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सोपान-शिखर: ‘अनुभव से सिद्धांत’—लीला के भीतर ब्रह्माण्ड-दर्शन (विराट्) से भक्त का ‘अचल अनुराग’ और ‘अबिरल भक्ति’ तक। यहाँ कथा सामाजिक/धार्मिक व्यवस्था का उपसंहार नहीं मात्र, बल्कि साधक-चित्त की अंतिम शुद्धि है: माया-भ्रम का निराकरण, दास्य-भक्ति का वर, और ‘भक्ति-प्रधान’ सिद्धान्त का उपदेश।
यह खण्ड ‘अनुभव से सिद्धान्त’ की कसौटी है: विराट्-दर्शन (ज्ञान/अद्भुत) अपने आप में अंतिम नहीं—वह भय, भ्रम और समय-विस्तार का ‘मोह-कलिल’ भी बन सकता है। नेत्र मूँदना साधक की सीमा का संकेत है: अनन्त को देखने की क्षमता कृपा-आधारित है। कोसलपुर की ओर लौटना ‘धाम-आश्रय’ और ‘स्मृति-शरण’ का प्रतीक है—भक्ति का घर। बाल-लीला में निर्गुण-संकेत (अनादि/अज/अगुन) सगुण-माधुर्य से अविच्छिन्न रहता है: वही विराट् जो ब्रह्माण्ड धारण करता है, वही माता की गोद में दूध पीता है—यह विरोध नहीं, लीला का रहस्य है। निष्कर्षतः, दर्शन का फल ‘परतीति’ (विश्वास) है; परतीति से ‘प्रीति’ और प्रीति से ‘अबिरल भक्ति’—यही मानस का भक्ति-प्रधान सिद्धान्त।
Verse 168 (चौपाई)
मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।। मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं।। उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।। अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।। कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।। अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।। सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा।। सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।।
mūdeuṁ nayan trasit jab bhayauṁ, puni citavat kosalapura gayauṁ. mohi biloki rāma musukāhīṁ, bihaṁsat turata gayauṁ mukha māhīṁ. udara mājha sunu aṇḍaja rāyā, dekheuṁ bahu brahmāṇḍa nikāyā. ati bicitra tahaṁ loka anekā, racanā adhika eka te ekā. koṭinhiṁ caturānana gaurīsā, aganita uḍagana rabi rajanīsā. aganita lokapāla jama kālā, aganita bhūdhara bhūmi bisālā. sāgara sari sara bipina apārā, nānā bhāँti sṛṣṭi bistārā. sura muni siddha nāga nara kiṁnara, cāri prakāra jīva sacarācara.
जब मैं डर गया तो आँखें बंद कर ली। फिर जब खोला तो अयोध्या में था। राम ने मुझे देखा और मुस्काया। जब वो हँसे, मैं तुरंत उनके मुँह में आ गया। सुनो अंडे से पैदा होने वाले राजा, उनके पेट के अंदर मैंने बहुत सारे ब्रह्मांड देखे। वहाँ अनेक दुनिया थी, बहुत अजीब। हर एक पहले से बड़ा। लाखों ब्रह्मा और शिव थे। गणित नहीं, कितने तारे, सूरज, चाँद थे। कितने लोक-पाल, यम, काल थे। कितने पहाड़ और बड़ी ज़मीन थी। समुंदर, नदियाँ, झील, जंगल, सब अपार थे। रचना अनेक तरह की थी। देवता, रिशि, सिद्ध, नाग, इंसान, किन्नर, सब चलने वाले और न चलने वाले जीव थे।
Verse 169 (दोहा/सोरठा)
जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ। सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ।।80(क)।। एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक। एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक।।80(ख)।।
jo nahiṁ dekhā nahiṁ sunā jo manahūṁ na samāi, so saba adbhuta dekheuṁ barani kavan bidhi jāi. 80(ka) eka eka brahmāṇḍa mahuṁ rahauṁ baraṣa sata eka, ehi bidhi dekhat phirauṁ maiṁ aṇḍa kaṭāha aneka. 80(kha)
जो चीज़ें मैंने कभी नहीं देखी, कभी नहीं सुनी, और सोच भी नहीं सकती थी, वोह सब मैंने देख लिया। यह कितना अद्भुत है, बताना मुश्किल है। हर ब्रह्मांड में मैं सौ साल तक रहा। ऐसे ही देखते-देखते मैं अनेक ब्रह्मांड घूमता रहा।
Verse 170 (चौपाई)
लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।। नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला।। देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती।। महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।। अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा।। अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।। दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।। प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा।।
loka loka prati bhinna bidhātā, bhinna biṣṇu siva manu disitrātā. nara gandharba bhūta betālā, kiṁnara nisicara pasu khaga byālā. deva danuja gana nānā jātī, sakala jīva tahaṁ ānahi bhāँtī. mahi sari sāgara sara giri nānā, saba prapañca tahaṁ ānai ānā. aṇḍakosa prati prati nija rūpā, dekheuṁ jinasa aneka anūpā. avadhapurī prati bhuvana ninārī, sarajū bhinna bhinna nara nārī. dasaratha kausalya sunu tātā, bibidha rūpa bharatādika bhrātā. prati brahmāṇḍa rāma avatārā, dekhauṁ bāla-binoda apārā.
