Opening the text
This Sopāna is the awakening of bhakti through auspicious beginnings (mangal), right-seeing (darśana), and the first decisive recognition of Rāma’s divinity in human sweetness. In the Janaka-sabhā and Sītā-svayaṃvara atmosphere, the seeker’s mind learns to move from social spectacle (rāj-samāj, rāṅg-bhūmi) to inner adoration (anurāga), where each beholder sees the Lord according to their bhāvanā—thus training perception itself as a spiritual instrument.
स्वयंबर-रंगभूमि बाह्यतः राजसी प्रदर्शन है, पर भीतर ‘दर्शन-शिक्षा’ का यज्ञ है—जहाँ दृष्टि (darśana) ही साधन बनती है। ‘भावना जैसी, मूरति तैसी’ प्रतीक है कि जीव की अंतःवृत्ति ही अनुभव का पात्र बनती है; यह सापेक्षवाद नहीं, साधना-शास्त्र है—गुण-आधारित प्रतिक्रिया (स्पर्धा/भय/लोभ) से प्रेम-आधारित पहचान (अनुराग/श्रद्धा) तक मन का परिष्कार। राम का मानुष-रूप ‘नरभूषण’ होकर भी ‘परम तत्त्वमय’ है—यही निर्गुण–सगुण समन्वय का संकेत। सीता-स्वयंबर ‘श्री-प्राप्ति’ का रूपक है: धर्म-पालन (जनक), पात्रता (भाजन), और अनुग्रह (ईश-नियोजन) मिलकर जीव को प्रभु-प्राप्ति की ओर ले जाते हैं।
Verse 501 (चौपाई)
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।। लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।। हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी।। पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला।। रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।। चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।। देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी।। तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू।।
चलो, सीता के स्वयंवर को देखने चलते हैं। ईश्वर इतनी बड़ी कैसे करता है। लक्ष्मण ने कहा, वही इसके लायक है। नाथ, आपकी कृपा मेरे ऊपर है। यह बात सुन के सब ऋषि खुश हो गए। उन्होंने आशीर्वाद दिया और सब ने सुख महसूस किया। फिर वो कृपालु, सब रिशियों के साथ, धनुष वाले हॉल को देखने निकले। दोनों भाई उस जगह पहुंचे। शहर के लोगों को पता चल गया कि आ रहे हैं। सब लोग घर का काम भूल के निकल पड़े। बच्चे, जवान, बूढ़े, औरतें सब चले गए। जनक ने उन्हें देखा तो बहुत घबरा गया। उसने अपने नौकरों को तुरंत भेजा कि सबको सही जगह बिठाओ।
Verse 502 (दोहा/सोरठा)
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि। उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।।240।।
उन्होंने नरम-नरम बातें कही और सब औरतों और मर्दों को बिठा दिया। हर कोई अपनी जगह बैठा, बड़े लोग बड़ी जगह, छोटे लोग छोटी जगह, सब अपनी-अपनी जगह।
Verse 503 (चौपाई)
राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।। गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।। राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।। जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।। देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।। डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।। रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।। पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई।।
तब वहां दोनों राजकुमार आए। मन लगता था जैसे सुंदरता ही इंसान की शकल बन गई हो। वो गुणों के समुंदर थे, बड़े अच्छे इंसान, सबसे बड़े वीर। सुंदर, एक का रंग सांवला, एक का गोरा। वो राजकीय सभा में चमक रहे थे, जैसे आसमान में दो पूरे चाँद हों। हर कोई जैसे दिल में रखता था, वैसे ही प्रभु को देखता था। बड़े वीर उनका रूप देख रहे थे, जैसे वीरता ही इंसान बन गई हो। झूठी बातें करने वाले राजा डर गए जब उन्होंने प्रभु को देखा। उनको लगता था जैसे कोई भयानक चीज़ देख रहे हैं। राक्षस झूठी शकल में छुप के बैठे थे। उनको प्रभु काल जैसा लग रहा था। शहर के लोग दोनों भाइयों को देख रहे थे। आंखों को सुख देने वाले, सबके दिल खुश हो रहे थे।
Verse 504 (दोहा/सोरठा)
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।
औरतें खुशी से उन्हें देख रही थी, जैसे अपना अपना दिल चाहता था। लगता था जैसे सबसे सुंदर रूप उनके सामने सजदा हो।
Verse 505 (चौपाई)
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।। जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें।। सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।। जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा।। हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।। रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया।। उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।। एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ।।
ज्ञानी लोगों को प्रभु सब जगह वाला दिखा। बहुत सारे मुंह, हाथ, पैर, आंखें, सब कुछ दिखा। जनक और उसके परिवार ने देखा, अपना प्यारा दोस्त जैसा लग रहा था। राजा और रानी ने देखा, बच्चे जैसा प्यार था, बता नहीं सकते। योगियों को परमात्मा दिखा, शांत और साफ रूप में। हरि के भक्तों को दोनों भाई अपना भगवान लग रहे थे, सब सुख देने वाले। सीता ने राम को प्यार से देखा, उसका दिल बहुत खुश हुआ। जो उसने दिल महसूस किया वो भी नहीं बता सकती। कोई कवि कैसे लिखे, कैसे बताए। ऐसे ही वो रही, अपने दिल में। फिर कोसल के राजा ने उसे देखा।
