यह सोपान ‘अहंकार-वध’ और ‘माया-भेदन’ का द्वार है। साधक के भीतर का रावण (दशमुख—दश इंद्रियाँ/दश दिशाओं में फैला अहं) प्रभु-शरणागति के तेज से कटता है, पर बार-बार बढ़ता भी है—जब तक हृदय में राम-ध्यान स्थिर न हो। लंका-काण्ड का आध्यात्मिक प्रयोजन बाह्य युद्ध नहीं, अंतःकरण-रण है: क्रोध, मद, छल, और मायिक-बहुरूपता का नाश; तथा ‘राम-कृपा’ को निर्णायक कारण मानकर निर्भयता, धैर्य, और दास्य-भक्ति का परिपाक।
यह खण्ड ‘अहंकार-वध’ और ‘माया-भेदन’ का प्रतीक-द्वार है। राम का विप्र-चरण-वंदन बताता है कि परम-शक्ति भी मर्यादा/धर्म के अधीन होकर ही विजय-मार्ग खोलती है—यह साधक के लिए ‘विनय’ का प्रथम शस्त्र है। रावण का क्रोध और गर्जन बाह्य शत्रु नहीं, भीतर का उच्छृंखल अहं है जो दश-दिशाओं/दश-इंद्रियों में फैलकर बार-बार सिर उठाता है। सिर-भुज का पुनः बढ़ना मनोवैज्ञानिक संकेत है: विषय-सेवन से वासनाएँ कटकर भी नूतन होती रहती हैं; केवल बाह्य संयम पर्याप्त नहीं, ‘राम-ध्यान’ की स्थिरता चाहिए। प्रभु का ‘हँसि’ उत्तर माया के प्रति असंगता का प्रकाश है—जैसे सूर्य उदय से तम फटता है, वैसे ही कृपा-प्रकाश से मायिक बहुरूपता छिन्न होती है। समग्र संदेश: युद्ध का निर्णायक कारण रण-कौशल नहीं, ‘कृपा’ और ‘शरणागति’ है; अहं का वध शस्त्र से नहीं, राम-नाम/राम-ध्यान के अच्युत बाण से सुनिश्चित है।
चौपाई 90.1-5
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा।बिप्र चरन पंकज सिरु नावा।।
तब लंकेस क्रोध उर छावा।गर्जत तर्जत सन्मुख धावा।।
जीतेहु जे भट संजुग माहीं।सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं।।
रावन नाम जगत जस जाना।लोकप जाकें बंदीखाना।।
खर दूषन बिराध तुम्ह मारा।बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा।।
निसिचर निकर सुभट संघारेहु।कुंभकरन घननादहि मारेहु।।
आजु बयरु सबु लेउँ निबाही।जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं।।
आजु करउँ खलु काल हवाले।परेहु कठिन रावन के पाले।।
सुनि दुर्बचन कालबस जाना।बिहँसि बचन कह कृपानिधाना।।
सत्य सत्य सब तव प्रभुताई।जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई।।
asa kahi ratha raghunātha calāvā |bipra carana paṅkaja siru nāvā ||
taba laṅkesa krodha ura chāvā |garjata tarjata sanmukha dhāvā ||
jītehu je bhaṭa sañjuga māhīṁ |sunu tāpasa maiṁ tinha sama nāhīṁ ||
rāvana nāma jagata jasa jānā |lokapa jākeṁ bandīkhānā ||
khara dūṣana birādha tumha mārā |badhehu byādha iva bāli bicārā ||
nisicara nikara subhaṭa saṅghārehu |kumbhakarana ghananādahi mārehu ||
āju bayaru sabu leũ nibāhī |jauṁ rana bhūpa bhāji nahiṁ jāhīṁ ||
āju karaũ khalu kāla havāle |parehu kaṭhina rāvana ke pāle ||
suni durbacana kālabasa jānā |bihãsi bacana kaha kṛpānidhānā ||
satya satya saba tava prabhutāī |jalpasi jani dekhāu manusāī ||
ऐसे बोलकर राम अपना रथ आगे चलाया, और ब्राह्मणों के पाँव में सिर झुका दिया। फिर लंकेश के मन में गुस्सा छा गया, वो गरजता धमकाता सीधा सामने दौर आया। उसने कहा, सुनो तपस्वी, जिन योद्धों को तुमने युद्ध में हराया है, मैं उन जैसा नहीं हूँ। रावन का नाम और उसकी शोहरत पूरी दुनिया में मशहूर है, जिसकी जेल में सब लोकों के रखवाले कैद हैं। तुमने खर, दूषण और विराध को मारा, और बेचारे बलि को शिकारी की तरह मार डाला। तुमने राक्षसों की सेना और उनके बहादुर सिपाहियों को बरबाद किया, और कुंभकरन और मेघनाद को मार डाला। आज मैं सारी दुश्मनी का हिसाब चुका दूँगा, अगर तुम रणभूमि से भाग नहीं जाते, हे राजा। आज मैं तुम कमीने को मौत के हवाले कर दूँगा, तुम रावन की सख्त पकड़ में फँस गए हो। ये गालियाँ सुनकर और उसे मौत की पकड़ में समझ कर, दया के भंडार वाले राम ने मुस्कुरा कर बोला। राम ने कहा, सच है, सच है, तुम्हारी सारी बड़ाई सच है, पर फालतू मत बोलो और मर्दांगी का दिखावा मत करो।
छंद 90
जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा।संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा।।
एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं।एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं।।
jani jalpanā kari sujasu nāsahi nīti sunahi karahi chamā |saṁsāra mahã pūruṣa tribidha pāṭala rasāla panasa samā ||
eka sumanaprada eka sumana phala eka phalai kevala lāgahīṁ |eka kahahiṁ kahahiṁ karahiṁ apara eka karahiṁ kahata na bāgahīṁ ||
बेकर बकवास मत करके अपना अच्छा नाम मत बिगाड़। मेरी बात सुन और माफ कर अगर मैं कुछ बोल रहा हूँ। दुनिया में तीन तरह के आदमी होते हैं, बिल्कुल पाटल, आम और कथल जैसे तीन पेड़। एक पेड़ सिर्फ फूल देता है, एक में फूल भी आते हैं और फल भी, और एक सिर्फ फल देता है। ऐसे ही आदमी: एक सिर्फ बोलता है, एक बोलता भी है और काम भी करता है, और एक काम करता है पर उसके बारे में बोलता नहीं।
दोहा 90
राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान।बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान।।90।।
rāma bacana suni bihãsā mohi sikhāvata gyāna |bayaru karata nahiṁ taba ḍare aba lāge priya prāna ||90||
राम की बात सुनकर रावन हँसा। उसने कहा, तुम मुझे ग्यान सिखा रहे हो। जब तुमने मुझसे दुश्मनी की, तब तुम्हें डर नहीं लगा। अब तुम्हें अपनी जान प्यारी लगने लगी है।