हर दुनिया में अलग ब्रह्मा था, अलग विष्णु, अलग शिव। वहाँ लोग थे, गंधर्व थे, भूत थे, पिशाच थे। हर तरह के जीव थे, देव थे, दानव थे। हर जगह ज़मीन थी, नदियाँ थीं, समुंदर थे, पहाड़ थे। हर ब्रह्मांड अलग था, मैंने अनेक रूप देखे। हर ब्रह्मांड में अयोध्या थी, सरयू नदी थी, लेकिन सब अलग-अलग। दशरथ और कौसल्या थे, भरत और भाई थे, लेकिन रूप अलग। हर ब्रह्मांड में राम का अवतार था, उनकी बाल लीला थी।
Verse 171 (दोहा/सोरठा)
भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान। अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन।।81(क)।। सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर। भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर।।81(ख)
bhinna bhinna maiṁ dīkha sabu ati bicitra harijān, aganita bhuvana phireuṁ prabhu rāma na dekheuṁ ān. 81(ka) soi sisupan soi sobhā soi kṛpāla raghubīra, bhuvana bhuvana dekhat phirauṁ prerita moha samīra. 81(kha)
सब कुछ अलग था, हर चीज़ अजब थी। मैं अनेक दुनिया घूमा, लेकिन सिर्फ़ राम को देखता रहा। वोही बचपन, वोही सुंदरता, वोही दयालु राम। मैं दुनिया से दुनिया घूमता रहा, देखता रहा, मेरा मन हैरान था।
Verse 172 (चौपाई)
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।। फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।। निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ।। देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।। राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना।। तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।। करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी।। उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।।
bhramat mohi brahmāṇḍa anekā, bīte manahuṁ kalpa sata ekā. phirat phirat nija āśrama āyauṁ, tahaṁ puni rahi kachu kāla gavāँyauṁ. nija prabhu janma avadha suni pāyauṁ, nirbhara prema haraṣi uṭhi dhāyauṁ. dekhauṁ janma mahotsava jāī, jehi bidhi prathama kahā maiṁ gāī. rāma udara dekheuṁ jaga nānā, dekhat banai na jāi bakhānā. tahaṁ puni dekheuṁ rāma sujānā, māyā pati kṛpāla bhagavānā. karauṁ bicāra bahori bahorī, moha kalila byāpita mati morī. ubhau ghari mahaँ maiṁ saba dekhā, bhayauṁ bhramita mana moha biseṣā.