Verse 506 (दोहा/सोरठा)
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर। सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर।।242।।
कोसल के युवराज राजदरबार में चमक रहे थे। उनका रंग गोरा और साँवला था, दोनों तरह का। इतना सुंदर कि सारी दुनिया उन्हे देखती रह जाती थी।
Verse 507 (चौपाई)
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।। सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के।। चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहीं बरनी।। कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला।। कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा।। भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।। पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं।। रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ।।
दोनों भाइयों की शकल ऐसी थी जैसे खुद बन गए हो। कितने भी काम देव हो, उनके सामने कुछ नहीं। चाँद भी इनके चेहरे के सामने शर्मा जाता। आँखें कमल जैसी, दिल खुश कर देती हैं। इनकी नज़र इतनी प्यारी थी कि दिल चोर लेती। जो फील आती है वो बयान नहीं हो सकती। गाल पे लाली, कान में झुमके। थोड़ा सा मुस्कुराने से बात ही अलग हो जाती। भाल पे तिलक चमकता। बालों को देख के मधुशुद भी शर्मा जाते। पीले कपड़े पहने, फूलों की तरह सज के। यह दोनों इतने सुंदर थे मानो पूरी दुनिया की खूबसूरती एक जगह आ गई हो।
Verse 508 (दोहा/सोरठा)
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल। बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल।।243।।
गले में मोतियों की माला थी, हाथी दाँत से बनी चीज़ें। तुलसी की माला भी पहनी थी। बाज़ू में इतनी ताकत थी जैसे बैल या शेर की ताकत हो। हाथ बड़े ताकतवर थे।
Verse 509 (चौपाई)
कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।। पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए।। देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे।। हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई।। करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।। जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।। निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा।। भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ।।
कमर पे पीला कपड़ा बाँधा था, तीर-कमान भी लटकी थी। हाथ में धनुष पकड़ा हुआ था। जनेऊ पीला रंग का था, अच्छा लग रहा था। सर से पाँव तक चमक दमक थी। लोगों ने देखा तो सब खुश हो गए। आँखें उनसे हट्टी नहीं जा रही थी। जनक बहुत खुश हुए दोनों भाइयों को देख के। दोनों भाई रिशियों के पास गए और उनके चरण पकड़े। उनसे मिल कर अपनी बात बताई। रिशियों को पूरा राज्य दिखाया। जहाँ भी यह दोनों राजकुमार गए, लोग हैरान रह गए। सब राम को अपनी नज़रिए से देख रहे थे। किसी को खास बात समझ नहीं आई। रिशि ने राजा को बताया कि यह कितने अच्छे हैं। राजा बहुत खुश हुआ।
Verse 510 (दोहा/सोरठा)
सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल। मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल।।244।।
सबसे बड़ा और सुंदर मंचा वहाँ था। राजा ने उसपे दोनों भाइयों को रिशियों के साथ बिठाया।
Verse 511 (चौपाई)
प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।। असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं।। बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।। अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।। बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी।। तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा।। एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ।। यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने।।
जब राजा लोगों ने राम को देखा, सब के दिल टूट गए। जैसे चाँद निकलता है तो तारे धुंधले पड़ जाते हैं। सबके मन में यह बात बैठ गई कि राम वो धनुष नहीं चला सकता। वो शिव का धनुष है, बिना तोड़े राम उसे चला देगा और सीता से शादी करेगा। यह सोच के वो लोग घर चले गए। उनकी बड़ाई, ताकत सब चली गई। कुछ राजा हँस पड़े, जो समझ में नहीं आते थे और अपनी अकड़ में अंधे हो रखे थे। उन्होंने कहा, वो धनुष चला देगा और शादी करेगा, बिना चलाए कौन राजकुमारी से शादी करे? एक बार तो मरना भी ठीक है, सीता के लिए हम लड़ाई जीत लेंगे। यह सुन के जो समझदार राजा थे, जो धरम पे चलते थे और भगवान के भक्त थे, वो मुस्कुराए।
Verse 512 (दोहा/सोरठा)
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।। जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे।।245।।
राम सीता से शादी करेंगे, और राजा लोगों की अकड़ तोड़ देंगे। दसरथ के लड़के लड़ाई में इतने माहिर हैं, उनको कौन हरा सकता है?
