Sukta 5.86
ता वृधन्तावनु द्यून्मर्ताय देवावदभा । अर्हन्ता चित्पुरो दधेंऽशेव देवावर्वते ॥
tā vṛ́dhantā́v ánu dyū́n mártāya devā́v adábhā | árhantā cit púraḥ dadhéṃ’śéva devā́v árvate ||
यह दोनों देवता दिन भर इंसान के लिए चलते रहते हैं। इनकी ताकत बढ़ती रहती है। कोई इन्हे हिला नहीं सकता। यह आगे निकल के रास्ता दिखाते हैं, जैसे कोई हक से हिस्सा ले। जीवन की ताकत आगे बढ़ने लगती है।
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