मैं अनेक ब्रह्मांड घूमता रहा, लगता था सौ कल्प बीत गए। फिर मैं अपने आश्रम वापस आया, वहाँ कुछ देर रहा। तब सुना कि मेरे प्रभु का जन्म अयोध्या में हुआ। प्रेम से भरके मैं दौड़ पड़ा, जन्मोत्सव देखने। जैसे मैंने पहले बताया था, वैसे राम की कथा थी। राम के पेट में मैंने अनेक दुनिया देखी, बताना मुश्किल है। वहाँ फिर राम को देखा, वो दयालु भगवान थे। मैं बार-बार सोचता रहा, लेकिन मेरा मन बड़ा कन्फ्यूज़्ड था। दोनों जगह सब देखा, मन और भी उलझ गया।
Verse 173 (दोहा/सोरठा)
देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर। बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर।।82(क)।।
dekhi kṛpāla bikala mohi bihaṁse taba raghubīra | bihaṁsatahiṁ mukha bāhera āyuṁ sunu matidhīra ||82(ka)||
राम ने देखा कि मैं बहुत इमोशनल हो गया हूँ, तो वो मुस्कुरा दिए। जैसे ही वो मुस्कुराए, मैं उनके मुँह से बाहर आ गया, सुनो। फिर से वो बच्चों जैसी हरकत करने लगे मेरे साथ। मैं हज़ारों तरह समझाने की कोशिश करता हूँ, लेकिन मेरा मन शांत नहीं होता।
Verse 174 (चौपाई)
सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम। कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम।।82(ख)।।
soi larikāī mo sana karana lage puni rāma | koṭi bhāṁti samujhāvuṁ manu na lahai biśrāma ||82(kha)||
जब मैंने यह सब देखा, तो समझ में आ गया कि यह कैसी प्रभुता है। अपनी बॉडी की दशा भूल गया। ज़मीन पर गिर गया, मूँह से एक शब्द नहीं निकला। बस पुकारा, "हे मुझे बचाने वाले, मुझे बचा ले।" प्रभु प्रेम से भर गए जब मुझे देखा। अपनी माया से अपनी प्रभुता रोक ली। अपना कमल जैसा हाथ मेरे सिर पे रख दिया। दीनों पे दया करने वाले ने सारे दुख दूर कर दिए। राम ने मुझे मोह से आज़ाद कर दिया। वो अपने सेवकों को सुख देने वाले, कृपा के भंडार हैं। पहले जब मैंने उनकी प्रभुता के बारे में सोचा, तो मन में बहुत खुशी हुई। लेकिन जब देखा कि प्रभु अपने भक्तों के साथ कितना प्यार से पेश आते हैं, तो मेरे दिल में एक खास प्यार पैदा हो गया। आँखों में आँसू, हाथ जोड़े, बॉडी में झूमता हुआ मैंने बहुत तरीके से उनसे विनय किया।
Verse 175 (दोहा/सोरठा)
देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।। धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।। प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी।। कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।। कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा।। प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।। भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी।। सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी।।
dekhi carita yaha so prabhutāī | samujhata deha dasā bisarāī || dharani pareuṁ mukha āva na bātā | trāhi trāhi ārata jana trātā || premākula prabhu mohi bilokī | nija māyā prabhutā taba rokī || kara saroja prabhu mama sira dhareū | dīnadayāla sakala dukha hareū || kīnha rāma mohi bigata bimoha | sevaka sukhada kṛpā saṁdoha || prabhutā prathama bicāri bicārī | mana mahaṁ hoi haraṣa ati bhārī || bhagata bachalatā prabhu kai dekhī | upajī mama ura prīti biseṣī || sajala nayana pulakita kara jorī | kīnhiuṁ bahu bidhi binaya bahorī ||
जब प्रभु ने मेरी प्रेम-भरी बातें सुनी और देखा कि उनका अपना दास कितना हाल में है, तब लक्ष्मी के पति ने बोला। उनकी बातें गहरी थी, सॉफ्ट थी, सुख देने वाली थी। फिर बोले, "काकभुसुंडी, मुझसे जो वरद माँगना है माँग। मैं तुझे बहुत खुश समझता हूँ। सिद्धियाँ, रिधियाँ, मोक्ष, हर तरह के सुख, सब कुछ माँग सकता है।"
Verse 176 (चौपाई)
सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास। बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास।।83(क)।।
suni saprema mama bānī dekhi dīna nija dāsa | bacana sukhada gambhīra mṛdu bole ramānivāsa ||83(ka)||
