Sukta 1.62
सनात्सनीळा अवनीरवाता व्रता रक्षन्ते अमृताः सहोभिः । पुरू सहस्रा जनयो न पत्नीर्दुवस्यन्ति स्वसारो अह्रयाणम् ॥
sanā́t sanī́ḷā avánīr avātā́ vratā́ rakṣante amṛ́tāḥ sáhobhiḥ | purū́ sahásrā jánayo ná pátnīr duvasyánti svásāro áhrayāṇam ||
यह मंत्र बताता है कि देवता पुराने ज़माने से एक साथ रहते हैं। वो अपने नियम को पक्का करके रखते हैं। हज़ारों लोग उनकी सेवा करते हैं। जैसे पत्नियाँ और बहनें अपने घर वाले की सेवा करती हैं, वैसे ही यह लोग भी करते हैं। वो कभी थकते नहीं हैं।
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