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Sukta 10.8
Agni
Trishtubh (probable; needs verification)
This hymn praises Agni as a cosmic power whose light-banner strides between Heaven and Earth, growing in the Waters and guarding Ṛta (cosmic order). It unfolds Agni’s many identities—seer-light, Varuṇa-like upholder of law, Apāṃ Napāt, and the envoy who conveys offerings—while also recalling a mythic episode of Indra’s victory over Viśvarūpa to underline the triumph of ordered power over arrogance.
Mantra 1
प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति । दिवश्चिदन्ताँ उपमाँ उदानळपामुपस्थे महिषो ववर्ध ॥
अग्नि बहुत बड़ी रोशनी लेकर निकला है, जैसे कोई झंडा ले के चल रहा हो। वो बैल की तरह आवाज़ कर रहा है, दुनिया के तरफ। वो आसमान के किनारे तक पहुँच गया, और उससे भी आगे बढ़ गया। पानी में उसे बड़ा किया गया, वो बहुत ताकतवर है।
Mantra 2
मुमोद गर्भो वृषभः ककुद्मानस्रेमा वत्सः शिमीवाँ अरावीत् । स देवतात्युद्यतानि कृण्वन्त्स्वेषु क्षयेषु प्रथमो जिगाति ॥
अग्नि जब पैदा हुआ तो खुश हुआ, जैसे एक ताकतवर बैल। वो बच्चे जैसा है जो थका नहीं, जो भागता है और आवाज़ निकालता है। वो सबसे पहले भगवान के पास जाता है। अपने घर में सबसे आगे चलता है, और भगवान के लिए रास्ता बनाता है।
Mantra 3
आ यो मूर्धानं पित्रोररब्ध न्यध्वरे दधिरे सूरो अर्णः । अस्य पत्मन्नरुषीरश्वबुध्ना ऋतस्य योनौ तन्वो जुषन्त ॥
अग्नि ने दोनों माता-पिता के सर का हिस्सा लिया और उसे यज्ञ में रख दिया। वो सूरज जैसी चमक के साथ पानी में बहाव लाया। उसकी राह में लाल ताकत है, घोड़े जैसी तेज़, जो धरम की गोद में खुश रहती है, अपने शरीर में।
Mantra 4
उषौषो हि वसो अग्रमेषि त्वं यमयोरभवो विभावा । ऋताय सप्त दधिषे पदानि जनयन्मित्रं तन्वे स्वायै ॥
अग्नि, तू हर सुबह सबसे पहले जाता है। तू दोनों ताकतों में चमकता है। धरम के लिए तूने सात कदम रखे। तूने मित्र को पैदा किया, जो तेरा अपना रूप है।
Mantra 5
भुवश्चक्षुर्मह ऋतस्य गोपा भुवो वरुणो यदृताय वेषि । भुवो अपां नपाज्जातवेदो भुवो दूतो यस्य हव्यं जुजोषः ॥
तू दुनिया की आँख बन जाता है, धरम का रक्षक। तू वरुण बन जाता है जब धरम को अपना लेता है। तू पानी का बेटा है, जातवेदस। तू दूत बन जाता है जो भगवान की भेंट खुशी से लेता है।
Mantra 6
भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः । दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकृषे हव्यवाहम् ॥
तू यज्ञ का और दुनिया का लीडर है। अच्छी ताकतों के साथ जुड़ के चलता है। आसमान में तेरा सर है, चमकता हुआ। अग्नि, तूने अपनी जीभ बनाई जो भगवान की भेंट ले जाती है।
Mantra 7
अस्य त्रितः क्रतुना वव्रे अन्तरिच्छन्धीतिं पितुरेवैः परस्य । सचस्यमानः पित्रोरुपस्थे जामि ब्रुवाण आयुधानि वेति ॥
त्रित ने अपनी मर्ज़ी से अंदर का रास्ता चुना। वो बड़े पिता की सोच ढूँढ़ रहा था, अपनी चाल से। वो पिता की गोद में बैठा था, अपना मान रख के। अपने पुरखों की ताकत लेके वो आगे बढ़ रहा है।
Mantra 8
स पित्र्याण्यायुधानि विद्वानिन्द्रेषित आप्त्यो अभ्ययुध्यत् । त्रिशीर्षाणं सप्तरश्मिं जघन्वान्त्वाष्ट्रस्य चिन्निः ससृजे त्रितो गाः ॥
त्रित जानता था कि उसके पुरखों की ताकत एक हथियार है। इंद्र ने उसे उठाया, और वो लड़ने निकला। उसने दुश्मन को मारा जो तीन सर वाला था, और सात किरण वाला था। उसने गायें आज़ाद की, रोशनी और ज्ञान की किरण।
Mantra 9
भूरीदिन्द्र उदिनक्षन्तमोजोऽवाभिनत्सत्पतिर्मन्यमानम् । त्वाष्ट्रस्य चिद्विश्वरूपस्य गोनामाचक्राणस्त्रीणि शीर्षा परा वर्क् ॥
इंद्र बहुत ताकत वाला था। उसने दुश्मन की हवा तोड़ दी, जो खुद को बड़ा समझता था। उसने त्वष्टा के विश्वरूप के तीन सर काट दिए। जब वो गायें बना रहा था, तब इंद्र ने उसे मारा।
It praises Agni as a cosmic force of light who moves between heaven and earth, grows in the waters, and protects Ṛta (cosmic order). It also presents Agni as the messenger who carries offerings to the gods.
It points to Agni’s hidden, mysterious origin and presence within the waters—an ancient Vedic way of saying that fiery power and divine light can be ‘born’ from what seems opposite, and can emerge from the depths.
The episode serves as a moral-cosmic illustration: arrogant, disordering power is cut down, and Ṛta is restored. That supports the hymn’s central idea that right order must prevail for sacrifice and life to flourish.
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