ज्ञान, विवेक, वैराग्य, यह सब चीज़ें जो मुनि लोग भी मुश्किल से पाते हैं, आज मैं सब दे देता हूँ। कोई शक नहीं। जो तुझे मन में आए वो माँग ले। प्रभु की बात सुन के और भी प्यार बढ़ गया। मन में सोचने लगा कि यह कैसा प्रभु है। प्रभु कहते हैं कि मैं सब सुख दे सकता हूँ। लेकिन अपनी भक्ति देने का ज़िक्र नहीं करते। भक्ति के बिना सब सुख जैसे नमक के बिना खाना, फालतू है। भजन के बिना सुख का क्या मतलब? यह सोच के मैंने प्रभु से कहा, "अगर आप खुश हैं तो एक वरद देना। मुझपे कृपा और प्यार करना। मन जो माँगता है वो माँगूँगा, आप तो दिल के जानने वाले हैं।"
Verse 177 (दोहा/सोरठा)
काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि। अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि।।83(ख)।।
kāka-bhasuṇḍi māgu bara ati prasanna mohi jāni | aṇimādika sidhi apara ridhi moccha sakala sukha khāni ||83(kha)||
जो भक्ति वेद और पुरान में लिखी है, जो योगी और मुनि लोग ढूँढ़ते हैं, वो भक्ति मुझे दे दो। भक्ति जो कल्प तरु है, जो झुकने वालों का भला करती है, कृपा का सागर है, सुख का घर है, वो भक्ति मुझे दे दो राम, दया करके।
Verse 178 (चौपाई)
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।। सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना।। सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी।। जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।। रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई।। सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।। भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा।। जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।।
evamastu kahi raghukulanāyaka | बोले bacana parama sukhadāyaka || sunu bāyasa taiṁ sahaja sayānā | kāhe na māgasi asa baradānā || saba sukha khāni bhagati taiṁ māgī | nahiṁ jaga kou tohi sama baṛabhāgī || jo muni koṭi jatana nahiṁ lahahīṁ | je japa joga anala tana dahahīṁ || rīझeuँ dekhi tori caturāī | māgehu bhagati mohi ati bhāī || sunu bihaṅga prasāda aba moreṁ | saba subha guna basihahiṁ ura toreṁ || bhagati gyāna bigyāna birāgā | joga caritra rahasya bibhāgā || jānaba taiṁ sabahī kara bhedā | mama prasāda nahiṁ sādhana kheḍā ||
"ठीक है, यही होगा", यह कह के रघु वंश के प्रभु ने वो बात बोली जो सबसे ज़्यादा सुख देती है। बोले, "सुन बयास, तू तो अपने आप में समझदार है। ऐसा वरद क्यों नहीं माँगा? भक्ति, यह सब सुख की खान है। दुनिया में तुझसे बड़ा भाग्य वाला कोई नहीं। जो चीज़ करोड़ मुनि भी इतनी कोशिश के बाद नहीं पाते, जप, तप, योग करके बॉडी जलाते हैं फिर भी नहीं मिलता, वो तुझे मिल गई। तेरी समझ से खुश हो गया, भक्ति माँगी जो मुझे बहुत प्यारी है। सुन पक्षी, मेरी कृपा से अब तेरे मन में सब अच्छे गुण आएँगे। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, योग, अच्छा चरित्र, सब चीज़ें तुझे समझ में आएँगी। सब का भेद जान लेगा। मेरी कृपा से साधना में कभी थका नहीं मनेगा।"
Verse 179 (दोहा/सोरठा)
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि। जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि।।85(क)।। मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग। कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग।।85(ख)।।
māyā saṁbhava bhrama saba aba na byāpihahiṁ tohi | jānesu brahma anādi aja aguna guṇākara mohi ||85(ka)|| mohi bhagata priya saṁtata asa bicāri sunu kāga | kāyaṁ bacana mana mama pada karesu acala anurāga ||85(kha)||
अब माया के सारे भ्रम तुम्हे परेशान नहीं करेंगे। तुम मुझे जानोगे, मैं जो हूँ, मैं कोई शुरू नहीं हुआ, मैं पैदा नहीं हुआ। मैं गुणों से पारे हूँ, लेकिन सारे गुण मेरे पास हैं। मेरे भक्त मुझे बहुत प्यारे हैं, यह बात हमेशा याद रखना, ऐ कौआ। अपने शरीर, बातों और मन से मेरे चरणों में पक्का प्यार रखना।