चौपाई 91.1-4
कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर।कुलिस समान लाग छाँड़ै सर।।
नानाकार सिलीमुख धाए।दिसि अरु बिदिस गगन महि छाए।।
पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा।छन महुँ जरे निसाचर तीरा।।
छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई।बान संग प्रभु फेरि चलाई।।
कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै।बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै।।
निफल होहिं रावन सर कैसें।खल के सकल मनोरथ जैसें।।
तब सत बान सारथी मारेसि।परेउ भूमि जय राम पुकारेसि।।
राम कृपा करि सूत उठावा।तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा।।
kahi durbacana kruddha dasakandhara |kulisa samāna lāga chā̃ṛai sara ||
nānākāra silīmukha dhāe |disi aru bidisa gagana mahi chāe ||
pāvaka sara chā̃ṛeu raghubīrā |chana mahũ jare nisācara tīrā ||
chāṛisi tībra sakti khisiāī |bāna saṅga prabhu pheri calāī ||
koṭika cakra trisūla pabārai |binu prayāsa prabhu kāṭi nivārai ||
niphala hohiṁ rāvana sara kaiseṁ |khala ke sakala manoratha jaiseṁ ||
taba sata bāna sārathī māresi |pareu bhūmi jaya rāma pukāresi ||
rāma kṛpā kari sūta uṭhāvā |taba prabhu parama krodha kahũ pāvā ||
रवन गुस्से में बहुत गंदा बोल बोलके ऐसे तीर चलाए जो बिजली की तरह लगे। बहुत सारे अलग अलग शेप के तीर आगे भागे, और उन्होंने हर डायरेक्शन, आसमान और ज़मीन सबको छा लिया। राम ने आग वाला तीर चलाया, और एक पल में रवन के सारे तीर जल गए। रवन शर्मा गया और एक बहुत तेज़ भाला फेंका, पर राम ने एक तीर मारके उसको वापस उसी की तरफ मोड़ दिया। रवन लाखों चक्र और त्रिशूल फेंके, पर राम ने बिना कोई मेहनत किए सबको काट कर रोक दिया। रवन के तीर का काम कैसे खत्म हो गया, बिलकुल जैसे किसी बुरे आदमी के सारे प्लान फेल हो जाते हैं। फिर रवन ने राम के रथ वाले सारथी को सौ तीर मारे, वो ज़मीन पर गिर गया और चिल्लाता हुआ, जय राम! राम ने अपनी कृपा से सारथी को वापस उठाया, और फिर प्रभु को बहुत ज़्यादा गुस्सा आया।
छंद 91
भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे।कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे।।
मँदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे।चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे।।
bhae kruddha juddha biruddha raghupati trona sāyaka kasamase |kodaṇḍa dhuni ati caṇḍa suni manujāda saba māruta grase ||
mãdodarī ura kampa kampati kamaṭha bhū bhūdhara trase |cikkarahiṁ diggaja dasana gahi mahi dekhi kautuka sura hãse ||
लड़ाई में अपने दुश्मन के खिलाफ राम बहुत गुस्से में आ गए। उनके तीर कमान के तीर-दान में हिल रहे थे। राम की कोदंड नाम की कमान की बहुत तेज आवाज सुन के, सारे मनुष्य-खाने वाले राक्षस इतने डर गए जैसे हवा ने उन्हें निगल लिया हो। मंदोदरी का दिल कांप रहा था। कछुआ, ज़मीन और पहाड़ सब डर से हिल रहे थे। सारे दिशाओं के हाथी अपने दाँतो से ज़मीन को पकड़ रहे थे और चिल्ला रहे थे। भगवान लोग ये सब तमाशा देख के हँसने लगे।
दोहा 91
तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल।राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल।।91।।
tāneu cāpa śravana lagi chā̃ṛe bisikha karāla |rāma māragana gana cale lahalahāta janu byāla ||91||
राम ने धनुष को कान तक खींचा और भयंकर तीर चलाए। राम के तीरों का पूजा संख्या बढ़ गया और वे तीर आगे बढ़े, जैसे साँप काँटे हैं वैसे हिलते-डुलते हुए।
चौपाई 92.1-7
चले बान सपच्छ जनु उरगा।प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा।।
रथ बिभंजि हति केतु पताका।गर्जा अति अंतर बल थाका।।
तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना।अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना।।
बिफल होहिं सब उद्यम ताके।जिमि परद्रोह निरत मनसा के।।
तब रावन दस सूल चलावा।बाजि चारि महि मारि गिरावा।।
तुरग उठाइ कोपि रघुनायक।खैंचि सरासन छाँड़े सायक।।
रावन सिर सरोज बनचारी।चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।।
दस दस बान भाल दस मारे।निसरि गए चले रुधिर पनारे।।
स्रवत रुधिर धायउ बलवाना।प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना।।
तीस तीर रघुबीर पबारे।भुजन्हि समेत सीस महि पारे।।
काटतहीं पुनि भए नबीने।राम बहोरि भुजा सिर छीने।।
प्रभु बहु बार बाहु सिर हए।कटत झटिति पुनि नूतन भए।।
पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा।अति कौतुकी कोसलाधीसा।।
रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू।मानहुँ अमित केतु अरु राहू।।
cale bāna sapaccha janu uragā |prathamahĩ hateu sārathī turagā ||
ratha bibhaṃji hati ketu patākā |garjā ati antara bala thākā ||
turata āna ratha caṛhi khisiānā |astra sastra chāṃṛesi bidhi nānā ||
biphala hohiṃ saba udyama tāke |jimi paradroha nirata manasā ke ||
taba rāvaṇa dasa sūla calāvā |bāji cāri mahi māri girāvā ||
turaga uṭhāi kopi raghunāyaka |khaiṃci sarāsana chāṃṛe sāyaka ||
rāvaṇa sira saroja bana-cārī |cali raghubīra silīmukha dhārī ||
dasa-dasa bāna bhāla dasa māre |nisari gae cale rudhira panāre ||
