Sukta 1.189
त्वं ताँ अग्न उभयान्वि विद्वान्वेषि प्रपित्वे मनुषो यजत्र । अभिपित्वे मनवे शास्यो भूर्मर्मृजेन्य उशिग्भिर्नाक्रः ॥
tváṃ tā́m̐ agna ubhayā́n ví vidvā́n véṣi prapitvé mánuṣo yajatra | abhípitve mánave śā́syo bhūr marmṛjényā uśígbhir nā́kraḥ ||
अग्नि, तुम दोनों तरफ की बात जानते हो। तुम पुरखों का रास्ता भी दिखाते हो और इंसान का रास्ता भी। तुम यज्ञ के लायक हो। इंसान के लिए जो पास का रास्ता है, उसमें तुम हमारे गाइड बनो। तुम साफ हो और साफ करते हो, रिशियों के साथ रह के, कभी हारे नहीं।
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