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Sukta 7.34
Vasiṣṭha (Vasiṣṭhas)
Manīṣā (inspired thought) as a goddess-power; implicitly Sarasvatī/Vāc complex
Gāyatrī-like short verse (but exact meter uncertain from single pāda input; traditionally RV 7.34 is in Triṣṭubh/Jagatī mix—needs full hymn for confirmation)
RV 7.34 is a Vasiṣṭha hymn that invokes Manīṣā—bright inspired intelligence—as a goddess-power that carries the sacrifice forward like a well-built chariot. The verses move from the consecration of thought and speech into protective radiance that repels hostility and bodily affliction, and end with a broad benediction calling many divine and natural powers to grant peace, shelter, and lasting well-being.
Mantra 1
प्र शुक्रैतु देवी मनीषा अस्मत्सुतष्टो रथो न वाजी ॥
भगवान, हमारी सोच आगे बढ़े। वो सोच चमकदार हो जैसे रथ तैयार हो। वो हमारी पूजा को आगे ले जाए।
Mantra 2
विदुः पृथिव्या दिवो जनित्रं शृण्वन्त्यापो अध क्षरन्तीः ॥
रिशियों ने जाना कि धरती और आसमान कहाँ से पैदा हुए। पानी सुनता है और फिर बहने लगता है। वो अपने असली स्रोत को जानता है।
Mantra 3
आपश्चिदस्मै पिन्वन्त पृथ्वीर्वृत्रेषु शूरा मंसन्त उग्राः ॥
पानी धरती को भरता है और उसे स्थिर करता है। युद्ध में वीर सेना हिम्मत रखती है। वो आगे बढ़ती है और शक्ति बढ़ाती है।
Mantra 4
आ धूर्ष्वस्मै दधाताश्वानिन्द्रो न वज्री हिरण्यबाहुः ॥
उसके लिए जीतने की ताकत रख दो। जैसे इंद्र अपने बज्र से दुश्मनों को मारता है, वैसे ही वो भी सोना जैसी ताकत वाला है। उसको वो एनर्जी दो जो आगे बढ़ाए।
Mantra 5
अभि प्र स्थाताहेव यज्ञं यातेव पत्मन्त्मना हिनोत ॥
यज्ञ के काम में आगे बढ़ो, जैसे सुबह सूरज उठता है। खुद चल के यज्ञ को आगे ले जाओ, जैसे कोई मुसाफिर अपना रास्ता पकड़ लेता है।
Mantra 6
त्मना समत्सु हिनोत यज्ञं दधात केतुं जनाय वीरम् ॥
अपनी खुद की ताकत से यज्ञ को आगे बढ़ाओ। लोगों के लिए एक ऐसा निशान खड़ा करो जो उन्हे रास्ता दिखाए, एक ऐसा बल जो सबको लीड करे।
Mantra 7
उदस्य शुष्माद्भानुर्नार्त बिभर्ति भारं पृथिवी न भूम ॥
उसकी ताकत से एक चमक उठती है, जो दबती नहीं है। वो बोझ उठाता है जैसे धरती सब कुछ उठाती है, सब काम आगे चलता रहता है।
Mantra 8
ह्वयामि देवाँ अयातुरग्ने साधन्नृतेन धियं दधामि ॥
मैं देवताओं को बुलाता हूँ, अग्नि, सब सीधे रास्ते आओ। सच्चाई के साथ काम करके मैं अपना मन ठीक लगाता हूँ।
Mantra 9
अभि वो देवीं धियं दधिध्वं प्र वो देवत्रा वाचं कृणुध्वम् ॥
भगवान की बात को अपने अंदर बसा लो। अपनी ज़बान को देवताओं की तरफ करो। जब तुम ऐसा करते हो, तो तुम्हारी बात में ताकत आ जाती है।
Mantra 10
आ चष्ट आसां पाथो नदीनां वरुण उग्रः सहस्रचक्षाः ॥
वरुण भगवान हज़ारों आँखों वाले हैं। वो नदियों के रास्ते देखते हैं। यह नदियाँ दुनिया में भी बहती हैं और हमारे अंदर भी। वरुण सब जगह नज़र रखते हैं।
Mantra 11
राजा राष्ट्रानां पेशो नदीनामनुत्तमस्मै क्षत्रं विश्वायु ॥
वो राज्य के राजा हैं और नदियों का काम संभालते हैं। उनकी ताकत सबसे बड़ी होनी चाहिए। यह ताकत पूरी दुनिया के लिए है। सब कुछ सही चलता रहे।
Mantra 12
अविष्टो अस्मान्विश्वासु विक्ष्वद्युं कृणोत शंसं निनित्सोः ॥
जब हमारे ऊपर कोई आता है, तो हमारे लिए जीत बना दो। हर जगह हमारी जीत हो। जो भगवान की बात बोलना चाहता है, उसकी ज़बान चमकदार हो।
Mantra 13
व्येतु दिद्युद्द्विषामशेवा युयोत विष्वग्रपस्तनूनाम् ॥
दुश्मनों के ऊपर चमक फैल जाए। जो बुरा हमारे पास चिपका है, उसे हर तरफ से भगा दो। हमारे शरीर से दूर कर दो।
Mantra 14
अवीन्नो अग्निर्हव्यान्नमोभिः प्रेष्ठो अस्मा अधायि स्तोमः ॥