sravata rudhira dhāyu balavānā |prabhu puni kṛta dhanu sara saṃdhānā ||
tīsa tīra raghubīra pabāre |bhujanhi sameta sīsa mahi pāre ||
kāṭatahĩ puni bhae nabīne |rāma bahori bhujā sira chīne ||
prabhu bahu bāra bāhu sira hae |kaṭata jhaṭiti puni nūtana bhae ||
puni-puni prabhu kāṭata bhuja sīsā |ati kautukī kosalādhīsā ||
rahe chāi nabha sira aru bāhū |mānahuṃ amita ketu aru rāhū ||
तीर उड़ कर आए, जैसे पंख वाले साँप हो। सबसे पहले उनने सारथी और घोड़े मारे। उनने रथ तोड़ दिया और निशान, झंडा सब गिरा दिया। रावन ज़ोर से दहेका, पर अंदर से उसका बल टूट गया। गुस्से में उसने तुरंत दूसरा रथ चढ़ लिया और कई तरह के शस्त्र अस्त्र चलाए। उसका सब कोशिश बेकार हो गया, जैसे दूसरों को नुकसान पहुँचाने की सोच वाले दिमाग की साज़िशें होती हैं। फिर रावन ने दस भाले चलाए और चारो घोड़े मार कर ज़मीन पे गिरा दिए। रघुकुल के स्वामी ने घोड़े वापस उठाए। गुस्से में कष्टिबंधन खींचा और तीर चलाए। रावन के सिर कमल की तरह लग रहे थे पानी में, और राम के तीर उनपर भँवरे की तरह उड़ गए। हर सिर के माथे पर दस दस तीर मारे। तीर आर पार निकल गए और खून की धार बह निकली। खून से लाल हो कर बलवान दैत्य आगे बढ़ा, और प्रभु ने फिर से धनुष पर तीर लगाए। रघुकुल के वीर ने तीस तीर चलाए और हाथ के साथ सिर ज़मीन पे गिरा दिए। जैसे ही काटे गए, वैसे ही नए वापस उग आए। राम ने फिर से हाथ और सिर काट दिए। प्रभु ने कई बार हाथ और सिर काटे, और जैसे ही कट ते, तुरंत नए बन गए। बार बार प्रभु ने हाथ और सिर काटे, क्योंकि अयोध्या के स्वामी को ये खेल बहुत पसंद था। आसमान सिर और हाथों से भर गया, जैसे अनखों के काहु और केतु हो।
छंद 92
जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्रवत सोनित धावहीं।रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं।।
एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं।जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं।।
janu rāhu ketu aneka nabha patha sravata sonita dhāvahīṃ |raghubīra tīra pracaṇḍa lāgahĩ bhūmi girana na pāvahīṃ ||
eka-eka sara sira nikara chede nabha uṛata imi sohahīṃ |janu kopi dinakara kara nikara jahāṃ-tahāṃ bidhuntuda pohahīṃ ||
ऐसा लग रहा था जैसे आसमान के रास्ते पर अनेक राहु और केतु खून बहाते हुए दौड़ रहे हों। राम के ज़ोर दार तीर लगने से वो सर ज़मीन पर गिर नहीं पाए। हर एक तीर अनेक सर के गुच्छे को चीर देता था। वो सर आसमान में उड़ते हुए ऐसे चमक रहे थे, जैसे गुस्से में सूरज अपनी किरों के गुच्छे से राहु को इधर उधर पिरो रहा हो।
दोहा 92
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार।।92।।
jimi jimi prabhu hara tāsu sira timi timi hohiṃ apāra |sevata biṣaya bibardha jimi nita nita nūtana māra ||92||
जितनी जल्दी प्रभु ने रावन का सिर काटा, उतनी जल्दी वापस उग आया, पिछले जैसा ही, और लाखों में। बिल्कुल वैसे ही जैसे इंसान जो भूख और वसना के पीछे भागे, उनकी इच्हायें और बड़ी होती जाती हैं, और रोज नयी चीजों की तलब उठती है।
चौपाई 93.1-4
दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी।बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी।।
गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी।धायउ दसहु सरासन तानी।।
समर भूमि दसकंधर कोप्यो।बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो।।
दंड एक रथ देखि न परेऊ।जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ।।
हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा।तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा।।
सर निवारि रिपु के सिर काटे।ते दिसि बिदिस गगन महि पाटे।।
काटे सिर नभ मारग धावहिं।जय जय धुनि करि भय उपजावहिं।।
कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा।कहँ रघुबीर कोसलाधीसा।।
dasamukha dekhi siranha kai bāṛhī |bisarā marana bhaī risa gāṛhī ||
garjeu mūṛha mahā abhimānī |dhāyu dasahu sarāsana tānī ||
samara bhūmi dasakaṃdhara kopyo |baraṣi bāna raghupati ratha topyo ||
daṃḍa eka ratha dekhi na pareū |janu nihāra mahuṃ dinakara dureū ||
hāhākāra suranha jaba kīnhā |taba prabhu kopi kāramuka līnhā ||
sara nivāri ripu ke sira kāṭe |te disi bidisa gagana mahi pāṭe ||
kāṭe sira nabha māraga dhāvahĩ |jaya jaya dhuni kari bhaya upajāvahĩ ||
kahã lachimana sugrīva kapīsā |kahã raghubīra kosalādhīsā ||
रावन देखा कि उसके सिर बढ़ गए हैं, तो उसे अपनी मौत की फिकर ही भूल गई और गुस्सा बहुत बढ़ गया। वो बेवकूफ और बहुत घमंदी था, उसने जोर से गरजना किया और सारे दस धनुष खींच कर आगे दौड़ा। युद्ध के मैदान में रावन बहुत गुस्से में था, और तीर की बारिश करके राम के रथ को ढक दिया। एक दंड तक राम का रथ दिखे ही नहीं, जैसे धुंद में सूरज छुप गया हो। जब देवता ने हाय हाय की, तब भगवान ने गुस्सा करके अपना धनुष उठा लिया। तीर रोक कर उसने दुश्मन के सिर काट दिए, और वो हर तरफ, आसमान में और जमीन में बिखर गए। काटे हुए सिर आसमान के रास्ते में दौड़ रहे थे, जय जय की आवाज कर रहे थे और डर पैदा कर रहे थे। कहां है लक्ष्मण? कहां है सुग्रीव, किस्सों का राजा? कहां है राम, कोसले के राजा?
