
Sukta 8.5
Kaṇva lineage (Aṣṭaka 8 Kaṇva collection)
Uṣas (Dawn) (probable from aruṇa + spreading beam imagery; hymn context continues with Aśvins and Uṣas)
Gāyatrī (probable; requires verification)
This hymn from the Kāṇva collection opens in the luminous imagery of Uṣas, the true Dawn who arrives from afar and spreads her beams in every direction, awakening life and right movement. As the hymn proceeds, the praise-frame broadens into an Aśvin-oriented petition for thriving—cattle, offspring, strength, and nourishing “iṣ” (increase)—and culminates by contrasting the true path of gain with empty display, commending generous patrons (the Cedayas) as exemplars of right progress.
Mantra 1
दूरादिहेव यत्सत्यरुणप्सुरशिश्वितत् । वि भानुं विश्वधातनत् ॥
वो जो सच है, वो दूर से भी ऐसा लग रहा है जैसे यहीं हो। उसकी चमक लाल है और वो चमक रहा है। उसने अपनी किरण चारों तरफ फैला दी है।
Mantra 2
नृवद्दस्रा मनोयुजा रथेन पृथुपाजसा । सचेथे अश्विनोषसम् ॥
अश्विन भाई, तुम्हारी चमक वाली रथ है। तुम अपने मन से उसे चलाते हो। यह रथ बहुत चमकदार है। तुम सुभह के साथ आते हो। लोगों की तरफ देख के ताकत चलाते हो।
Mantra 3
युवाभ्यां वाजिनीवसू प्रति स्तोमा अदृक्षत । वाचं दूतो यथोहिषे ॥
तुम दोनों पास बहुत ताकत रखते हो। हमारी स्तुतियाँ तुम्हारी तरफ देखती हैं। बोल तुम्हारे पास आता है जैसे कोई संदेश ले के आता है। वो तुम्हारे पास बैठ जाता है।
Mantra 4
पुरुप्रिया ण ऊतये पुरुमन्द्रा पुरूवसू । स्तुषे कण्वासो अश्विना ॥
तुम बहुत प्यारे हो और हमारी मदद करते हो। तुम सबको खुश करते हो और बहुत कुछ देते हो। कण्व रिशि के शिष्य तुम्हारी तारीफ करते हैं। हम तुम्हें स्तुति में मानते हैं।
Mantra 5
मंहिष्ठा वाजसातमेषयन्ता शुभस्पती । गन्तारा दाशुषो गृहम् ॥
तुम बहुत देते हो और जीत में भी आगे हो। तुम आगे बढ़ाते रहते हो। तुम सुंदरता के स्वामी हो। जो लोग भगवान को समर्पित करते हैं, उनके घर आओ।
Mantra 6
ता सुदेवाय दाशुषे सुमेधामवितारिणीम् । घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम् ॥
जो लोग भगवान को समर्पित करते हैं, उनके लिए अच्छा ज्ञान दो। यह ज्ञान हमें सही रास्ते पे ले जाता है। घी जैसी चमक से उस रास्ते को मज़बूत करो। यह चमक वाली किरण हमारे अंदर रास्ते बनाती है।
Mantra 7
आ नः स्तोममुप द्रवत्तूयं श्येनेभिराशुभिः । यातमश्वेभिरश्विना ॥
अश्विनी कुमार, हमारी प्रार्थना की तरफ जल्दी आओ। तुम्हारे पास तेज़ उड़ने वाले पक्षी हैं, और घोड़े भी हैं जो आगे ले कर जाते हैं। अपनी शक्तियाँ लेकर हमारे पास पहुँचो।
Mantra 8
येभिस्तिस्रः परावतो दिवो विश्वानि रोचना । त्रीँरक्तून्परिदीयथः ॥
तुम्हारी शक्ति से तुम तीनों दुनिया घूमते हो। आसमान के सारे चमकदार हिस्सों में जाते हो। तुम समय के चक्कर में घूमते रहते हो, बीता गया, आज, और आने वाला, तीनों में।
Mantra 9
उत नो गोमतीरिष उत सातीरहर्विदा । वि पथः सातये सितम् ॥
हमें वो झलक दो जो ज्ञान से भरी हो। हमें वो जीत दिलाओ जो दिन में ही दिन में हो। हमें साफ़ रास्ते दिखाओ ताकि हम अपना काम कर सकें।
Mantra 10
आ नो गोमन्तमश्विना सुवीरं सुरथं रयिम् । वोळ्हमश्वावतीरिषः ॥
