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Sukta 10.142
Agni
This short Agni hymn presents the worshipper’s complete reliance on Agni as the only sure refuge, asking for a “triple-guarded” protection against harm and violators. It then portrays Agni as a unifying, ordering power—bringing many movements onto one right course—and ends with imagery of auspicious growth and waters (dūrvā grass, lakes, lotuses) attending the deity’s coming and going.
Mantra 1
अयमग्ने जरिता त्वे अभूदपि सहसः सूनो नह्यन्यदस्त्याप्यम् । भद्रं हि शर्म त्रिवरूथमस्ति त आरे हिंसानामप दिद्युमा कृधि ॥
अग्निजी, यह गाना वाला अब आपसे जुड़ गया है। आप ताकत के बेटा हो, और कोई और सेफ जगह नहीं मिलती। आपकी शरण अच्छी है, तीन तरफ से सुरक्षित। हमें दुश्मनों के मार से दूर रखना। चमकता हुआ सुरक्षा चक्र हमारे अराउंड बना दो।
Mantra 2
प्रवत्ते अग्ने जनिमा पितूयतः साचीव विश्वा भुवना न्यृञ्जसे । प्र सप्तयः प्र सनिषन्त नो धियः पुरश्चरन्ति पशुपा इव त्मना ॥
अग्नि, आप पैदा होते हो और आगे बढ़ते हो, अपने बाप को ढूंढते हुए। आप एक स्ट्रांग दोस्त की तरह सारी दुनिया को सही जगह पे लगाते हो। सात किरणाएं आगे बढ़ती हैं और हमारे लिए अच्छे आइडियाज लाती हैं। वो आगे चल रहे हैं जैसे कोई पशु पालक अपने जानवरों को ले चल रहा हो।
Mantra 3
उत वा उ परि वृणक्षि बप्सद्बहोरग्न उलपस्य स्वधावः । उत खिल्या उर्वराणां भवन्ति मा ते हेतिं तविषीं चुक्रुधाम ॥
अग्नि, आप खुले आसमान में बैठे हो और अपना रास्ता खुद चुनते हो। बंजर ज़मीन भी अब फसल देने लगती है। हम आपकी ताकत को गुस्सा नहीं दिलाना चाहते। बस यह दुआ है कि आपकी एनर्जी हमारे काम आए और हम आगे बढ़ें।
Mantra 4
यदुद्वतो निवतो यासि बप्सत्पृथगेषि प्रगर्धिनीव सेना । यदा ते वातो अनुवाति शोचिर्वप्तेव श्मश्रु वपसि प्र भूम ॥
जब आप ऊपर से नीचे आते हो, तो एक जीतने वाली फौज की तरह फैल जाते हो। हवा आपके पीछे चलती है और आपकी आग ज़मीन को साफ करती है। जैसे नाई दाढ़ी काट देता है, वैसे ही आप ज़मीन को साफ करके नया ग्रोथ देते हो।
Mantra 5
प्रत्यस्य श्रेणयो ददृश्र एकं नियानं बहवो रथासः । बाहू यदग्ने अनुमर्मृजानो न्यङ्ङुत्तानामन्वेषि भूमिम् ॥
अग्नि के सामने बहुत सारे रथ एक ही तरफ जा रहे हैं। जैसे कोई लाइन बनी हो। जब अग्नि अपने हाथ से ज़मीन को साफ करता है, तो बिखरे हुए रास्तों को एक कर देता है। सब काम एक डायरेक्शन में हो जाते हैं।
Mantra 6
उत्ते शुष्मा जिहतामुत्ते अर्चिरुत्ते अग्ने शशमानस्य वाजाः । उच्छ्वञ्चस्व नि नम वर्धमान आ त्वाद्य विश्वे वसवः सदन्तु ॥
अग्नि, अब ऊपर उठ। अपनी ताकत के साथ सारे रास्ते साफ कर। तेरी आग चमक उठी है। जो लोग मेहनत करते हैं, उनके लिए तु शक्ति का खज़ाना है। सीधा खड़ा हो जा और झुक के प्रणाम कर। आज सब वसु देवता तुम्हारे पास आके बैठ जायेंगे।
Mantra 7
अपामिदं न्ययनं समुद्रस्य निवेशनम् । अन्यं कृणुष्वेतः पन्थां तेन याहि वशाँ अनु ॥
यह पानी का रास्ता है जो नीचे जाता है। समुंदर यहीं ठहरता है। अब तू दूसरा रास्ता बना ले, यहाँ से दूर जा। अपनी इच्छा के हिसाब से चल।
Mantra 8
आयने ते परायणे दूर्वा रोहन्तु पुष्पिणीः । ह्रदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमे ॥
जब तू आता है और जब जाता है, तो घास उग आए, फूलों के साथ। झीलें भी हो और कमल के फूल भी खिलें। यह सब समुंदर के घर बन गए हैं।
It centers on trusting Agni as the only secure refuge, asking him to keep harm and hostile forces far away and to set a bright protective boundary around the worshipper.
The phrase suggests a perfectly secured protection—symbolically guarded on all sides (and often understood as protection across multiple levels: physical, vital, and mental/spiritual).
They function as an auspicious closing blessing: when Agni’s presence and guidance are established, the world becomes orderly and fertile—signaled by dūrvā grass, lakes, and white lotuses.
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