
Sukta 3.33
Viśvāmitra Gāthina (Kauśika)
Vipāṭ and Śutudrī (paired river-goddesses; also connected to Sindhu complex)
Jagatī
This hymn praises the paired river-goddesses Vipāṭ and Śutudrī as life-giving, swift, and maternal waters emerging from the mountains, and petitions them for safe passage and protection. It also recalls Indra’s archetypal deed of releasing the waters by striking the obstructing serpent/closures, linking the rivers’ free flow with divine victory over constraint. The sukta culminates in a practical, compassionate prayer that obstacles be swept away and that the “two guiltless ones” reach safety and well-being.
Mantra 1
प्र पर्वतानामुशती उपस्थादश्वे इव विषिते हासमाने । गावेव शुभ्रे मातरा रिहाणे विपाट् छुतुद्री पयसा जवेते ॥
पहाड़ियों से दो नदियाँ निकलती हैं। जैसे घोड़े पागल हो के दौड़ते हैं, वैसे ही यह भी दौड़ती हैं। माँ जैसे अपने बच्चे को चाटती है, वैसे यह नदियाँ भी हैं। दोनों नदियाँ पानी लेकर तेज़ भागती हैं। उनका पानी दूध जैसा साफ है।
Mantra 2
इन्द्रेषिते प्रसवं भिक्षमाणे अच्छा समुद्रं रथ्येव याथः । समाराणे ऊर्मिभिः पिन्वमाने अन्या वामन्यामप्येति शुभ्रे ॥
इंद्र इन दोनों नदियों को आगे बढ़ाता है। यह समुंदर की तरफ जाती हैं। जैसे रथ दौड़ता है, वैसे ही यह भी दौड़ती हैं। दोनों नदियाँ मिलती हैं। एक दूसरे के पास आती हैं। लहरों से भरी हैं।
Mantra 3
अच्छा सिन्धुं मातृतमामयासं विपाशमुर्वीं सुभगामगन्म । वत्समिव मातरा संरिहाणे समानं योनिमनु संचरन्ती ॥
हम सिंधु नदी के पास गए। यह नदी माँ जैसी है। थकती नहीं है। विपाश नदी बड़ी है। अच्छी है। दोनों नदियाँ जैसे माँ बच्चे को चाटती है, वैसे हैं। एक ही जगह से निकलती हैं। एक साथ भागती हैं।
Mantra 4
एना वयं पयसा पिन्वमाना अनु योनिं देवकृतं चरन्तीः । न वर्तवे प्रसवः सर्गतक्तः किंयुर्विप्रो नद्यो जोहवीति ॥
हम इस रास्ते पे जा रहे हैं, खाना और दूध से भर के। भगवान ने जो रास्ता बनाया है, उसके पीछे चल रहे हैं। यह धक्का पीछे नहीं जाता, आगे ही बढ़ता है। रिशि नदियों को पुकारता है, वो जानना चाहते हैं कि नदियाँ कहाँ जा रही हैं, और वो उनका साथ देंगे कि नहीं।
Mantra 5
रमध्वं मे वचसे सोम्याय ऋतावरीरुप मुहूर्तमेवैः । प्र सिन्धुमच्छा बृहती मनीषावस्युरह्वे कुशिकस्य सूनुः ॥
मेरा बोल सुनो, यह सोम से निकला है, धरम के रक्षक तुम लोग। थोड़ा वक़्त के लिए पास आओ, तुम्हारी रफ़्तार तेज़ है। मेरा मन सिंधु नदी की तरफ जा रहा है। मैं कुशि का बेटा हूँ, मुझे मदद चाहिए, इसलिए तुम्हे बुला रहा हूँ।
Mantra 6
इन्द्रो अस्माँ अरदद्वज्रबाहुरपाहन्वृत्रं परिधिं नदीनाम् । देवोऽनयत्सविता सुपाणिस्तस्य वयं प्रसवे याम उर्वीः ॥
इंद्र ने हमारे लिए रास्ता बनाया, उनके हाथ में वज्र था। उन्होंने वृत्र को मारा, जो नदियों को रोक के रखता था। सविता भगवान ने अच्छे हाथों से हमे आगे बढ़ाया। अब हम उस धक्के से बड़े-बड़े इलाके जा रहे हैं।
Mantra 7
प्रवाच्यं शश्वधा वीर्यं तदिन्द्रस्य कर्म यदहिं विवृश्चत् । वि वज्रेण परिषदो जघानायन्नापोऽयनमिच्छमानाः ॥
लोग हमेशा बताते हैं कि इंद्र कितने बलवान हैं। उन्होंने बड़े साँप को काट दिया। वज्र से मारा, और जो लोग रोक रहे थे वो बिखर गए। फिर पानी आगे बढ़ने लगा, अपना रास्ता ढूँढने लगा।
Mantra 8
एतद्वचो जरितर्मापि मृष्ठा आ यत्ते घोषानुत्तरा युगानि । उक्थेषु कारो प्रति नो जुषस्व मा नो नि कः पुरुषत्रा नमस्ते ॥
गाने वाले, मेरा बोल मत भूलना। तुम्हारी आवाज़ आगे के ज़माने तक सुननी चाहिए। हमारे गानों में जो बात है उस्से एक्सेप्ट करो, हमारे साथ हो जाओ। हमें कहीं गिरा मत देना, जो इंसान के काम आता है, उसको नमस्ते।