अश्विनी कुमार, हमारे पास वो खुशहाली लाओ जो ज्ञान से भरी हो। हीरो जैसी ताकत हो, और सही दिशा में चलने वाली रथ हो। अपने घोड़ों की ताकत से यह सब लेकर आओ।
Mantra 11
वावृधाना शुभस्पती दस्रा हिरण्यवर्तनी । पिबतं सोम्यं मधु ॥
तुम हमेशा बढ़ते रहते हो, सुंदरता के स्वामी हो। तुम्हारी गाड़ी सोने जैसी चमकदार है। आओ और सोम रस पियो, वो मीठा रस जो मन को खुश कर देता है।
Mantra 12
अस्मभ्यं वाजिनीवसू मघवद्भ्यश्च सप्रथः । छर्दिर्यन्तमदाभ्यम् ॥
हमारे लिए और जो लोग खुल के देते हैं उनके लिए भी, आप शक्ति और खुशाली के स्वामी हैं। हमें ऐसी सुरक्षा दो जो हमें आसरा दे। जो हमें किसी से डर न हो, बिल्कुल सेफ रखे।
Mantra 13
नि षु ब्रह्म जनानां याविष्टं तूयमा गतम् । मो ष्वन्याँ उपारतम् ॥
लोगों के शब्द के पास जल्दी आओ, अभी आओ। दूसरी तरफ मत जाओ, यहाँ आओ जहाँ हमारा काम है।
Mantra 14
अस्य पिबतमश्विना युवं मदस्य चारुणः । मध्वो रातस्य धिष्ण्या ॥
अश्विन कुमार, तुम दोनों इस मध का मज़ा लो। यह बहुत अच्छा है, मीठा है। इसको पियो और हमारे ऊपर अपनी शक्ति बना के रखो।
Mantra 15
अस्मे आ वहतं रयिं शतवन्तं सहस्रिणम् । पुरुक्षुं विश्वधायसम् ॥
हमें वो संपत्ति लाओ जो सौ गुना और हज़ार गुना बढ़ जाए। जो हमारे काम आए, हमारे लिए फायदेमंद हो, सब कुछ ठीक रखे।
Mantra 16
पुरुत्रा चिद्धि वां नरा विह्वयन्ते मनीषिणः । वाघद्भिरश्विना गतम् ॥
बहुत जगह लोग तुम्हे बुलाते हैं, जो समझदार हैं वो तुम्हारी ज़रूरत महसूस करते हैं। अश्विन कुमार, उनकी आवाज़ सुन के यहाँ आओ।
Mantra 17
जनासो वृक्तबर्हिषो हविष्मन्तो अरंकृतः । युवां हवन्ते अश्विना ॥
लोगों ने घास बिछा दी है और सामान तैयार कर लिया है। सब मिल के अश्विन भाइयों को बुला रहे हैं। अश्विन दोनों देवता हैं जो मदद के लिए आते हैं। यह लोग उनसे उम्मीद रखते हैं कि वो ज़रूर आएंगे।
Mantra 18
अस्माकमद्य वामयं स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः । युवाभ्यां भूत्वश्विना ॥
आज हमारी यह पूजा अश्विन के लिए सबसे खास है। हम दिल से उन्हे बुला रहे हैं। अश्विन भाइयों की शक्ति हम तक पहुंचे, यह हमारी ख्वाइश है। यह पूजा उन तक पहुंचनी चाहिए।
Mantra 19
यो ह वां मधुनो दृतिराहितो रथचर्षणे । ततः पिबतमश्विना ॥
अश्विन भाइयों के लिए मीठा रस रखा है। यह रस एक चमड़े के डिब्बे में है जो रथ वाले देवताओं के लिए है। अश्विन भाई, आके इसको पियो। यह रस तुम्हे शक्ति देगा और सफल कर देगा।
Mantra 20
तेन नो वाजिनीवसू पश्वे तोकाय शं गवे । वहतं पीवरीरिषः ॥
वो रस जो तुम पियोगे, उस्से हमें भी फायदा मिलेगा। हमारी शक्ति बढ़े, हमारे बच्चे अच्छे से बड़े, और हमारे पास जो चीज़ें हैं वो सेफ रहें। अश्विन भाई, यह सब तुम दे सकते हो।
Mantra 21
उत नो दिव्या इष उत सिन्धूँरहर्विदा । अप द्वारेव वर्षथः ॥
अश्विन भाई, ऊपर से हमारे लिए शक्ति भेजो। नदियों का पानी बहाओ जैसे दरवाज़े खोले। दिन के जानने वाले लोग समझते हैं कि यह शक्ति कैसे आती है। तुम दोनों यह काम कर सकते हो।
Mantra 22
कदा वां तौग्र्यो विधत्समुद्रे जहितो नरा । यद्वां रथो विभिष्पतात् ॥
तौग्र को समुंदर में छोड़ दिया गया था। दो वीर, तुम कब उसकी मदद करोगे? जब तुम्हारी रथ अपनी शक्ति से उड़ेगी। ऐसे ही हमारे भी काम आए जब हम मुसीबत में होंगे।
Mantra 23
युवं कण्वाय नासत्या ऋपिरिप्ताय हर्म्ये । शश्वदूतीर्दशस्यथः ॥
