Adhyaya 140
Anushasana ParvaAdhyaya 14023 Verses

Adhyaya 140

Agastya-Māhātmya and Vasiṣṭha’s Protection of the Ādityas (Khalina Daityas; Sarayū Etiology)

Upa-parva: Dāna-Dharma and Ṛṣi-Māhātmya (Exempla of Agastya and Vasiṣṭha)

Bhīṣma reports an embedded narration in which Vāyu, prompted to speak, recounts exemplary deeds of ṛṣis. First, devas, defeated and demoralized by asuras, approach Agastya, described as radiant and steadfast in vow. Agastya becomes intensely resolute; by the force of his tejas he neutralizes many adversaries in the aerial domain, who flee southward. When asked to eliminate those established on earth, he declines, stating that such action would diminish his tapas—indicating an ethic of constrained power and conservation of spiritual efficacy. The discourse then transitions to Vasiṣṭha: during an Āditya sacrificial session near the Mānasā lake, the Khalina daityas seek to attack, repeatedly reviving by immersion in a boon-granted lake. The devas seek protection; Vasiṣṭha grants assurance and, with minimal effort, overcomes the threat through his tejas. An etiological sequence follows: Vasiṣṭha brings the Gaṅgā, associated with Kailāsa, to split the lake, resulting in the formation of the Sarayū; the region where the Khalinas fell becomes marked by their name. The chapter thus frames ṛṣi-agency as safeguarding ritual order, while emphasizing proportional intervention and the limits imposed by tapas economy.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, दान-धर्म के सूक्ष्म मार्ग में एक और कठिन प्रश्न उठाते हैं—किनके अन्न का ग्रहण धर्म है और किनके अन्न का ग्रहण पतन का द्वार? → भीष्म वर्ण-धर्म और आचरण-धर्म के आधार पर ‘भोज्य’ और ‘अभोज्य’ का वर्गीकरण करते हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के अन्न की ग्राह्यता; शूद्र-भोजन के निषेध का कठोर विधान; और उससे भी आगे ‘सर्वभक्ष’, ‘विकर्मी’, ‘न्यासापहारी’, ‘कृतघ्न’ जैसे आचरण-दोषों से दूषित अन्न के परिणाम। → भीष्म का तीखा निष्कर्ष—“शूद्रों का अन्न खाने वाला पृथ्वी का मल खाता है; और जो द्विज शूद्र-भोजी हैं वे भी वही मल खाते हैं”—यह वाक्य अध्याय का नैतिक-आघात और भय-उत्पादक शिखर बनता है, जहाँ भोजन केवल पदार्थ नहीं, धर्म-शुद्धि का निर्णायक बन जाता है। → भीष्म पुनः स्मरण कराते हैं कि समाज-धर्म में ब्राह्मण का स्वाध्याय, क्षत्रिय का रक्षण, वैश्य का पोषण-व्यवहार—ये कर्तव्य-रेखाएँ हैं; और अन्न-ग्रहण में भी शुद्धि का नियम उसी व्यवस्था को साधता है। अंत में वे कहते हैं कि ‘भोज्य-अभोज्य’ का विधान विधिपूर्वक कह दिया गया। → युधिष्ठिर के लिए द्वार खुला छोड़ दिया जाता है—“कौन्तेय, अब और क्या सुनना चाहते हो?” (अगले प्रश्न/उपदेश की ओर संकेत)

Shlokas

Verse 1

औपनआक्रात बछ। सर: पजञ्चत्रिशर्दाधिकशततमोब् ध्याय: जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य है और जिनका ग्रहण करने योग्य नहीं है, उन मनुष्योंका वर्णन युधिछिर उवाच के भोज्या ब्राह्मणस्येह के भोज्या: क्षत्रियस्य ह | तथा वैश्यस्य के भोज्या: के शूद्रस्य च भारत,युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! इस जगत्‌में ब्राह्यणको किनके यहाँ भोजन करना चाहिये, क्षत्रियको किनके घरका अन्न ग्रहण करना चाहिये तथा वैश्य और शूद्रको किन- किन लोगोंके घर भोजन करना चाहिये?

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhārata, di dunia ini dari tangan siapa seorang brāhmaṇa patut menerima makanan? Dari tangan siapa seorang kṣatriya? Demikian pula, dari siapa seorang vaiśya boleh menerima makanan, dan dari siapa seorang śūdra?”

