī, melakukan iṣṭi penyucian, melafalkan formula Kūṣmāṇḍa, serta himne Aghamarṣaṇa.

Verse 18

मृतकस्य त्रिरात्रे यः समुद्दिष्टे समश्षुते । सप्त त्रिषवर्णं स्नात्वा पूतो भवति ब्राह्मण:,इसी प्रकार जो मरणाशौचवाले घरमें लगातार तीन रात भोजन करता है, वह ब्राह्मण सात दिनोंतक त्रिकाल स्नान करनेसे शुद्ध होता है

Bhīṣma bersabda: Seorang brāhmaṇa yang selama tiga malam berturut-turut memakan makanan yang dipersembahkan sehubungan dengan kematian (di rumah yang berada dalam ketidakmurnian karena duka) akan menjadi suci kembali dengan mandi pada tiga waktu peralihan—pagi, tengah hari, dan senja—selama tujuh hari.

Verse 19

सिद्धिमाप्रोति विपुलामापदं चैव नाप्रुयात्‌

Ia meraih keberhasilan yang melimpah dan tidak jatuh ke dalam bencana.

Verse 20

यह प्रायश्रित्त करनेके बाद उसे सिद्धि प्राप्त होती है और वह भारी आपत्तिमें कभी नहीं पड़ता है ।। यस्तु शूद्रे: समश्रीयाद्‌ ब्राह्मणो5प्येक भोजने । अशौचं विधिवत्‌ तस्य शौचमत्र विधीयते

Setelah menjalankan penebusan (prāyaścitta) yang ditetapkan, ia memperoleh kemurnian dan keberhasilan, serta tidak jatuh ke dalam kesusahan besar. Namun bila bahkan seorang brāhmaṇa, dalam satu jamuan, bergaul setara dan makan sebaris bersama śūdra, maka baginya timbul ketidakmurnian menurut tata-aturan; karena itu di sini ditetapkan tata cara penyucian baginya.

Verse 21

जो ब्राह्मण शूद्रोंके साथ एक पंक्तिमें भोजन कर लेता है, वह अशुद्ध हो जाता है। अतः उनकी शुद्धिके लिये शास्त्रीय विधिके अनुसार यहाँ शौचका विधान है ।। यस्तु वैश्यै: सहाश्रीयाद्‌ ब्राह्मणो5प्येकभोजने । स वैनत्रिरात्रं दीक्षित्वा मुच्यते तेन कर्मणा,जो ब्राह्मण वैश्योंके साथ एक पंक्तिमें भोजन करता है, वह तीन राततक व्रत करनेपर उस कर्मदोषसे मुक्त होता है

Bila seorang brāhmaṇa turut makan sebaris dalam satu jamuan bersama vaiśya, ia menanggung cela ritual. Dengan menjalani laku dīkṣā selama tiga malam, ia terbebas dari kesalahan yang timbul dari perbuatan itu.

Verse 22

क्षत्रिय: सह यो5श्रीयाद ब्राह्मणो5प्येकभोजने । आप्लुत: सह वासोभिस्तेन मुच्येत पाप्मना,जो ब्राह्मण क्षत्रियोंके साथ एक पंक्तिमें भोजन करता है, वह वस्त्रोंसहित स्नान करनेसे पापमुक्त होता है

Bila seorang brāhmaṇa makan sebaris dalam satu jamuan bersama kṣatriya, ia menanggung cela. Namun dengan mandi sambil mengenakan pakaian, ia terbebas dari dosa yang timbul karenanya.