तुम दोनों नसत्य भाई हो। कण्व रिशि के लिए हमेशा मदद करते हो। वो अपने बड़े घर में सेफ रहता है। तुम उसे कभी चोटे नहीं पहुंचाते। जो लोग तुम्हे ध्यान से भगवान मानके बुलाते हैं, उनका भला करते हो।
Mantra 24
ताभिरा यातमूतिभिर्नव्यसीभिः सुशस्तिभिः । यद्वां वृषण्वसू हुवे ॥
जब मैं तुम्हे बुलाता हूँ, तुम्हारी नई नई मदद लेके आओ। जो काम अच्छे से चले, वो शक्ति लाओ। तुम दोनों खूब धन और शक्ति देने वाले हो। तुम्हारी ताज़ा ताकत हमारे काम में आए।
Mantra 25
यथा चित्कण्वमावतं प्रियमेधमुपस्तुतम् । अत्रिं शिञ्जारमश्विना ॥
जैसे तुमने कण्व रिशि की मदद की थी। जैसे प्रियमेध को पूजा में बुलाया था और उसकी सुन ली। जैसे अत्रि को जब वो परेशान था तब बचाया था। अश्विन भाई, अब हमारी भी सुन लो और वैसे ही मदद करो।
Mantra 26
यथोत कृत्व्ये धनेंऽशुं गोष्वगस्त्यम् । यथा वाजेषु सोभरिम् ॥
जैसे मुश्किल से धन मिलता है तब मदद की। जैसे गाय में अगस्त्य रिशि को बचाया था। जैसे सोभरि को धन और शक्ति दी थी। वैसे ही हमारे हर काम में तुम्हारी शक्ति काम आए।
Mantra 27
एतावद्वां वृषण्वसू अतो वा भूयो अश्विना । गृणन्तः सुम्नमीमहे ॥
अश्विन भाई, इतनी बात हमने तुम्हारे सामने रखी है। तुम ताकत लाने वाले हो। अब हम तुमसे और ज़्यादा माँगते हैं। तुम्हारी तारीफ करते हुए हम दुआ करते हैं कि तुम हमे खुशी और सुकून दो।
Mantra 28
रथं हिरण्यवन्धुरं हिरण्याभीशुमश्विना । आ हि स्थाथो दिविस्पृशम् ॥
अश्विन, तुम्हारा रथ सोना से सजा है। पहिए और लगाम भी सोने की हैं। आओ और हमारे पास खड़े हो जाओ। तुम्हारी यह चाल आसमान तक जाती है। इसी तरह हमारे रास्ते को भी ऊँचा करो।
Mantra 29
हिरण्ययी वां रभिरीषा अक्षो हिरण्ययः । उभा चक्रा हिरण्यया ॥
तुम्हारा रथ पूरा सोने की है। डंडा भी सोना का है, ढक्कन भी। दोनों पहिए भी सोने चमक रहे हैं। यह चमक हमारे रास्ते को साफ और सीधा बना दे। कोई रुकावट न आए।
Mantra 30
तेन नो वाजिनीवसू परावतश्चिदा गतम् । उपेमां सुष्टुतिं मम ॥
उसी ताकत से तुम हमारे पास आओ। तुम जीत और खुशहाली लाने वाले हो। कितना भी दूर हो, तुम वहीं से पहुँच जाओ। मेरी यह सच्ची तारीफ सुनो और उससे अपनी बरकत का ज़रिया बना लो।
Mantra 31
आ वहेथे पराकात्पूर्वीरश्नन्तावश्विना । इषो दासीरमर्त्या ॥
अश्विन, तुम दूर से आओ, रथ लेकर। तुम पुरानी भेंट से खुश हो। तुम अमर हो, कभी मरने वाले नहीं। हमको वो शक्ति दो जो हमारे जीवन को आगे बढ़ाए और खुराक दे।
Mantra 32
आ नो द्युम्नैरा श्रवोभिरा राया यातमश्विना । पुरुश्चन्द्रा नासत्या ॥
अश्विन भाई, तुम दोनों हमारे पास आओ। अपनी शक्ति और चमक लेकर आओ। तुम्हारी बड़ाई सब जगह फैल जाए। तुम हमारे लिए धन और सुख लाओ। तुम दोनों चमकते हो, बहुत रोशनी वाले हो। हमारे लिए वो खूबसूरती लाओ जो सब साफ कर दे।
Mantra 33
एह वां प्रुषितप्सवो वयो वहन्तु पर्णिनः । अच्छा स्वध्वरं जनम् ॥
वो पक्षी जैसी शक्ति तुम दोनों को लेकर आए। उनमें ताकत भरी है, चमक है। तुम उन लोगों के पास आओ जो भगवान को सही तरीके से पूजा करते हैं। उनकी पूजा में कोई गड़बड़ नहीं, सब सही चल रहा है।
Mantra 34
रथं वामनुगायसं य इषा वर्तते सह । न चक्रमभि बाधते ॥
तुम्हारी रथ गाड़ी गाना गाते हुए चलती है। वो उस ताकत के साथ चलती है जो खाना देने वाली है। उसके चक्के में कोई झटका नहीं आता, सब स्मूथ चलता है। ऐसे ही हमारी ज़िन्दगी भी सही चलनी चाहिए।
Mantra 35
