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Sukta 1.135
Gautama Rāhūgaṇa (traditional attribution for RV 1.135)
Vāyu (with Indra-Vāyu as associated dyad in the hymn)
Jagatī (probable for RV 1.135; verse shows extended cadence typical of Jagatī)
RV 1.135 is an invitatory Soma hymn calling Vāyu—often in the paired presence of Indra-Vāyu—to arrive swiftly to the well-spread barhis and drink the first Soma. It celebrates the bright, fast-flowing Soma streams, their passage through the woolen filter, and Vāyu’s irresistible, sun-ray-like powers that cannot be held back. The hymn’s purpose is to secure the deity’s immediate approach, first-drinking, and bestowal of vigor, exhilaration, and effective will (kratu) upon the sacrificers.
Mantra 1
स्तीर्णं बर्हिरुप नो याहि वीतये सहस्रेण नियुता नियुत्वते शतिनीभिर्नियुत्वते । तुभ्यं हि पूर्वपीतये देवा देवाय येमिरे । प्र ते सुतासो मधुमन्तो अस्थिरन्मदाय क्रत्वे अस्थिरन् ॥
यहाँ आसन बिछा दिया है। वायु देवता, हमारे पास आओ। तुम्हारे लिए भोजन तैयार है। तुम्हारा रथ हज़ारों ताकत से जुड़ा है। भगवान लोगों ने तुम्हारे लिए पहले ही पीने का इंतज़ार किया है। मध जैसा मीठा सोम रस रख दिया गया है। यह तुम्हे ताकत देता है और दिमाग खोला रखता है।
Mantra 2
तुभ्यायं सोमः परिपूतो अद्रिभिः स्पार्हा वसानः परि कोशमर्षति शुक्रा वसानो अर्षति । तवायं भाग आयुषु सोमो देवेषु हूयते । वह वायो नियुतो याह्यस्मयुर्जुषाणो याह्यस्मयुः ॥
तुम्हारे लिए सोम रस साफ किया गया है। पत्थर से उसको निचोड़ा है और वो चमकता हुआ बर्तन में बाहर आता है। यह तुम्हारा हिस्सा है। देवता लोगों में यह सबसे खास है। वायु, अपनी ताकत लेकर आओ। जो लोग तुम्हे ढूंढते हैं, उनके पास आओ। हमें भी अपनी कृपा से खुश करो।
Mantra 4
आ वां रथो नियुत्वान्वक्षदवसेऽभि प्रयांसि सुधितानि वीतये वायो हव्यानि वीतये । पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम् । वायवा चन्द्रेण राधसा गतमिन्द्रश्च राधसा गतम् ॥
तुम्हारा रथ यहाँ आए, हमारे काम आए। वायु, भोजन के लिए आओ। मीठा रस पियो, तुम दोनों के लिए पहले का गिलास रखा है। वायु, चमक के साथ आओ। इंद्र भी तुम्हारे साथ आए, दोनों ताकत लेकर आओ।
Mantra 5
आ वां धियो ववृत्युरध्वराँ उपेममिन्दुं मर्मृजन्त वाजिनमाशुमत्यं न वाजिनम् । तेषां पिबतमस्मयू आ नो गन्तमिहोत्या । इन्द्रवायू सुतानामद्रिभिर्युवं मदाय वाजदा युवम् ॥
हमारी नज़र तुम पर है, यज्ञ के लिए आओ। सोम रस साफ हो रहा है, जैसे तेज़ घोड़ा दौड़ता है। जो लोग तुम्हे ढूंढते हैं, उनके लिए पियो और हमारे पास आओ। इंद्र और वायु, सोम रस पत्थर से निकला है। तुम दोनों आओ, ताकत दो और खुशी लाओ।
Mantra 6
इमे वां सोमा अप्स्वा सुता इहाध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत । एते वामभ्यसृक्षत तिरः पवित्रमाशवः । युवायवोऽति रोमाण्यव्यया सोमासो अत्यव्यया ॥
सोम रस पानी में निचोड़ा गया है। पुजारी लोग उसे लेकर आए हैं, वायु के लिए। यह चमकता हुआ रस आगे बढ़ रहा है, कपड़े से गुज़र के आ रहा है। नया ताज़ा रस ऊपर आ रहा है, जैसे उमंग होता है।
Mantra 7
अति वायो ससतो याहि शश्वतो यत्र ग्रावा वदति तत्र गच्छतं गृहमिन्द्रश्च गच्छतम् । वि सूनृता ददृशे रीयते घृतमा पूर्णया नियुता याथो अध्वरमिन्द्रश्च याथो अध्वरम् ॥
हे वायु, आगे बढ़ो, हमेशा चलते रहने वाले से गुज़र के आओ। जहाँ पत्थर से रस निकलता है, वहाँ जाओ, अपने घर जाओ, और इंद्र भी वहाँ जाओ। सच का चमकता हुआ रूप साफ दिखने लगता है। घी जैसा साफ रस बहने लगता है। अपनी पूरी ताकत लगाके यज्ञ तक पहुँचो, यज्ञ तक पहुँचो, और इंद्र भी।
Mantra 8
अत्राह तद्वहेथे मध्व आहुतिं यमश्वत्थमुपतिष्ठन्त जायवोऽस्मे ते सन्तु जायवः । साकं गावः सुवते पच्यते यवो न ते वाय उप दस्यन्ति धेनवो नाप दस्यन्ति धेनवः ॥
यहाँ तुम दोनों मध का भोग उठा के लाए हो, जहाँ लोग पीपल के पेड़ के पास इकट्ठे होते हैं। वो लोग हमारे साथ हों। साथ-साथ चमकता हुआ रूप पैदा होता है, और अन्न पक के तैयार होता है। हे वायु, तुम्हारे लिए जो शक्तियाँ हैं वो कभी हार्थ नहीं मानती। जो पोषण करते हैं वो कभी पीछे नहीं हटती।
Mantra 9
इमे ये ते सु वायो बाह्वोजसोऽन्तर्नदी ते पतयन्त्युक्षणो महि व्राधन्त उक्षणः । धन्वञ्चिद्ये अनाशवो जीराश्चिदगिरौकसः । सूर्यस्येव रश्मयो दुर्नियन्तवो हस्तयोर्दुर्नियन्तवः ॥
यह तुम्हारी ताकतें हैं, वायु, बहुत ताकतवर। नदी के अंदर उड़ते हैं जैसे बैल उड़ रहे हों, और बड़े-बड़े हो रहे हैं। सूखे इलाके में भी रुकते नहीं, पहाड़ पर भी थकते नहीं। सूरज की किरणों जैसी हैं, रोकना मुश्किल है, हाथों में पकड़ना मुश्किल है।
The hymn is primarily addressed to Vāyu (the Wind/Breath), with Indra-Vāyu appearing as an associated pair in the Soma-ritual context.
In Soma rites Vāyu is traditionally invited to drink first (pūrvapā/pūrvapītaye), meaning the offering is prepared for his swift arrival at the earliest pressing to quicken vitality and exhilaration.
It refers to Soma being clarified through the woolen strainer (pavitra/āvya). The image of swift streams running beyond the filter highlights purity, brightness, and readiness for offering to the deity.
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