Mantra 9
ओ षु स्वसारः कारवे शृणोत ययौ वो दूरादनसा रथेन । नि षू नमध्वं भवता सुपारा अधोअक्षाः सिन्धवः स्रोत्याभिः ॥
हे बहने, सुनो इस गाने वाले की आवाज़। वो तुम्हारे पास दूर से आ रहा है, गाड़ी और रथ ले के। झुक जाओ, नरम हो जाओ। ऐसे पानी बनो कि पार करना आसान हो। नदियाँ, तुम्हारी धार नीचे हो, सिर्फ पहिए के बराबर।
Mantra 10
आ ते कारो शृणवामा वचांसि ययाथ दूरादनसा रथेन । नि ते नंसै पीप्यानेव योषा मर्यायेव कन्या शश्वचै ते ॥
हम तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहते हैं, तुम्हारे शब्द सुनना चाहते हैं। तुम दूर से आई हो, गाड़ी और रथ ले के। हमारे पास झुक जाओ, जैसे कोई औरत प्यार से झुकती है। जैसे कोई नये दुल्हन का इंतज़ार करती है, वैसे ही तुम हमेशा हमारे पास रहो।
Mantra 11
यदङ्ग त्वा भरताः संतरेयुर्गव्यन्ग्राम इषित इन्द्रजूतः । अर्षादह प्रसवः सर्गतक्त आ वो वृणे सुमतिं यज्ञियानाम् ॥
जब भरत लोग तुम्हे पार करेंगे, वो गाय-भैंस ढूंढ रहे होंगे। इंद्र उनकी मदद करेगा। तब यह पानी आगे बढ़ेगा, ऐसे ही बहने लगेगा। मैं तुमसे यह दुआ मांगता हूँ कि यज्ञ करने वाले लोगों की मदद करो।
Mantra 12
अतारिषुर्भरता गव्यवः समभक्त विप्रः सुमतिं नदीनाम् । प्र पिन्वध्वमिषयन्तीः सुराधा आ वक्षणाः पृणध्वं यात शीभम् ॥
भरत लोग पार कर गए, वो गाय-भैंस ढूंढ रहे थे। रिशि ने नदियों से सही बात कर ली। पानी भरो, आगे बढ़ो, अपनी धार तेज़ करो। अपने आप को भरो और जल्दी चलो।
Mantra 13
उद्व ऊर्मिः शम्या हन्त्वापो योक्त्राणि मुञ्चत । मादुष्कृतौ व्येनसाघ्न्यौ शूनमारताम् ॥
उठता हुआ लहर लकड़ी के खंभों को मार के हटा दे। पानी, तुम गाड़ी की रस्सियाँ खोल दो। जो लोग कोई बुरा काम नहीं किए, उन्हे तकलीफ़ मत देना। वो सेफ रहें, ठीक रहें।
A vivid, poetic emergence: the two rivers surge from the mountains, radiant and maternal, rushing with nourishing ‘milk.’
Praise becomes petition: the rivers are asked to grant a safe course, while the hymn widens into the cosmic myth of Indra breaking the serpent/closures so the waters may seek their path.
Indra’s celebrated act of cutting the serpent and smashing the encircling resistances—after which the waters advance, desiring their way (ayanam).
A concrete closing prayer: may waves strike away stakes, may yokes be loosened, and may the guiltless be unharmed—arriving at safety and well-being.
प्र पर्वतानामुशती उपस्थादश्वे इव विषिते हासमाने । गावेव शुभ्रे मातरा रिहाणे विपाट् छुतुद्री पयसा जवेते ॥प्रवाच्यं शश्वधा वीर्यं तदिन्द्रस्य कर्म यदहिं विवृश्चत् । वि वज्रेण परिषदो जघानायन्नापोऽयनमिच्छमानाः ॥उद्व ऊर्मिः शम्या हन्त्वापो योक्त्राणि मुञ्चत । मादुष्कृतौ व्येनसाघ्न्यौ शूनमारताम् ॥They are paired river-goddesses praised as swift, bright, nourishing waters. The hymn treats them as living divine powers who can grant a safe path and protection.
It recalls the Vedic myth where Indra breaks the obstruction that held back the waters. This frames the rivers’ flowing as a cosmic act of liberation—opening pathways and restoring abundance.
Traditionally it suits prayers near water—especially before crossing a river—asking the waters to remove obstacles and bring travelers to safety. More broadly, it is recited for clearing blockages and restoring ‘flow’ in life and mind.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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