Verse 513 (चौपाई)
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।। सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।। जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी।। सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी।। सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई।। करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।। अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।। देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना।।
बेकार में मत मरो, अपने बाप की हवा मत दिखा। पेट भरा है मिठाइयों से पर दिमाग भूखा है। मेरी बात सुनो, सीता को मानो जैसे जगत की माता है। राम को मानो जैसे जगत के पिता हैं, उनकी खूबसूरती को आँखों में भर के देखो। यह दोनों भाई बहुत खूबसूरत हैं, सुख देते हैं, सब गुण इनमे हैं। अमृत के समुंदर के पास खड़े हो के मरने क्यों भाग रहे हो? जहाँ जाना है जाओ, आज मेरा जनम सफल हो गया। यह कह के जो अच्छे राजा थे, वो राम की खूबसूरती देखने लगे। देवता आसमान में अपने रथ में बैठ के देख रहे थे, फूल बरसा रहे थे और गाना गा रहे थे।
Verse 514 (दोहा/सोरठा)
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई। चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं।।246।।
तब सीता ने समझ लिया कि वक्त आ गया है। उसने कहा और जनक ने बुलावा भेजा। उसकी सहेलियाँ, जो समझदार और खूबसूरत थीं, इज्जत से उसको ले कर आईं।
Verse 515 (चौपाई)
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।। उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं।। सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई।। जौ पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया।। गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी।। बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही।। जौ छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छप सोई।। सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू।।
सीता की खूबसूरती का तो बयान ही नहीं हो सकता। वो जगत की माता हैं, गुण और रूप का खजाना हैं। मैं कोई मिसाल देऊँ तो वो भी कम लगती है, क्योंकि वो मिसाल तो नॉर्मल औरतों पे लगती हैं। सीता का रूप बताना और कोई मिसाल देना, वो गलत बात है। ऐसा करने वाला बुरा कवि कहलाएगा। सीता जैसी लड़की दुनिया में है ही नहीं। उसकी बात सरस्वती जैसी है, शरीर पार्वती जैसा है। रति देवी दुखी थी क्योंकि उसने अपना शरीर छोटा समझा। उसका भाई समुंदर है, दोस्त शिव है, फिर भी मैं कैसे बताऊँ कि वो लक्ष्मी जैसी है? अगर उसकी खूबसूरती अमृत होती तो समुंदर भर जाता। वो कछुआ भी खूबसूरती का बना होता। उसकी खूबसूरती मंदर फूल जैसी है, उसका सिंगार भी मंदर है। वो अपने हाथों से समुंदर मथ रही है।
Verse 516 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल। तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल।।247।।
लक्ष्मी की सुंदरता ऐसे ही उपजती है, यही सुख की जड़ है। लेकिन कवि कहते हैं कि सीता के बराबर कोई नहीं, यह बात उन्होंने बड़ी शर्म से कही है।
Verse 517 (चौपाई)
चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।। सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।। भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए।। रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।। हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई।। पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला।। सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा।। मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।
सीता अपनी सहेलियों के साथ चली, गाते हुए मनमोहक गीत। उसका सुंदर तन साड़ी में चमक रहा था, वो दुनिया की माँ है, उसकी चमक जैसी किसी की नहीं। उसके गहने सब सही जगह पे थे, सहेलियों ने हर अंग पे सजाया था। जब सीता रंगभूमि पे कदम रखती है, मर्द और औरतें उसकी सुंदरता देख के देखते रह जाते हैं। देवता खुश हो के ढोल बजाते हैं, अप्सरा गाती है और फूल बरसाती हैं। हाथ में कमल लेकर वो जयमाला लेकर चमक रही थी, सारी दुनिया बिना पलक झपके उसको देख रही थी। सीता के दिल में राम के लिए प्यार जग रहा था, सब राजा लोग उसकी सुंदरता देख के फिदा हो रहे थे। दोनों भाइयों ने रिशि को पास देखा, उनकी आँखें खजाना पाने के लिए तरस रही थी।