Verse 2

भीष्म उवाच ब्राह्मणा ब्राह्मणस्येह भोज्या ये चैव क्षत्रिया: । वैश्याश्चापि तथा भोज्या: शूद्राश्न॒ परिवर्जिता:,भीष्मजीने कहा--बेटा! इस लोकमें ब्राह्मणको ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यके घर भोजन करना चाहिये। शूद्रके घर भोजन करना उसके लिये निषिद्ध है

Bhīṣma berkata: “Anakku, di dunia ini seorang brāhmaṇa patut menerima makanan di rumah brāhmaṇa, demikian pula di rumah kṣatriya, dan juga di rumah vaiśya. Namun makan di rumah śūdra harus dihindari olehnya.”

Verse 3

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या भोज्या वै क्षत्रियस्य ह । वर्जनीयास्तु वै शूद्रा: सर्वभक्षा विकर्मिण:,इसी प्रकार क्षत्रियको ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यके घर ही भोजन ग्रहण करना चाहिये। भक्ष्य-अभक्ष्यका विचार न करके सब कुछ खानेवाले और शास्त्रके विरुद्ध आचरण करनेवाले शूद्रोंका अन्न उसके लिये भी त्याज्य है

Bhīṣma berkata: “Bagi seorang kṣatriya, patut menerima makanan dari rumah brāhmaṇa, kṣatriya, dan vaiśya. Namun makanan dari śūdra yang makan tanpa membedakan yang layak dan tidak layak, serta bertindak bertentangan dengan śāstra, harus dihindari olehnya juga.”

Verse 4

वैश्यास्तु भोज्या विप्राणां क्षत्रियाणां तथैव च | नित्याग्नयो विविक्ताश्च चातुर्मास्यरताश्न ये,वैश्योंमें भी जो नित्य अग्निहोत्र करनेवाले, पवित्रतासे रहनेवाले और चातुर्मास्य-व्रतका पालन करनेवाले हैं, उन्हींका अन्न ब्राह्मण और क्षत्रियोंके लिये ग्राह्म है

Bhīṣma berkata: “Di antara para vaiśya pun, hanya mereka yang layak memberi makanan kepada brāhmaṇa dan kṣatriya: yang memelihara api suci setiap hari, hidup dalam kemurnian dan disiplin, serta setia menjalankan ritus Cāturmāsya. Makanan hendaknya diterima hanya dari kepala keluarga yang demikian.”

Verse 5

शूद्राणामथ यो भुड्धक्ते स भुड्क्ते पृथिवीमलम्‌ । मल॑ नृणां स पिबति मलं॑ भुद्ठक्ते जनस्य च,जो द्विज शूद्रोंके चरका अन्न खाता है, वह समस्त पृथ्वी और सम्पूर्ण मनुष्योंक मलका ही पान और भक्षण करता है

Bhīṣma berkata: “Siapa pun dwija yang memakan makanan milik śūdra, sesungguhnya ia memakan kenajisan—seakan-akan menelan kotoran bumi. Ia meminum kenajisan manusia dan memakan kenajisan orang banyak.”

Verse 6

शूद्राणां यस्तथा भुड्क्ते स भुड्क्ते पृथिवीमलम्‌ । पृथिवीमलमश्रन्ति ये द्विजा: शूद्रभोजिन:,जो शूट्रोंका अन्न खाता है, वह पृथ्वीका मल खाता है। शूद्रात्न भोजन करनेवाले सभी द्विज पृथ्वीका मल ही खाते हैं

Bhīṣma berkata: “Siapa pun yang dengan cara demikian memakan makanan seorang Śūdra, sesungguhnya ia memakan kotoran bumi. Para dwija yang hidup dengan memakan makanan Śūdra pun dikatakan menyantap kenajisan bumi.”

Verse 7

शूद्रस्य कर्मनिष्ठायां विकर्मस्थोडपि पच्यते । ब्राह्मण: क्षत्रियो वैश्यो विकर्मस्थश्न पच्यते,जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य शूद्रके कर्मोमें संलग्न रहनेवाला हो, वह यदि विशिष्ट कर्म --संध्या-वन्दन आदिमें संलग्न रहनेवाला हो, तो भी नरकमें पकाया जाता है। यदि शूद्रके कर्म न करके भी वह शास्त्रविरुद्ध कर्ममें संलग्न रहता हो तो भी उसे नरककी यातना भोगनी पड़ती है

Bhīṣma berkata: “Seorang Śūdra yang teguh pada pekerjaannya sendiri pun, bila terjerumus ke dalam vikarma (perbuatan terlarang), akan ‘dimasak’ dalam neraka. Namun seorang Brāhmaṇa, Kṣatriya, atau Vaiśya yang berada dalam vikarma tidak ‘dimasak’ semata-mata karena bersentuhan dengan pekerjaan jenis Śūdra; yang menentukan ialah teguh pada svadharma dan menjauhi vikarma.”