छंद 93
कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले।संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले।सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं।करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं।।
kahã rāmu kahi sira nikara dhāe dekhi markaṭa bhaji cale |saṃdhāni dhanu raghubaṃsamaṇi haṃsi saranhi sira bedhe bhale ||
sira mālikā kara kālikā gahi bṛṃda-bṛṃdanhĩ bahu milīṃ |kari rudhira sari majjanu manahuṃ saṃgrāma baṭa pūjana calīṃ ||
"राम कहाँ है?" चिलाते हुए सारे सिर आगे दौड़ पड़े. बन्दर उन्हें देख के पलट कर भाग गए. फिर रघु वंस का हीरा मुस्कुरा के धनुष पर तीर लगाया और तीरों से सारे सिर साफ साफ भेद दिए. बहुत सारी कालिका, हाथ में सिरों के हार पकड़ के, झुंड के झुंड आई. ऐसा लग रहा था जैसे खून की नदी में नहा लिया हो और युद्ध के बरगद की पूजा करने निकल पड़ी हो.
दोहा 93
पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड।।93।।
puni dasakaṁṭha kruddha hoi chā̃ṛī sakti pracaṁḍa |calī bibhīṣana sanmukha manahũ kāla kara daṁḍa ||93||
फिर रावन बहुत गुस्सा हो गया और अपना खतरनाक भाला चला दिया। वो सीधा विभीषण की तरफ गया, जैसे मौत का डंडा हो।
चौपाई 94.1-4
आवत देखि सक्ति अति घोरा।प्रनतारति भंजन पन मोरा।।
तुरत बिभीषन पाछें मेला।सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला।।
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई।प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई।।
देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो।गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो।।
रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे।तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे।।
सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए।एक एक के कोटिन्ह पाए।।
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो।अब तव कालु सीस पर नाच्यो।।
राम बिमुख सठ चहसि संपदा।अस कहि हनेसि माझ उर गदा।।
āvata dekhi sakti ati ghorā |pranatārati bhañjana pana morā ||
turata bibhīṣana pācheṁ melā |sanmukha rāma saheu soi selā ||
lāgi sakti muruchā kachu bhaī |prabhu kṛta khela suranha bikalāī ||
dekhi bibhīṣana prabhu śrama pāyo |gahi kara gadā kruddha hoi dhāyo ||
re kubhāgya saṭha manda kubuddhe |taiṁ sura nara muni nāga biruddhe ||
sādara siva kahũ sīsa caṛhāe |eka eka ke koṭinha pāe ||
tehi kārana khala aba lagi bā̃cyo |aba tava kālu sīsa para nācyo ||
rāma bimukha saṭha cahasi saṁpadā |asa kahi hanesi mājha ura gadā ||
भयंकर भाला आते देख कर राम ने सोचा कि जो मेरे शरण में आता है उसकी परेशानी दूर करना मेरा वादा है। तुरत उन्होंने विभीषण को पीछे कर दिया और राम आगे खड़े होकर वो भाला खुद सहन लिया। भाला लगते ही उन्हें थोड़ी बेहोशी आई। ये भगवान का खेल था, पर देवता बहुत घबरा गए। भगवान को तकलीफ देख कर विभीषण ने गदा पकड़ी और गुस्से से दौड़ा। तू बदकिस्मत आदमी, बेवकूफ, मंद दिमाग और बुरे सोच वाला। तू देवता, इंसान, रिशि और नाग सब का दुश्मन है। तूने शिव जी को अपने सिर चढ़ाए थे, इसलिए एक के बदले तुझे करोड़ मिला। सिर्फ इसी वजह से तू अब तक बचा है। पर अब तेरा काल तेरे सिर पर नाच रहा है। राम से मुह मोड कर तू अभी तक संपत्ति चाहता है! ये कह कर उसने रावण की छाती के बीच गदा मारा।
छंद 94
उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्यो।दस बदन सोनित स्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर्यो।द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै।रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै।।
ura mājha gadā prahāra ghora kaṭhora lāgata mahi paryo |dasa badana sonita sravata puni saṁbhāri dhāyo risa bharyo ||
dvau bhire atibala mallajuddha biruddha eku ekahi hanai |raghubīra bala darpita bibhīṣanu ghāli nahiṁ tā kahũ ganai ||
गदा का एक बहोत खतरनाक वार उसकी छाती के बीच में लगा, और रावण ज़मीन पर गिर पड़ा। उसके दस मुँह से खून बहने लगा, पर फिर से उठा, गुस्से से भरा हुआ, आगे दौड़ा। दोनो बहोत ताकतवर पहलवान की तरह आपस में टकराये, दुश्मनी में एक दूसरे पर वार करते हुए। पर विभीषण, राम की ताकत का गर्व करके, उसको मार गिरा और उसको कुछ भी नहीं माना।
दोहा 94
उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ।सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ।।94।।
um̐ā bibhīṣanu rāvanahi sanmukha citava ki kāu |so aba bhirata kāla jyoṁ śrīraghubīra prabhāu ||94||
उमा, विभीषन कभी रावन के सामने देख भी सकता था? लेकिन अब वो रावन से ऐसे लड़ रहा है जैसे मौत खुद आ गई हो। ये सब राम की ताकत है, जो रघु के स्वामी हैं।
चौपाई 95.1-4
देखा श्रमित बिभीषनु भारी।धायउ हनूमान गिरि धारी।।
रथ तुरंग सारथी निपाता।हृदय माझ तेहि मारेसि लाता।।
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता।गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता।।
पुनि रावन कपि हतेउ पचारी।चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी।।
गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना।पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना।।
लरत अकास जुगल सम जोधा।एकहि एकु हनत करि क्रोधा।।
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं।कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं।।
बुधि बल निसिचर परइ न पार्यो।तब मारुत सुत प्रभु संभार्यो।।
dekhā śramita bibhīṣanu bhārī |dhāyu hanūmāna giri dhārī ||
ratha turaṅga sārathī nipātā |hṛdaya mājha tehi māresi lātā ||
ṭhāṛha rahā ati kampita gātā |gayau bibhīṣanu jahã janatrātā ||
puni rāvana kapi hateu pacārī |caleu gagana kapi pū̃cha pasārī ||
