
Sukta 7.3
Vasiṣṭha
Triṣṭubh
This hymn of Vasiṣṭha invokes Agni as the most worthy messenger (dūta) and priestly power who is firmly established among mortals yet bears the ṛta (Truth-order). Agni is praised in his radiant, solar-thunderous splendor and asked to kindle prosperity, clear intelligence (su-cetas/kratu), and lasting well-being for the singers and their community.
Mantra 1
अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा यजिष्ठं दूतमध्वरे कृणुध्वम् । यो मर्त्येषु निध्रुविॠतावा तपुर्मूर्धा घृतान्नः पावकः ॥
अग्नि देव को अपने लिए बनाओ, सब मिलकर। यह सबसे बड़ा पूजनीय है, यज्ञ का काम करता है। इंसानों में यह पक्का है, सच का काम करता है। इसका सिर जल रहा है, घी से बना है, साफ करता है।
Mantra 2
प्रोथदश्वो न यवसेऽविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात् । आदस्य वातो अनु वाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति ॥
अग्नि ऐसा निकलता है जैसे घोड़ा घास ढूँढने के लिए भागता है। वो बड़े एनक्लोज़र से बाहर आता है। फिर हवा उसकी आग के पीछे चलती है। जहाँ जहाँ अग्नि जाता है, वहाँ काला निशान रह जाता है। यह उसका रास्ता है जो दिख जाता है।
Mantra 3
उद्यस्य ते नवजातस्य वृष्णोऽग्ने चरन्त्यजरा इधानाः । अच्छा द्यामरुषो धूम एति सं दूतो अग्न ईयसे हि देवान् ॥
जब अग्नि नया पैदा होता है, वो बड़े बलवान है। उसकी आग कभी नहीं बुझती, वो फैलती रहती है। उसका लाल धुआँ आसमान की तरफ जाता है। वो देवताओं के पास जाता है जैसे कोई मैसेज ले कर जाता है। आसमान और ज़मीन को जोड़ता है।
Mantra 4
वि यस्य ते पृथिव्यां पाजो अश्रेत्तृषु यदन्ना समवृक्त जम्भैः । सेनेव सृष्टा प्रसितिष्ट एति यवं न दस्म जुह्वा विवेक्षि ॥
अग्नि की ताकत पूरी ज़मीन पर फैली है। वो अपने मुँह से सूखी जगह का खाना साफ कर देता है। वो आगे बढ़ता है जैसे कोई सेना छूटी है। वो दाना अलग कर लेता है जो आग में डालना है। अच्छा खराब को अलग कर देता है।
Mantra 5
तमिद्दोषा तमुषसि यविष्ठमग्निमत्यं न मर्जयन्त नरः । निशिशाना अतिथिमस्य योनौ दीदाय शोचिराहुतस्य वृष्णः ॥
लोग रात में और सुबह में अग्नि को साफ करते हैं। जैसे घोड़े को चमकाते हैं वैसे उसको चमकाते हैं। वो मेहमान की तरह आता है और अपनी जगह बैठता है। जब हवन किया जाता है, उसकी आग चमकने लगती है।
Mantra 6
सुसंदृक्ते स्वनीक प्रतीकं वि यद्रुक्मो न रोचस उपाके । दिवो न ते तन्यतुरेति शुष्मश्चित्रो न सूरः प्रति चक्षि भानुम् ॥
अग्नि का चेहरा देखने में बहुत अच्छा लगता है। वो चमकता है जैसे सोने का गहना पास में हो। उसकी ताकत आसमान की बिजली की तरह जाती है। वो सूरज की तरह चमकता है और सबको रोशनी देता है। सब कुछ साफ दिखा देता है।
Mantra 7
यथा वः स्वाहाग्नये दाशेम परीळाभिर्घृतवद्भिश्च हव्यैः । तेभिर्नो अग्ने अमितैर्महोभिः शतं पूर्भिरायसीभिर्नि पाहि ॥
हम अग्नि को घी और अच्छी दुआ के साथ पूजा करते हैं। जब हम 'स्वाहा' बोल के आहुति देते हैं, वो उन शब्दों से हमे बचाए। अग्नि की बहुत बड़ी शक्ति है, वो हमे रक्षा करता है। वो सौ लोहे के किले जैसा मज़बूत सुरक्षा दे। उसकी शक्ति को देख के कोई हमे हाथ नहीं लगा सकता।
Mantra 8
या वा ते सन्ति दाशुषे अधृष्टा गिरो वा याभिर्नृवतीरुरुष्याः । ताभिर्नः सूनो सहसो नि पाहि स्मत्सूरीञ्जरितॄञ्जातवेदः ॥
अग्नि, तुम्हारी जो भी शक्ति है, वो दान देने वाले के लिए है। तुम्हारी वही शक्ति हमे भी रक्षा करे। तुम जो शब्द बोलते हो, उनसे हिम्मत वाले लोग बड़े काम करते हैं। जातवेदस, तुम उन लोगों को भी बचाओ जो भगवान के गुण गाते हैं। उन्हे कोई बुरा हाथ नहीं लगा सके।
Mantra 9
निर्यत्पूतेव स्वधितिः शुचिर्गात्स्वया कृपा तन्वा रोचमानः । आ यो मात्रोरुशेन्यो जनिष्ट देवयज्याय सुक्रतुः पावकः ॥
जब अग्नि आगे बढ़ता है, वो बिल्कुल साफ है। जैसे कोई नयी कुल्हाड़ी चमक रही हो, वैसे ही वो चमकता है। उसकी अपनी जगह से वो रोशनी देता है। वो दो माँ से पैदा हुआ है, यह बात सबको पसंद आती है। भगवानों की पूजा के लिए वो आता है। उसका दिल साफ है और वो सही काम करता है।
Mantra 10
एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतुं सुचेतसं वतेम । विश्वा स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
अग्नि, तुम्हारी यह सब अच्छी चीज़ें हमारे लिए चमक रही हैं। हमारी इच्छा यह है कि हमारा दिमाग साफ रहे। जो लोग भगवान की स्तुति करते हैं, उनके लिए सब अच्छा हो। तुम हमेशा हमे अपनी शक्ति से बचाते रहो। हमे सुख मिले और कोई बुरा हो न सके।
Agni is established as the unanimous choice of the rite—most worshipful messenger, firmly set among mortals, bearer of ṛta and purifier.
Praise expands from Agni’s ritual role to his visible epiphany: golden radiance, near-at-hand brilliance, and a power that moves like thunder while illuminating like the sun.
Agni’s luminous manifestation becomes a revelation of divine force that both purifies and makes truth-visible—linking cosmic power with the sacrificer’s right understanding.
The hymn closes with a direct petition: may Agni blaze forth prosperity and grant clear-minded kratu; may all good accrue to the praisers, and may Agni guard them always with svasti.
yajiṣṭhaṃ dūtam adhvare
सुसंदृक्ते स्वनीक प्रतीकं वि यद्रुक्मो न रोचस उपाके । दिवो न ते तन्यतुरेति शुष्मश्चित्रो न सूरः प्रति चक्षि भानुम् ॥yūyaṃ pāta svastibhiḥ sadā naḥ
Agni is praised—the sacred Fire who serves as the messenger between humans and the gods and purifies the sacrifice.
The hymn asks Agni to blaze forth prosperity (saubhāgya), grant a clear and luminous will/intelligence (kratu), and protect the community with lasting well-being (svasti).
These images describe Agni’s visible and cosmic power: golden radiance (beauty and purity), thunder-like force (divine energy), and sun-like illumination (making truth and right action seen).
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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