Verse 180 (चौपाई)
अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।। निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही।। मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा।। सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए।। तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।। तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी।। तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।। पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।। भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई।। भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी।।
aba sunu parama bimala mama bānī | satya sugama nigamādi bakhānī || nija siddhānta sunāvaüṁ tohī | sunu mana dharu saba taji bhaju mohī || mama māyā saṁbhava saṁsārā | jīva carācara bibidhi prakārā || saba mama priya saba mama upajāe | saba te adhika manuja mohi bhāe || tinha maṁha dvija dvija maṁha śrutidhārī | tinha mahuṁ nigama dharama anusārī || tinha maṁha priya birakta puni gyānī | gyānihu te ati priya bigyānī || tinha te puni mohi priya nija dāsā | jehi gati mori na dūsari āsā || puni puni satya kahauṁ tohi pāhīṁ | mohi sevaka sama priya kou nāhīṁ || bhagati hīna birañci kina hoī | saba jīvahu sama priya mohi soī || bhagativanta ati nīcau prānī | mohi prānapriya asi mama bānī ||
अब मेरी बात सुन, यह बिल्कुल साफ है, सच है, समझ में आसान है, और वेदों में भी लिखी है। मैं तुम्हे अपना असली बात बताता हूँ, मन में रखना, सब छोड़ के सिर्फ मेरा भजन करना। यह दुनिया मेरी माया से बनी है, जीव, जानवर, पेड़-पौधे, सब तरह के। सब मुझे प्यारे हैं क्योंकि सब मैंने ही बनाए। लेकिन इंसान मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आते हैं। इंसानों में ब्राह्मण, उनमें वेद पढ़ने वाले, उनमें धरम पे चलने वाले। उनमें जो माया से अलग हो गए और ज्ञान वाले बन गए। लेकिन ज्ञान से भी ज़्यादा प्यारे वो हैं जो सच में समझ गए। लेकिन सबसे ज़्यादा प्यारे मेरे अपने सेवक हैं, जिनके लिए मैं ही सब कुछ हूँ। बार-बार सच कहता हूँ, मेरे जैसा प्यारा कोई सेवक नहीं है। ब्रह्मा भी हो अगर भक्ति नहीं, तो क्या? वो भी बस एक जीव है, और इतना ही प्यारा। लेकिन जो भक्त है, चाहे कितना भी नीच हो, वो मेरे जान के बराबर प्यारा है। यह मेरी बात है।
Verse 181 (दोहा/सोरठा)
सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग। श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग।।86।।
suci susīla sevaka sumati priya kahu kāhi na lāga | śruti purāna kaha nīti asi sāvadhāna sunu kāga ||86||
बता, ऐसा सेवक कौन नहीं प्यार करेगा? जो साफ है, अच्छा है, और समझदार है। वेद और पुरान में यही लिखा है कि यह सही तरीका है, ध्यान से सुन, ऐ कौआ।
Verse 182 (चौपाई)
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।। कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।। कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।। कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।। सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना।। एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।। अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया।। तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरू काया।।
eka pitā ke bipula kumārā | hohiṁ pṛthaka guna sīla acārā || kou paṇḍiṁta kou tāpasa gyātā | kou dhanavanta sūra kou dātā || kou sarbagya dharmarata koī | saba para pitahi prīti sama hoī || kou pitu bhagata bacana mana karmā | sapanehuँ jāna na dūsara dharmā || so suta priya pitu prāna samānā | jadyapi so saba bhāँti ayānā || ehi bidhi jīva carācara jete | trijaga deva nara asura samete || akhila bisva yaha mora upāyā | saba para mohi barābari dāyā || tinha maṁha jo parihari mada māyā | bhajai mohi mana baca arū kāyā ||