Verse 8

स्वाध्यायनिरता विप्रास्तथा स्वस्त्ययने नृणाम्‌ । रक्षणे क्षत्रियं प्राहुर्वैंश्यं पुष्टयर्थमेव च,ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और मनुष्योंके लिये मंगलकारी कार्यमें लगे रहनेवाले होते हैं। क्षत्रियको सबकी रक्षामें तत्पर बताया गया है और वैश्यको प्रजाकी पुष्टिके लिये कृषि, गोरक्षा आदि कार्य करने चाहिये

Bhīṣma berkata: “Para Brahmana tekun dalam swādhyāya Weda serta dalam upacara dan laku yang membawa kemujuran bagi manusia. Kṣatriya, kata mereka, bertekad pada perlindungan. Dan Vaiśya ada demi memelihara serta menegakkan kesejahteraan masyarakat.”

Verse 9

करोति कर्म यद्‌ वैश्यस्तद्‌ गत्वा हुपजीवति । कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमकुत्सा वैश्यकर्मणि,वैश्य जो कर्म करता है, उसका आश्रय लेकर सब लोग जीविका चलाते हैं। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य--ये वैश्यके अपने कर्म हैं। इससे उसको घृणा नहीं होनी चाहिये

Bhīṣma berkata: “Apa pun pekerjaan yang dilakukan seorang Vaiśya, manusia hidup dengan bersandar pada kegiatan itu. Bertani, memelihara dan melindungi sapi, serta berdagang—itulah dharma pekerjaan Vaiśya; maka ia tidak patut memandang hina atau malu terhadap panggilannya sendiri.”

Verse 10

शूद्रकर्म तु यः कुर्यादवहाय स्वकर्म च । स विज्ञेयो यथा शूद्रो न च भोज्य: कदाचन,जो वैश्य अपना कर्म छोड़कर शूद्रका कर्म करता है, उसे शूद्रके समान ही जानना चाहिये और उसके यहाँ कभी भोजन नहीं करना चाहिये

Bhīṣma berkata: “Barang siapa meninggalkan kewajibannya sendiri lalu melakukan pekerjaan yang ditetapkan bagi Śūdra, ia patut dipandang setara dengan Śūdra; dan di rumahnya jangan sekali-kali menerima jamuan makanan.”

Verse 11

चिकित्सक: काण्डपृष्ठ: पुराध्यक्ष: पुरोहित: । सांवत्सरो वृथाध्यायी सर्वे ते शूद्रसम्मिता:,जो चिकित्सा करनेवाला, शास्त्र बेचकर जीविका चलानेवाला, ग्रामाध्यक्ष, पुरोहित, वर्षफल बतानेवाला ज्योतिषी और वेद-शास्त्रसे भिन्न व्यर्थकी पुस्तकें पढ़नेवाला है, वे सबके सब ब्राह्मण शूद्रके समान हैं

Bhishma bersabda: “Seorang penyembuh yang menjadikan pengobatan sebagai mata pencaharian; orang yang hidup dengan menjual ilmu; kepala desa atau kota; seorang imam (purohita) yang melayani demi nafkah; peramal tahunan (ahli nujum) yang menghitung hasil setahun; dan pelajar yang menekuni kitab-kitab sia-sia di luar Weda dan śāstra— semuanya itu, walau terlahir sebagai Brahmana, dipandang setara dengan Śūdra.”

Verse 12

शूद्रकर्मस्वथैतेषु यो भुड्धक्ते निरपत्रप: । अभोज्यभोजन भुकक्‍त्वा भयं प्राप्रोति दारुणम्‌,जो निर्लज्ज मनुष्य शूद्रोचित कर्म करनेवाले इन द्विजोंके घर भोजन करता है, वह अभक्ष्य-भक्षणका पाप करके दारुण भयको प्राप्त होता है

Bhīṣma bersabda: “Orang tak tahu malu yang makan di rumah para dwija ini ketika mereka menjalankan perilaku dan pekerjaan yang layak bagi seorang Śūdra, melakukan kesalahan memakan sesuatu yang tidak patut dimakan; karenanya ia menanggung ketakutan yang mengerikan (bahaya dan derita besar).”