Verse 518 (दोहा/सोरठा)
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।। लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि।।248।।
सीता ने बड़ा समाज देखा और बड़े लोगों के सामने शरम आ रही थी। लेकिन उसने रघुवीर राम को देखा और उसे अपने दिल में बसा लिया।
Verse 519 (चौपाई)
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।। सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।। हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।। बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू।। जग भल कहहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू।। एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू।। तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।। कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।
मर्द और औरतें राम के रूप और सीता की सुंदरता देख रहे थे, पलक भी नहीं झपक रहे थे। सब सोच रहे थे और शर्म से बोल रहे थे, दिल में ब्रह्मा से दुआ कर रहे थे। कहते थे कि ब्रह्मा जल्दी जनक को समझा दे, उनका मन तैयार हो जाए। बिना सोचे-समझे राजा अपना वादा तोड़ दे और सीता और राम की शादी करवा दे। दुनिया यह अच्छा कहेगी और सब लोग खुश होंगे, लेकिन राजा की जिद ने दिल में आग लगा दी है। सब लोगों को बस एक ही तमन्ना थी कि काले रंग वाला राम ही जानकी के लिए बन जाए। तब जनक ने अपने गाने वाले बुलाए जो तारीफ के गीत गाते थे। राजा ने कहा कि जाओ और मेरा वादा सबको सुना दो, वो गाने वाले खुश होकर चले गए।
Verse 520 (दोहा/सोरठा)
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल। पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल।।249।।
बंदे ने अच्छे शब्द बोल के कहा कि सुनो सारे राजा लोग। हम विदेह के वादे को पूरा करेंगे और अपनी बड़ी बाहें उठा कर दिखायेंगे।
In this Bālakāṇḍa segment (Doha 240–249), Tulasīdāsa orchestrates a rāsa of adbhuta and śṛṅgāra that is immediately transfigured into bhakti-rasa. The arena is outwardly a royal spectacle, yet inwardly it is a laboratory of bhāvanā: ‘जिन्ह कें रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी’ becomes the theological hinge. Kings see threat or contest; yoginīs see tattva; bhaktas see iṣṭa-deva; women see incomparable beauty; Janaka sees fulfillment of dharma. This plurality is not relativism but a pedagogy—each jīva ascends by refining perception from guṇa-based reaction to prema-based recognition. Nirguṇa–saguṇa synthesis is embedded: the same Rāma is ‘परम तत्वमय’ to yogins and ‘नरभूषन’ to citizens. The meter’s chaupai-doha pulse stabilizes emotional surges into contemplation, making the passage liturgically recitable and spiritually incremental—true Sopāna movement from seeing to surrender.
Traditional satsang teaching: recitation of the Sītā-svayaṃvara darśana portion grants ‘दृष्टि-शुद्धि’—the refinement of perception so the mind turns from rivalry and anxiety to prema and surrender. It is also said to bestow saumangalya (auspiciousness) and steadiness of heart, because the doha-landings repeatedly settle the listener into dharma-bhāva.
Commonly used in many Manas-parāyaṇa traditions for marriage/auspicious contexts: “सीता राम, सीता राम, सीता राम” as a nāma-samput; and in some recitation lineages, the refrain “जय जय सीता राम” between doha units to preserve laya while keeping the mind anchored to nāma.
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