Verse 23

शूद्रस्य तु कुलं हन्ति वैश्यस्य पशुबान्धवान्‌ । क्षत्रियस्य श्रियं हन्ति ब्राह्मणस्य सुवर्चसम्‌,ब्राह्णणफा तेज उसके साथ भोजन करनेवाले शूद्रके कुलका, वैश्यके पशु और बान्धवोंका तथा क्षत्रियकी सम्पत्तिका नाश कर डालता है

Kesalahan ini dikatakan menghancurkan garis keluarga seorang Śūdra; memusnahkan ternak serta ikatan kekerabatan seorang Vaiśya; merusak kemakmuran dan wibawa seorang Kṣatriya; dan memadamkan suvarcas seorang Brāhmaṇa—cahaya rohani serta nama baiknya.

Verse 24

प्रायश्षित्तं च शान्तिं च जुहुयात्‌ तेन मुच्यते । सावित्री रैवतीमिष्टिं कृूष्माण्डमघमर्षणम्‌

Hendaknya ia melakukan upacara penebusan (prāyaścitta) dan persembahan penenteraman (śānti-homa); dengan itu ia terbebas dari kesalahan. Ia pun hendaknya mempersembahkan iṣṭi Sāvitrī dan Raivatī, serta laku Kūṣmāṇḍa—mantra Aghamarṣaṇa yang mengikis dosa.

Verse 25

इसके लिये प्रायश्रित्त और शान्तिहोम करना चाहिये। गायत्री-मन्त्र, रैवत साम, पवित्रेष्टि, कृष्माण्ड अनुवाक्‌ और अघमर्षण मन्त्रका जप भी आवश्यक है ।। तथोच्छिष्टमथान्योन्यं सम्प्राशेन्नात्र संशय: । रोचना विरजा रात्रिर्मज्नलालम्भनानि च,किसीका जूठा अथवा उसके साथ एक पंक्तिमें भोजन नहीं करना चाहिये। उपर्युक्त प्रायश्चित्तके विषयमें संशय नहीं करना चाहिये। प्रायश्चित्त करनेके अनन्तर गोरोचन, दूर्वा और हल्दी आदि मांगलिक वस्तुओंका स्पर्श करना चाहिये

Janganlah seseorang memakan sisa makanan orang lain, dan jangan pula makan bersama dengan cara yang membuat sisa-sisa saling bercampur—tanpa ragu inilah aturannya. Setelah menjalankan prāyaścitta yang ditetapkan, hendaknya ia menyentuh sarana-sarana suci dan mujur seperti gorocanā, menjalani malam yang bersih (virajā), serta melakukan penyucian seperti mandi dan laku-laku terkait.

Verse 76

अन्नप्रतिग्रहे चैव पायसेक्षुरसे तथा । नरश्रेष्ठ इसी प्रकार धन, वस्त्र, कन्या, अन्न, खीर और ईखके रसका दान ग्रहण करनेपर भी सुवर्ण-दानके समान ही प्रायश्चित्त करे

Wahai insan terbaik, sekalipun seseorang menerima pemberian berupa makanan, pâyasa (bubur susu manis), dan sari tebu—demikian pula harta, pakaian, seorang gadis (dalam pernikahan), dan persembahan sejenis—ia hendaknya menjalankan penebusan yang setara dengan penebusan karena menerima hadiah emas.

Verse 136

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि प्रायश्ित्तविधिनाम षट्त्रिंशयधिकशततमो<्ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva, bagian Dāna-dharma Parva, berakhir bab ke-136 yang bernama “Prāyaścitta-vidhi” (tata cara penebusan).

Frequently Asked Questions

The tension lies between established exclusion (Indra’s refusal of Soma access to the Aśvins) and a dharmic claim to equitable ritual participation, resolved through ascetic authority constrained toward communal order rather than personal gain.

Power—whether royal or ascetic—should be used to restore order and restrain excess; the explicit behavioral guideline is to avoid the four decline-producing channels: gambling, hunting-as-addiction, intoxicating drinking, and uncontrolled sexual indulgence.

No explicit phalaśruti formula appears in this excerpt; instead, the closure functions as normative meta-commentary by stating the inevitable ‘kṣaya’ (ruin) resulting from specified vices and recommending their continual avoidance.