Verse 13

कुल वीर्य च तेजश्न तिर्यग्योनित्वमेव च । स प्रयाति यथा श्रा वै निष्क्रियो धर्मवर्जित:,उसके कुल, वीर्य और तेज नष्ट हो जाते हैं तथा वह धर्म-कर्मसे हीन होकर कुत्तेकी भाँति तिर्यक्‌-योनिमें पड़ जाता है

Bhīṣma bersabda: “Keturunan mulia, daya kejantanan, dan cahaya wibawanya hancur; dan, tersingkir dari dharma serta lalai dari kewajiban benar, ia jatuh ke kelahiran sebagai binatang—laksana anjing.”

Verse 14

भुड्क्ते चिकित्सकस्यान्नं तदन्नं च पुरीषवत्‌ । पुंश्वल्यन्नं च मूत्रं स्‍्पात्‌ कारुकान्नं च शोणितम्‌,जो चिकित्सा करनेवाले वैद्यका अन्न खाता है, उसका वह अन्न विष्ठाके समान है। व्यभिचारिणी स्त्री या वेश्याका अन्न मूत्रके समान है। कारीगरका अन्न रक्तके तुल्य है

Bhishma bersabda: “Bila seseorang memakan makanan milik seorang tabib, makanan itu dipandang seperti kotoran. Makanan milik perempuan yang berzina atau pelacur dikatakan seperti air kencing. Makanan milik seorang perajin diserupakan dengan darah.”

Verse 15

विद्योपजीविनो>न्नं च यो भुड्क्ते साधुसम्मत: । तदप्यन्नं यथा शौद्रं तत्‌ साधु: परिवर्जयेत्‌,जो साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित पुरुष विद्या बेचकर जीविका चलानेवाले ब्राह्मणका अन्न खाता है, उसका वह अन्न भी शाद्रान्नके ही समान है। अतः साधु पुरुषको उसका परित्याग कर देना चाहिये

Bhīṣma bersabda: “Sekalipun seseorang dipandang terhormat di mata orang-orang saleh, bila ia memakan makanan milik seorang Brahmana yang mencari nafkah dengan menjual ilmu, makanan itu pun harus dianggap setara dengan makanan yang terkait dengan penghidupan seorang Śūdra. Karena itu, orang baik hendaknya menghindarinya.”

Verse 16

वचनीयस्य यो भुड्क्ते तमाहु: शोणितं हृदम्‌ । पिशुनं भोजन भुड्धक्ते ब्रह्म॒हत्यासमं विदु:,जो कलंकित मनुष्यका अन्न ग्रहण करता है, उसे रक्तका कुण्ड कहते हैं। जो चुगुलखोरके यहाँ भोजन करता है, उसका वह भोजन करना ब्रह्महत्याके समान माना गया है। असत्कार और अवहेलनापूर्वक मिले हुए भोजनको कभी नहीं ग्रहण करना चाहिये

Bhishma bersabda: “Barangsiapa menyantap makanan dari orang yang tercela dan ternoda, ia disebut berhati seperti ‘sumur darah’. Dan siapa yang makan di rumah seorang pemfitnah—si pembawa adu domba—maka santapannya itu dipandang setara dengan dosa brahma-hatyā (membunuh brāhmaṇa). Karena itu, makanan yang diberikan dengan penghinaan dan celaan jangan sekali-kali diterima.”

Verse 17

असत्कृतमवज्ञातं न भोक्तव्यं कदाचन,जो कलंकित मनुष्यका अन्न ग्रहण करता है, उसे रक्तका कुण्ड कहते हैं। जो चुगुलखोरके यहाँ भोजन करता है, उसका वह भोजन करना ब्रह्महत्याके समान माना गया है। असत्कार और अवहेलनापूर्वक मिले हुए भोजनको कभी नहीं ग्रहण करना चाहिये

Bhishma bersabda: “Makanan yang diberikan dengan tidak hormat dan penghinaan jangan sekali-kali dimakan. Orang yang menerima makanan dari manusia yang ternoda disebut jatuh ke ‘sumur darah’. Dan siapa yang makan di rumah si pemfitnah, makan itu dipandang setara dengan dosa brahma-hatyā. Karena itu, makanan yang diperoleh melalui celaan dan perendahan jangan pernah diterima.”