एक बाप के बहुत सारे बेटे हो सकते हैं, सब अलग-अलग होते हैं। कोई पंडित, कोई तपस्वी, कोई अमीर, कोई बहादुर, कोई दान करने वाला। कोई बहुत ज्ञान वाला, कोई धरम पे चलने वाला, लेकिन बाप का प्यार सब पे बराबर है। लेकिन जो बेटा बाप से सच में जुड़ा है, बात में, मन में, काम में, उसके लिए कोई और धरम ही नहीं, सपने में भी नहीं, वो बेटा बाप के जान के बराबर प्यारा है। चाहे वो कितना भी पढ़ा-लिखा न हो। ऐसे ही सारे जीव हैं, तीनों दुनिया में, देवता, इंसान, राक्षस, सब। यह पूरा दुनिया मैंने बनाई है, और मेरा प्यार सब पे बराबर है। लेकिन जो माया और अहंकार छोड़ के मुझे मन, बात और शरीर से भजता है, वो मुझे सबसे ज़्यादा प्यारा है।
Verse 183 (दोहा/सोरठा)
पुरूष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ। सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ।।87(क)।। सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय। अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब।।87(ख)।।
puruṣa napuṃsaka nāri vā jīva carācara koi | sarba bhāva bhaja kapaṭa taji mohi parama priya soi ||87(k)|| satya kahauṁ khaga tohi suci sevaka mama prāṇa-priya | asa bicāri bhaju mohi parihari āsa bharosa saba ||87(kh)||
चाहे मर्द हो, औरत हो, या न मर्द न औरत, कोई भी जीव हो, जानवर हो या पेड़-पौधा, जो मुझे दिल से भजता है और कपूर छोड़ देता है, वो मुझे सबसे ज़्यादा प्यारा है। मैं सच बोलता हूँ, ऐ कौआ, जो सेवक साफ दिल वाला है, वो मेरे जान के बराबर प्यारा है। यह सोच के मेरा भजन करो, और कोई आस भरोसा मत रखो।
Verse 184 (चौपाई)
कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।। प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ।। सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना।। प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना।। बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई।। सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा।। देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई।। गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना।।
kabhū̃ kāla na byāpihi tohī | sumiresu bhajesu niraṃtara mohī || prabhu bacanāmṛta suni na aghāū̃ | tanu pulakita mana ati haraṣāū̃ || so sukha jānai mana aru kānā | nahiṁ rasanā pahiṁ jāi bakhānā || prabhu sobhā sukha jānahim̐ nayanā | kahi kimi sakahim̐ tinhahi nahiṁ bayanā || bahu bidhi mohi prabodhi sukha deī | lage karana sisu kautuka teī || sajala nayana kachu mukha kari rūkhā | citai mātu lāgī ati bhūkhā || dekhi mātu ātura uṭhi dhāī | kahi mṛdu bacana liye ura lāī || goda rākhi karāva paya pānā | raghupati carita lalita kari gānā ||
भगवान ने कहा, कभी वक्त तुम्हे परेशान नहीं करेगा, बस तुम मेरे को याद रखो और पूजा करते रहो। मैं उनकी बातें सुनता हूँ, दिल भरता नहीं। मेरा बदन खुश से काँप जाता है। वो खुशी सिर्फ मन और कान समझ सकता है। जीभ उसको बोल नहीं पाती। आँखें भगवान की खूबसूरती देखती हैं, पर बता नहीं सकती, क्योंकि उनके पास लफ्ज़ नहीं। उसने मुझे बहुत तरीके से समझाया और खुशी दी, जैसे कोई बच्चा खेल में बिज़ी हो। आँखों में आँसू, कभी-कभी मूँह थोड़ा सा बना के देखता था, जैसे कोई भूखा बच्चा माँ को देखता है। माँ ने देखा, तुरंत दौड़ी आई। नरम-नरम बातें बोली, गोद में भर लिया। गोद में बिठाया, दूध पिलाया, और राम के बारे में गाना गाने लगी।
Verse 185 (दोहा/सोरठा)
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद। अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन।।88(क)।। सोइ सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ। ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति।।88(ख)।।