हिरण्ययेन रथेन द्रवत्पाणिभिरश्वैः । धीजवना नासत्या ॥
नासत्य भाई, तुम सोने जैसी चमक वाली रथ गाड़ी में आओ। तुम्हारे घोड़े बहुत तेज़ हैं, जैसे उनके पैर में पंख हो। तुम दोनों दिमाग में तेज़ हो, जल्दी समझ में आते हो। हमारे पास आओ और हमारे दिमाग को भी तेज़ बना दो।
Mantra 36
युवं मृगं जागृवांसं स्वदथो वा वृषण्वसू । ता नः पृङ्क्तमिषा रयिम् ॥
अश्विन भाई, तुम दोनों ताकत वाले हो, सुख देने वाले हो। हमारे अंदर जो इंसान जाग रहा है, भगवान को ढूंढ रहा है, उसे तुम खुश रखो। हमें वो धन और सुख दो जो हमारे काम आए। हमें अंदर से भर दो।
Mantra 37
ता मे अश्विना सनीनां विद्यातं नवानाम् । यथा चिच्चैद्यः कशुः शतमुष्ट्रानां ददत्सहस्रा दश गोनाम् ॥
अश्विन भाई, तुम दोनों मेरी मदद करो। पुराने और नए सब का फायदा समझाओ। जैसे चैद्य कशु ने बहुत दिया था, सौ ऊंठ और दस हजार गायें। वैसे ही तुम भी हमें पावर और चमक के हजारों हिस्से दो।
Mantra 38
यो मे हिरण्यसंदृशो दश राज्ञो अमंहत । अधस्पदा इच्चैद्यस्य कृष्टयश्चर्मम्ना अभितो जनाः ॥
उसने मेरे लिए दस राजा की सोना जैसी पावर बढ़ा दी। चैद्य के लोग जो नीचे थे, वो भी सुरक्षित हो गए। धरम की सुरक्षा उनको चारों तरफ से ढाक लेती है। यह बड़ाई वाला देना इंसान को मजबूत बनाता है।
Mantra 39
माकिरेना पथा गाद्येनेमे यन्ति चेदयः । अन्यो नेत्सूरिरोहते भूरिदावत्तरो जनः ॥
कोई भी सिर्फ गाने का रास्ता न चले। चैद्य लोग अलग रास्ते पर चलते हैं। कोई और दाता उनसे बड़ा नहीं होता। यह लोग बहुत देने वाले हैं, सही रास्ता पकड़के चलना ऐसा ही होता है।
A vivid epiphany of Dawn: from far away she appears as if close, ruddy-flashing, spreading her beam in all directions.
The hymn moves from cosmic description to human petition—seeking nourishment, strength, cattle, and offspring—then folds in the Aśvins as swift agents who ‘bring’ thriving increase.
The strongest turning point is the direct boon-request: the divine powers are asked to convey ‘pīvarī iṣaḥ’—rich, nurturing increase—for energies, progeny, and herds (outer and inner wealth).
It closes by distinguishing the true track of progress from mere song-display, praising a community/patrons (Cedayas) as surpassing in generosity and thus aligned with the right path of increase.
vi bhānuṃ viśvadhā atanat
vahatam pīvarīr iṣaḥ
माकिरेना पथा गाद्येनेमे यन्ति चेदयः । अन्यो नेत्सूरिरोहते भूरिदावत्तरो जनः ॥It begins with clear Dawn (Uṣas) imagery—ruddy light and spreading beams—but later verses function as Aśvin petitions for nourishment and well-being. Many Mandala 8 hymns move fluidly between closely linked morning deities.
Cosmically it is sunrise filling the world with light; inwardly it points to clarity spreading through the mind, making right perception and right action possible.
That closing praise highlights that true prosperity is tied to right conduct and generosity. The hymn contrasts genuine increase and giving with mere show, presenting worthy patrons as models of the ‘right path.’
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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