Sukta 1.140
कृष्णप्रुतौ वेविजे अस्य सक्षिता उभा तरेते अभि मातरा शिशुम् । प्राचाजिह्वं ध्वसयन्तं तृषुच्युतमा साच्यं कुपयं वर्धनं पितुः ॥
kṛṣṇa-prutau vevije asya sa-kṣitau ubhā tarete abhi mātarā śiśum | prācājihvaṃ dhvasayantaṃ tṛṣu-cyutam ā sācyam kupayaṃ vardhanaṃ pituḥ ||
अग्नि के दो घर है, दोनों में वो बच्चे की तरह रहता है। अंधेरे में दोनों माताँ हिल रही हैं, बच्चा उठा के ले जा रही हैं। वो अपनी जीभ आगे निकाल के बुरी चीज़ें भगा देता है। प्यास में फिसल के निकलता है, सही तरफ आता है। यह पिताजी की शक्ति बढ़ा रहा है।
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