jehi sukha lāgi purāri asubha beṣa kṛta siva sukhada | avadhapurī nara nāri tehi sukha mahuṁ saṃtata magana ||88(k)|| soi sukha lava-lesa jinha bāraka sapanehū̃ laheu | te nahiṁ ganahiṁ khagesa brahmasukhahi sajjana sumati ||88(kh)||
उस खुशी के लिए शिव भी बुरा रूप बन के तपस्या करते हैं। पर अयोध्या के लोग और औरतें उसी खुशी में डूबे हैं। जिन्होंने थोड़ी सी भी यह खुशी पाई है, बचपन में या सपने में भी, उनके लिए ब्रह्मा की खुशी कुछ भी नहीं है, गरुड़। अच्छे लोग और समझदार यही मानते हैं।
Verse 186 (चौपाई)
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।। राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ।। तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया।। यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा।। निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा।। राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।। जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।। प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।
maiṁ puni avadha raheuṁ kachu kālā | dekheuṁ bāla-binoda rasālā || rāma prasāda bhagati bara pāyauṁ | prabhu pada bandi nijāśrama āyauṁ || taba te mohi na byāpī māyā | jaba te raghunāyaka apanāyā || yaha saba gupta carita maiṁ gāvā | hari māyāṁ jimi mohi nacāvā || nija anubhava aba kahauṁ khagesā | binu hari bhajana na jāhi kalesā || rāma kṛpā binu sunu khagarāī | jāni na jāi rāma prabhutāī || jāneṁ binu na hoi paratītī | binu paratīti hoi nahiṁ prītī || prīti binā nahiṁ bhagati diṛhāī | jimi khagapati jala kai cikanāī ||
मैं भी अयोध्या में थोड़ा वक्त रहा और राम के बचपन के खेल देखता रहा। राम की कृपा से मुझे भक्ति का वरदान मिला। मैं उनके चरणों को नमन किया और अपने आश्रम वापस आ गया। तब से माया मुझे पकड़ नहीं पाई, क्योंकि रघु के नाथ ने मुझे अपना लिया। मैंने यह सब छुपी बातें गाई, जैसे हरि की माया ने मुझे नचाया। अब मैं अपना अनुभव बता रहा हूँ, गरुड़ राजा। हरि की भक्ति बिना पाप दूर नहीं होता। राम की कृपा बिना, सुनो गरुड़ राजा, राम की महानता समझ नहीं आती। जाने बिना भरोसा नहीं होता। भरोसा बिना प्यार नहीं होता। प्यार बिना भक्ति पक्की नहीं होती, जैसे पानी के चिकनापन जैसा।
Verse 187 (दोहा/सोरठा)
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु। गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।।89(क)।। कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु। चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।।
binu guru hoi ki gyāna gyāna ki hoi birāga binu | gāvahiṁ beda purāna sukha ki lahi-a hari bhagati binu ||89(k)|| kou bisrāma ki pāva tāta sahaja saṃtoṣa binu | calai ki jala binu nāva koṭi jatana paci paci mari-a ||89(kh)||
गुरु बिना ज्ञान कैसे मिलेगा? और ज्ञान बिना वैराग्य कैसे आएगा? वेद और पुराण पढ़ने से खुशी नहीं मिलती, हरि की भक्ति बिना। कोई रेस्ट कैसे पाएगा दोस्त, बिना संतोष के? कश्ती पानी बिना कैसे चलेगी? कितना भी कोशिश करो, आदमी मर ही जाता है।
परम्परागत मान्यता: इस खण्ड का पाठ ‘माया-भ्रम’ का शमन, ‘परतीति’ की वृद्धि, और दास्य-भाव की दीढ़ता देता है। विशेषतः ‘अबिरल भगति’ की याचना (84) और ‘सेवक-प्रियता’ का सिद्धान्त (86-87) सुनना/पढ़ना साधक को निष्कपट भजन की ओर स्थिर करता है—यही इसका फल कहा जाता है।
सामान्य सत्संग-प्रयोग में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-जप को समपुट की भाँति जोड़ा जाता है; और भक्ति-वर-प्रसंग (84-85) में ‘सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु’ पंक्ति को भाव-स्मरण/आवृत्ति (मनसिक समपुट) के रूप में रखा जाता है। (स्थानीय परम्परा अनुसार भेद संभव।)
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