Verse 18

व्याधिं कुलक्षयं चैव क्षिप्रं प्राप्रोति ब्राह्मण: । नगरीरक्षिणो भुड्क्ते श्वपचप्रवणो भवेत्‌,जो ब्राह्मण ऐसे अन्नको भोजन करता है, वह रोगी होता है और शीघ्र ही उसके कुलका संहार हो जाता है। जो नगररक्षकका अन्न खाता है, वह चण्डालके समान होता है

Bhishma bersabda: “Seorang brāhmaṇa yang memakan makanan semacam itu segera ditimpa penyakit dan lekas membawa kehancuran bagi garis keturunannya. Siapa yang menyantap makanan milik penjaga kota, ia menjadi condong pada keadaan śvapaca—terjerumus ke martabat kaum terbuang.”

Verse 19

गोघ्ने च ब्राह्मणघ्ने च सुरापे गुरुतल्पगे । भुक्त्वान्नं जायते विप्रो रक्षसां कुलवर्धन:,गोवध, ब्राह्मणवध, सुरापान और गुरुपत्नीगमन करनेवाले मनुष्यके यहाँ भोजन कर लेनेपर ब्राह्मण राक्षसोंके कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है

Bhīṣma bersabda: “Jika seorang brāhmaṇa memakan makanan milik pembunuh sapi, pembunuh brāhmaṇa, peminum minuman memabukkan, atau pelanggar ranjang guru, maka brāhmaṇa itu—oleh perbuatan menerima makanan—menjadi penyubur garis keturunan rākṣasa.”

Verse 20

न्यासापहारिणो भुक्‍त्वा कृतघ्ने क्लीबवर्तिनि | जायते शबरावासे मध्यदेशबहिष्कृते,धरोहर हड़पनेवाले, कृतघ्न तथा नपुंसकका अन्न खा लेनेसे मनुष्य मध्यदेशबहिष्कृत भीलोंके घरमें जन्म लेता है

Bhishma bersabda: “Setelah memakan makanan milik perampas titipan (deposit), orang yang tidak tahu berterima kasih, dan orang yang hidup dalam laku yang tidak jantan/impoten, seseorang terlahir di permukiman Śabara—di luar Madhyadeśa, negeri tengah yang disucikan.”

Verse 21

अभोज्याश्रैव भोज्याक्ष मया प्रोक्ता यथाविधि । किमन्यदद्य कौन्तेय मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि,कुन्तीनन्दन! जिनके यहाँ खाना चाहिये और जिनके यहाँ नहीं खाना चाहिये, ऐसे लोगोंका मैंने विधिवत्‌ परिचय दे दिया। अब मुझसे और क्या सुनना चाहते हो

Bhishma berkata: “Wahai putra Kunti, telah kujelaskan menurut tata yang semestinya siapa yang layak menerima jamuan dan dari siapa makanan tidak patut diterima. Kini, apa lagi yang hendak kau dengar dariku hari ini?”

Verse 134

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्कन्ददेवका रहस्यविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-134 tentang rahasia Dewa Skanda, dalam bagian Dāna-dharma pada Anuśāsana Parva dari Śrī Mahābhārata.

Verse 135

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि भोज्याभोज्यान्नकथनं नाम पज्चत्रिंशदधिकशततमो<ध्याय:

Demikian, dalam Śrī Mahābhārata, pada Anuśāsana Parva—dalam bagian Dāna-dharma—berakhir bab ke-135 yang berjudul “Uraian tentang Makanan yang Layak dan Tidak Layak Diterima.”

Frequently Asked Questions

Agastya is asked to extend his destructive power to adversaries on earth, but he refuses on the grounds that excessive exertion would deplete tapas—posing a dilemma between total eradication of threat and the disciplined conservation of spiritual authority.

Power—whether political or ascetic—must be applied proportionately and with awareness of its costs; safeguarding institutions like yajña may require intervention, but dharma includes restraint and long-term sustainability of one’s capacity to protect.

Rather than a direct phalaśruti formula, the chapter functions as exemplum: it authorizes ethical norms by citing ṛṣi precedent and anchors them in sacred geography (Sarayū, named locales), thereby reinforcing the instructional credibility of Bhīṣma’s broader dharma discourse.