अग्नि ने हमें रक्षा की है। हमने उसे समर्पित किया और नमस्कार किया। वो सबसे प्यारा है, इसलिए हमारी प्रार्थना उसे ही है।
Mantra 15
सजूर्देवेभिरपां नपातं सखायं कृध्वं शिवो नो अस्तु ॥
देवताओं के साथ मिलकर आपम नपात को अपना दोस्त बना लो। वो हमारे लिए अच्छा हो और खुशी दे।
Mantra 16
अब्जामुक्थैरहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां रजस्सु षीदन् ॥
मैं गाते हुए पानी का साँप बुला रहा हूँ। वो नदियों के नीचे बैठता है और दुनिया के खुला जगह में रहता है।
Mantra 17
मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्ञो अस्य स्रिधदृतायोः ॥
अहि बुध्न्य हमें तकलीफ न दे। हमारी यज्ञ सच और सही रास्ते से न हट जाए।
Mantra 18
उत न एषु नृषु श्रवो धुः प्र राये यन्तु शर्धन्तो अर्यः ॥
इन लोगों में हमारा नाम बना हो। अच्छे लोग आगे बढ़ें और हमें धन और सुख मिलें।
Mantra 19
तपन्ति शत्रुं स्वर्ण भूमा महासेनासो अमेभिरेषाम् ॥
यह लोग दुश्मन को ऐसे जला देते हैं जैसे आसमान से तेज रोशनी आए। इतनी बड़ी सेना है इनकी, और इनकी ताकत के सामने कोई नहीं टिक सकता।
Mantra 20
आ यन्नः पत्नीर्गमन्त्यच्छा त्वष्टा सुपाणिर्दधातु वीरान् ॥
जब हमारी पत्नियाँ हमारे पास आएँ, तब त्वष्टा हम में ताकत डाले। वो ऐसा करे कि हम अंदर से स्ट्रॉंग बन जाएँ।
Mantra 21
प्रति नः स्तोमं त्वष्टा जुषेत स्यादस्मे अरमतिर्वसूयुः ॥
त्वष्टा हमारी प्रार्थना सुन ले। हमें ऐसा मन मिले जो सही चीज़ चाहता है, सच्ची दौलत, सच्ची खुशी।
Mantra 22
ता नो रासन्रातिषाचो वसून्या रोदसी वरुणानी शृणोतु । वरूत्रीभिः सुशरणो नो अस्तु त्वष्टा सुदत्रो वि दधातु रायः ॥
जो देवता देना जानते हैं, वो हमें दौलत दे। वरुणनी, यह दोनों दुनिया, हमारी पुकार सुन ले। वो हमें बचा ले ताकि हम सेफ रहें। त्वष्टा, जो अच्छा देता है, वो हमें पूरा धन दे।
Mantra 23
तन्नो रायः पर्वतास्तन्न आपस्तद्रातिषाच ओषधीरुत द्यौः । वनस्पतिभिः पृथिवी सजोषा उभे रोदसी परि पासतो नः ॥
पहाड़ हमें धन दे, पानी दे। जो देनेवाले हैं वो दे, पेड़-पौधे दे, आसमान भी दे। धरती और जंगल मिलके हमें चारों तरफ से बचा लें। दोनों दुनिया हमारा ख्याल रखें।
Mantra 24
अनु तदुर्वी रोदसी जिहातामनु द्युक्षो वरुण इन्द्रसखा । अनु विश्वे मरुतो ये सहासो रायः स्याम धरुणं धियध्यै ॥
दोनों दुनिया हमारे लिए खुल जायें, यह दुआ है। वरुण साथ चलें, वो चमकता है और इंद्र का दोस्त है। सब मरुत हमारे साथ आयें, वो बड़े बलवान हैं। हम पैसा और समझ दोनों पा जायें, पक्का हो।
Mantra 25
तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निराप ओषधीर्वनिनो जुषन्त । शर्मन्त्स्याम मरुतामुपस्थे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
इंद्र और वरुण, मित्र और अग्नि, पानी और पेड़-पौधे, जंगल की ताकत, यह सब हमारे काम से खुश हों। हम मरुत की शरण में शांति से रहें। आप लोग हमेशा हमे अच्छा रखें।
Manīṣā is the divine power of inspired thought—clear intelligence that becomes effective speech and prayer. The hymn treats her like a goddess who can be invoked to guide the sacrifice.
It asks for right inspiration at the start of worship and for protection against hostility and affliction. It concludes by requesting peace and lasting well-being (svasti) from many divine powers.
The closing verse widens the blessing to include the full sacred ecology—major gods (Indra, Varuṇa, Mitra, Agni) and life-supporting powers (waters, herbs, forests). This expresses a complete request for shelter, health, and harmony for the community.
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