gahisi pū̃cha kapi sahita uṛānā |puni phiri bhireu prabala hanumānā ||
larata akāsa jugala sama jodhā |ekahi eku hanata kari krodhā ||
sohahiṁ nabha chala bala bahu karahīṁ |kajjala giri sumeru janu larahīṁ ||
budhi bala nisicara parai na pāryo |taba māruta-suta prabhu saṁbhāryo ||
हनुमान ने देखा कि विभीषन बहुत थक गया है, और वो दौड़ कर आगे बढ़ा और एक पहाड़ उठा लिया। उसने रथ, घोड़े और सारथी को गिराकर मारा, और रावन की छाती के बीच में लाथ मारी। रावन वही खड़ा रहा पर उसका बदन बहुत कांप रहा था, और विभीषन वहां चला गया जहां उसका रक्षक था। फिर रावन ने बंदर को चिढ़ाया और उसको मारा, और बंदर ने अपनी पूंछ फैलाकर आसमान में चला गया। रावन ने पूंछ पकड़ ली और बंदर के साथ ऊपर उड़ गया, फिर तगड़ा हनुमान मुड़ कर दोबारा उससे टकराया। दोनों बराबर के योद्धा आसमान में लड़ रहे थे, और गुस्से में एक दूसरे को मार रहे थे। वो आसमान में चमक रहे थे, बहुत चाल और ताकत दिखाते हुए, जैसे कजल का पहाड़ और सुमेरु पहाड़ लड़ रहे हो। शैतान को चाल से या ताकत से हराया नहीं जा सकता, तब हवा के बेटे ने अपने भगवान को याद किया।
छंद 95
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो।महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो।।
हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले।रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले।।
sambhāri śrīraghubīra dhīra pacāri kapi rāvanu hanyo |mahi parata puni uṭhi larata devanha jugala kahũ jaya jaya bhanyo ||
hanumanta saṅkaṭa dekhi markaṭa bhālu krodhātura cale |rana matta rāvana sakala subhaṭa pracaṇḍa bhuja bala dalamale ||
हनुमान ने राम को याद किया, हिमत से रावन को चैलेंज दिया और उसको मारा। रावन जमीन पर गिर पड़ा, फिर उठा और फिर लड़ने लगा। देव दोनों के लिए बोल उठे, जय जय। हनुमान को मुश्किल में देख कर बंदर और भालू गुस्से में आगे भागे। पर रावन जंगली पन में छूटा था, उसने अपनी भारी भुजाओं के बल से उन सभी बहादुर योद्धों को कुचल दिया।
दोहा 95
तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड।कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड।।95।।
taba raghubīra pacāre dhāe kīsa pracaṇḍa |kapi bala prabala dekhi tehiṁ kīnha pragaṭa pāṣaṇḍa ||95||
फिर राम ने आगे बढ़ने को कहा, तो बहुत तेज बंदर आगे दौड़े। रावन ने देखा कि बंदर की ताकत कितनी ज्यादा है। तो उसने अपना जादू और धोखा खुल कर इस्तेमाल कर दिया।
चौपाई 96.1-4
अंतरधान भयउ छन एका।पुनि प्रगटे खल रूप अनेका।।
रघुपति कटक भालु कपि जेते।जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते।।
देखे कपिन्ह अमित दससीसा।जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा।।
भागे बानर धरहिं न धीरा।त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा।।
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन।गर्जहिं घोर कठोर भयावन।।
डरे सकल सुर चले पराई।जय कै आस तजहु अब भाई।।
सब सुर जिते एक दसकंधर।अब बहु भए तकहु गिरि कंदर।।
रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी।जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी।।
antaradhāna bhayau chana ekā |puni pragaṭe khala rūpa anekā ||
raghupati kaṭaka bhālu kapi jete |jahã tahã pragaṭa dasānana tete ||
dekhe kapinha amita dasasīsā |jahã tahã bhaje bhālu aru kīsā ||
bhāge bānara dharahiṁ na dhīrā |trāhi trāhi lachimana raghubīrā ||
dahã disi dhāvahiṁ koṭinha rāvana |garjahiṁ ghora kaṭhora bhayāvana ||
ḍare sakala sura cale parāī |jaya kai āsa tajahu aba bhāī ||
saba sura jite eka dasakandhara |aba bahu bhae takahu giri kandara ||
rahe birañci sambhu muni gyānī |jinha jinha prabhu mahimā kachu jānī ||
वो एक पल के लिए गयब हो गया, फिर कई रूप में वापस आ गया। राम की सेना में जितने भालु और बंदर थे, उतने ही रवन हर तरफ आ गए। बंदरों ने हर तरफ रवन देखे, और भालु और बंदर सब भाग गए। बंदर भाग रहे थे, कोई हिम्मत नहीं रख पाए। सब चिल्लाते थे, बचाओ बचाओ लक्ष्मन! बचाओ रघुबीरा! दसों दिशा में लाखों रवन दौड़ रहे थे, भयंकर आवाज में चिल्लाते थे। सब देवता डर के भाग गए। बोले, अब जीत की उम्मीद छोड़ दो भाई। एक रवन ने सब देवता हरा दिए, अब वो इतने हो गए। पहाड़ की गुफाओं को ढूंढो। सिर्फ ब्रह्मा, शिव, और ग्यानी रिशि वहां रुके, जिन्होंने भगवान की महिमा थोड़ी समझी थी।
छंद 96
जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे।चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे।।
हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे।मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे।।
jānā pratāpa te rahe nirbhaya kapinha ripu māne phure |cale bicali markaṭa bhālu sakala kṛpāla pāhi bhayāture ||
hanumanta aṅgada nīla nala atibala larata rana bā̃kure |mardahiṁ dasānana koṭi koṭinha kapaṭa bhū bhaṭa aṅkure ||
जो लोग भगवान की शक्ति को जानते थे, उन्हे कोई डर नही था। पर बंदरों ने दुश्मन को असली समझ लिया, और सारे बंदर और भालू डर के मारे भाग गए। चिल्ला रहे थे, हे दयालु, हमें बचा लो। हनुमान, अंगद, नील और नल बहुत ताकतवर और बहादुर योद्धा थे, और लड़ाई में लड़े रहने। उन्होने करोडों-करोडों रावन को मार गिराया। वो माया के योद्धा थे, जमीन से पौधे की तरह उगे थे।
दोहा 96
सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस।सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस।।96।।
sura bānara dekhe bikala hãsyo kosalādhīsa |saji sāraṅga eka sara hate sakala dasasīsa ||96||
देवता और बंदर देख के परेशान थे. राम जी ने हास दिया. उन्होंने अपनी धनुष शारंग तैयार की और एक ही तीर से सारे रावण को मार गिराया.
