Sukta 2.10
आ विश्वतः प्रत्यञ्चं जिघर्म्यरक्षसा मनसा तज्जुषेत । मर्यश्रीः स्पृहयद्वर्णो अग्निर्नाभिमृशे तन्वा जर्भुराणः ॥
ā viśvátaḥ prátyañcaṃ jigharmy arakṣásā mánasā tát juṣeta | márya-śrīḥ spṛháyad-varṇo agnír nā́bhimṛ́śe tanvā́ jarbhurā́ṇaḥ ||
मैं हर तरफ से उस शक्ति को अपनी तरफ खींचता हूँ जो अंदर की तरफ मुड़ी है। मेरा मन बिल्कुल साफ है, कोई बुरी ताकत नहीं है। वो मुझसे जुड़ जाए। अग्नि चमक में नया है, वो रोशनी का रंग चाहता है। वो अपनी बॉडी से नाभि के पास चिपक जाता है। वो हिलता-डुलता रहता है, साफ करने के लिए।
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