चौपाई 97.1-4
प्रभु छन महुँ माया सब काटी।जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी।।
रावनु एकु देखि सुर हरषे।फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे।।
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे।फिरे एक एकन्ह तब टेरे।।
प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए।तरल तमकि संजुग महि आए।।
अस्तुति करत देवतन्हि देखें।भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें।।
सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल।अस कहि कोपि गगन पर धायल।।
हाहाकार करत सुर भागे।खलहु जाहु कहँ मोरें आगे।।
देखि बिकल सुर अंगद धायो।कूदि चरन गहि भूमि गिरायो।।
prabhu chana mahũ māyā saba kāṭī |jimi rabi uẽ jāhiṁ tama phāṭī ||
rāvanu eku dekhi sura haraṣe |phire sumana bahu prabhu para baraṣe ||
bhuja uṭhāi raghupati kapi phere |phire eka ekanha taba ṭere ||
prabhu balu pāi bhālu kapi dhāe |tarala tamaki sañjuga mahi āe ||
astuti karata devatanhi dekheṁ |bhayaũ eka maiṁ inha ke lekheṁ ||
saṭhahu sadā tumha mora marāyala |asa kahi kopi gagana para dhāyala ||
hāhākāra karata sura bhāge |khalahu jāhu kahã moreṁ āge ||
dekhi bikala sura aṅgada dhāyo |kūdi carana gahi bhūmi girāyo ||
भगवान ने एक पल में सारी माया काट दी, जैसे सूरज निकलते ही अंधेरा फट जाता है। सिर्फ एक रावन देख कर देवता खुश हो गए। वापस मुड़ कर उन्होंने भगवान पर बहुत सारे फूल बरसाए। राम ने अपनी बाहें उठाकर बंदरों को वापस मोड़ दिया। फिर सब एक दूसरे को पुकारते हुए फिर एक जगह जमा हो गए। भगवान की ताकत पाकर भालू और बंदर आगे दौड़े। जोश में आकर कूदते हुए वापस मैदान में आ गए। देवता प्रशंसा करते हुए देख रहा था। रावन बोला, उनका हिसाब लगता है मैं अब एक ही रह गया हूँ। उल्लू के पट्ठे, तोम तो हमेशा मेरे मारे जाने के लिए बना हो। यह कह कर गुस्से में आकर वोह आसमान में कूद गया। देवता घबराकर चिल्लाते हुए भागे। रावन बोला, बेवकू, मेरे सामने तोम कहां भाग सकते हो? देवता परेशान देख कर अंगद दौड़ा आया। कूद कर उसने रावन के पैर पकडे और उसे जमीन पे गिरा दिया।
छंद 97
गहि भूमि पार्यो लात मार्यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो।संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो।।
करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई।किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई।।
gahi bhūmi pāryo lāta māryo bālisuta prabhu pahiṁ gayo |sambhāri uṭhi dasakaṇṭha ghora kaṭhora rava garjata bhayo ||
kari dāpa cāpa caṛhāi dasa sandhāni sara bahu baraṣaī |kie sakala bhaṭa ghāyala bhayākula dekhi nija bala haraṣaī ||
अंगद ने रावन को पकड़ कर ज़मीन पे गिरा दिया, लात मारी, और वापस राम के पास चला गया। रावन खुद को संभल कर उठे, और एक खतरनाक कड़क आवाज़ से गर्जने लगा। अपनी घमंद में रावन ने कमान तानी, उस पर दस तीर लगाए, और बहुत सारे तीर बरसा दिए। उसने सारे सिपाही को ज़ख्मी कर दिया, सब डर से घबरा गए, और अपनी ताकत देख कर खुश हो गया।
दोहा 97
तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप।काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप।।97।।
taba raghupati rāvana ke sīsa bhujā sara cāpa |kāṭe bahuta baṛhe puni jimi tīratha kara pāpa ||97||
फिर राम ने रावन के सारे सिर, हाथ, तीर और कमान काट दिए। बहुत बार काटा, पर हर बार वापस उग आए। जैसे किसी तीर्थ स्थान पर पाप करते हो तो पाप बढ़ता ही जाता है, बिलकुल वैसे ही रावन के सिर और हाथ बार बार वापिस बढ़ गए।
चौपाई 98.1-8
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी।भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी।।
मरत न मूढ़ कटेउ भुज सीसा।धाए कोपि भालु भट कीसा।।
बालितनय मारुति नल नीला।बानरराज दुबिद बलसीला।।
बिटप महीधर करहिं प्रहारा।सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा।।
एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी।भअगि चलहिं एक लातन्ह मारी।।
तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ।नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ।।
रुधिर देखि बिषाद उर भारी।तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी।।
गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं।जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं।।
कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी।महि पटकत भजे भुजा मरोरी।।
पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे।सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे।।
हनुमदादि मुरुछित करि बंदर।पाइ प्रदोष हरष दसकंधर।।
मुरुछित देखि सकल कपि बीरा।जामवंत धायउ रनधीरा।।
संग भालु भूधर तरु धारी।मारन लगे पचारि पचारी।।
भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना।गहि पद महि पटकइ भट नाना।।
देखि भालुपति निज दल घाता।कोपि माझ उर मारेसि लाता।।
sira bhuja bāṛhi dekhi ripu kerī |bhālu kapinha risa bhaī ghanerī ||
marata na mūṛha kaṭeu bhuja sīsā |dhāe kopi bhālu bhaṭa kīsā ||
bālitanaya māruti nala nīlā |bānararāja dubida balasīlā ||
biṭapa mahīdhara karahiṁ prahārā |soi giri taru gahi kapinha so mārā ||
eka nakhanhi ripu bapuṣa bidārī |bhaagi calahiṁ eka lātanha mārī ||
taba nala nīla siranhi caṛhi gayaū |nakhanhi lilāra bidārata bhayaū ||
rudhira dekhi biṣāda ura bhārī |tinhahi dharana kahũ bhujā pasārī ||
gahe na jāhiṁ karanhi para phirahīṁ |janu juga madhupa kamala bana carahīṁ ||
kopi kūdi dvau dharesi bahorī |mahi paṭakata bhaje bhujā marorī ||
puni sakopa dasa dhanu kara līnhe |saranhi māri ghāyala kapi kīnhe ||
hanumadādi muruchita kari bandara |pāi pradoṣa haraṣa dasakandhara ||
muruchita dekhi sakala kapi bīrā |jāmavanta dhāyau ranadhīrā ||
saṅga bhālu bhūdhara taru dhārī |mārana lage pacāri pacārī ||
bhayau kruddha rāvana balavānā |gahi pada mahi paṭakai bhaṭa nānā ||
dekhi bhālupati nija dala ghātā |kopi mājha ura māresi lātā ||
दुश्मन के सिर और हाथ बढ़ते देख कर, भालू और बंदर बहुत गुस्से से भर गए। बोले, "ये मूरख मर ही नहीं रहा, चाहे उसके हाथ और सिर काट दिए जाएँ!" और गुस्से में भालू और बंदर योद्धा उस पर टूट पड़े। अंगद जो बाली का बेटा है, हनुमान जो पवन का बेटा है, नल, नील, सुग्रीव जो बंदरों का राजा है, और बलवान द्विविद। उस पर पेड़ और पहाड़ से मारे; लेकिन उसने वही पहाड़ और पेड़ पकड़ कर बंदरों को मारा। कुछ ने दुश्मन की बॉडी नाखून से फाड़ दी, और कुछ ने लात मारी और भाग गए। फिर नल और नील उसके सिर पर चढ़ गए और नाखून से उसकी फोरहेड फाड़ने लगे। खून देख कर उसके दिल में बहुत तकलीफ हुई, और उसने उनको पकड़ने के लिए हाथ फैलाए। वो पकड़े नहीं गए, बस उसके हाथों पर इधर उधर घूमते रहे, जैसे दो भँवरे कमल के फूलों के बीच घूम रहे हों। फिर गुस्से में कूद कर उसने दोनों को पकड़ लिया; लेकिन जब वो उनको ज़मीन पे पटक रहा था, तब उन्होंने उसके हाथ मोड़ दिए और निकल गए। फिर गुस्से में उसने अपने हाथ में दस धनुष लिए, और बंदरों को तीर मारकर घायल कर दिया। हनुमान और बाकी बंदरों को बेहोश करके, दस सिर वाला शाम होने पर खुश हो गया। सारे बंदर योद्धा बेहोश देख कर, जामवंत जो रन में स्थिर था, आगे दौड़ा। उसके साथ भालू आए, पहाड़ और पेड़ उठा कर, और रावण को ललकार ललकार कर मारना शुरू किया। बलवान रावण बहुत गुस्से में आया, और बहुत योद्धा पैर से पकड़ कर ज़मीन पे पटकने लगा। अपनी सेना का कतल देख कर, भालूओं का राजा गुस्से में उसकी छाती के बीच लात मारी।
छंद 98
उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा।गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा।।
मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयौ।निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो।।
ura lāta ghāta pracaṇḍa lāgata bikala ratha te mahi parā |gahi bhālu bīsahũ kara manahũ kamalanhi base nisi madhukarā ||
muruchita biloki bahori pada hati bhālupati prabhu pahiṁ gayau |nisi jāni syandana ghāli tehi taba sūta jatanu karata bhayo ||
जब उसके सीने पे बहुत ज़ोर की लात पड़ी, तो वो अपने रथ से बेहाल होकर ज़मीन पे गिर गया। लेकिन उसके सारी बीस हाथों में भालू पकड़े हुए थे, जैसे रात को भनवारे कमल के फूल में बस गए हों। उसे बेहोश देखकर, भालूओं के राजा ने दोबारा उसको पांर से मारा और फिर भगवान के पास चले गए। उसके बाद सारथी ने देखा कि रात हो गई है, तो उसको रथ में लिटा दिया और उसकी देखभाल करने लगा।
दोहा 98
मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास।निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास।।98।।
muruchā bigata bhālu kapi saba āe prabhu pāsa |niśicara sakala rāvanahi gheri rahe ati trāsa ||98||
जब बेहोशी उतर गई, तो सारे भालू और बंदर वापस आ गए राम के पास। और सारे राक्षस बहुत डर में थे, वो सब रावन को घेर के बैठ गए।
चौपाई 99.1-7
तेही निसि सीता पहिं जाई।त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई।।
सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी।सीता उर भइ त्रास घनेरी।।
मुख मलीन उपजी मन चिंता।त्रिजटा सन बोली तब सीता।।
होइहि कहा कहसि किन माता।केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता।।
रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई।बिधि बिपरीत चरित सब करई।।
मोर अभाग्य जिआवत ओही।जेहिं हौ हरि पद कमल बिछोही।।
जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा।अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा।।
जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए।लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए।।
रघुपति बिरह सबिष सर भारी।तकि तकि मार बार बहु मारी।।
ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना।सोइ बिधि ताहि जिआव न आना।।
बहु बिधि कर बिलाप जानकी।करि करि सुरति कृपानिधान की।।
कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी।उर सर लागत मरइ सुरारी।।
प्रभु ताते उर हतइ न तेही।एहि के हृदयँ बसति बैदेही।।
tehī nisi sītā pahiṃ jāī |trijaṭā kahi saba kathā sunāī ||
sira bhuj bāṛhi sunata ripu kerī |sītā ura bhai trāsa ghanerī ||
mukha malīna upajī mana ciṃtā |trijaṭā sana bolī taba sītā ||
hoihi kahā kahasi kina mātā |kehi bidhi marihi bisva dukhadātā ||
raghupati sara sira kaṭehuṃ na maraī |bidhi biparīta carita saba karaī ||
mora abhāgya jiāvat ohī |jehiṃ hau hari pada kamala bichohī ||
jehiṃ kṛta kapaṭa kanaka mṛga jhūṭhā |ajahuṃ so daiva mohi para rūṭhā ||
jehiṃ bidhi mohi dukha dusaha sahāe |lachimana kahuṃ kaṭu bacana kahāe ||
raghupati biraha sabiṣa sara bhārī |taki taki māra bāra bahu mārī ||
aisehuṃ dukha jo rākha mama prānā |soi bidhi tāhi jiāva na ānā ||
bahu bidhi kara bilāpa jānakī |kari kari surati kṛpānidhāna kī ||
kaha trijaṭā sunu rājakumārī |ura sara lāgata marai surārī ||
prabhu tāte ura hatai na tehī |ehi ke hṛdayaṃ basati baidehī ||
उसी रात को त्रिजटा सीता के पास गई और उसको सब बात बता दी। जब उसने सुना कि दुश्मन के सिर और हाथ बार बार वापस उग रहे हैं, तो सीता के दिल में बहुत डर पैदा हुआ। उसका चेहरा उदास हो गया और मन में चिंता चल उठी। तब सीता ने त्रिजटा से बात की। "माता, मुझे क्यों नहीं बता रही कि क्या होगा? ये दुनिया को दुख देने वाला किस तरह मरेगा?" रघु के स्वामी के तीर उसके सिर काट देते हैं फिर भी वो नहीं मरता। मेरे खिलाफ हो कर विधि सब कुछ कर रहा है। मेरा ही किस्मत बुरा है जो उसे ज़िंदा रखता है, वही किस्मत जिसने मुझे हरि के चरण कमल से अलग कर दिया। वही किस्मत जिसने झूठा सोने का हिरण बनाया था, वो अभी भी मुझसे नाराज़ है। वही किस्मत जिसने मुझे बर्दाश्त ना होने वाला दुख झेलवाया और लक्ष्मण को कड़वे बोल बोलने के लिए मजबूर किया। रघु के स्वामी से बिछड़ के भारी ज़हरीले तीर से प्यार ने बार बार निशाना लगाकर मुझे मारा है। जिस किस्मत ने इतने दुख में भी मेरे साँस चल रही है, वही किस्मत, और कोई नहीं, उसे ज़िंदा रखता है।" जानकी ने बहुत तरह से रोना रोया, बार बार दया के भंडार वाले को याद करते हुए। त्रिजटा बोली, "सुन, राजकुमारी। देवताओं का दुश्मन तब मरेगा जब तीर उसके दिल पे लगेगा। इसीलिए प्रभु उसे दिल पे नहीं मारते, क्योंकि उसके दिल में वैदेही बसती है।
छंद 99
एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है।मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है।।
सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा।अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा।।
ehi ke hṛdayaṃ basa jānakī jānakī ura mama bāsa hai |mama udara bhuana aneka lāgata bāna saba kara nāsa hai ||
suni bacana haraṣa biṣāda mana ati dekhi puni trijaṭāṃ kahā |aba marihi ripu ehi bidhi sunahi suṃdarī tajahi saṃsaya mahā ||
इसके दिल में सीता रहती है, और सीता के दिल में मेरा बसेरा है। मेरे पेट में कई दुनिया हैं, तो अगर तीर वह लगे तो सब नाश हो जाएंगे। सीता को ये बात सुन कर खुशी भी हुई और दुख भी लगा। ये देख कर त्रिजटा फिर बोली, "सुनो सुंदरी, अब दुश्मन ऐसे मर जाएगा, अपना बड़ा शक छोड़ दो।"
दोहा 99
काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान।तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान।।99।।
kāṭata sira hoihi bikala chuṭi jāihi tava dhyāna |taba rāvanahi hṛdaya mahuṃ marihahiṃ rāmu sujāna ||99||
जैसे जैसे उसके सिर काटे जाएंगे, वो परेशान हो जाएगा, और उसका तुम्हारे बारे में सोचना टूट जाएगा। फिर समझदार राम रावन के दिल पर वार करेंगे, और वो मर जाएगा।
परम्परागत मान्यता में लंका-काण्ड के इस युद्ध-खण्ड का पाठ ‘भय-नाश’, ‘दुर्बुद्धि-क्षय’, और ‘माया-भ्रम’ के कटने में सहायक माना जाता है, विशेषतः दोहा 96 के भाव (माया-काटी) और दोहा 99 के निष्कर्ष (रावण का हृदय में राम से मरण) को ‘विवेक-जागरण’ का फल कहा जाता है।
सामान्य सत्संग-परम्परा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-जप को समपुट रूप में जोड़ा जाता है; कुछ परम्पराएँ संकट-निवारण हेतु ‘राम रक्षा’ भाव से ‘जय जय रघुवीर समर्थ’ का आवर्तन भी करती हैं (स्थानीय/संप्रदायानुसार भेद)।
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