Bala KandaPrakarana 1820 Verses

Prakarana 18

सोपान-प्रवेश: ‘आदि-अविद्या’ से ‘श्रद्धा’ की ओर। बालकाण्ड में कथा का जन्म नहीं, साधक की दृष्टि का जन्म होता है—जहाँ जगत-व्यवहार (राजधर्म, भय, मित्रता, छल) के भीतर छिपी ‘दैवी-व्यवस्था’ (भावी/विधि) और ‘नाम-भक्ति’ की अनिवार्यता उद्घाटित होती है। यह चरण बताता है कि मुक्ति-पथ का पहला पायदान बाह्य-घटना नहीं, अंतःकरण का संस्कार है: गुरु-वचन, श्राप-फल, और कर्म-न्याय के बीच मन का शरणागति-गमन।

यह प्रकरण ‘सोपान-प्रवेश’ का नैतिक-दार्शनिक द्वार है: (1) ‘आदि-अविद्या’ का रूप—छल-ज्ञानी उपरोहित और राज-नीति के भीतर छिपी माया; (2) ‘भावी/विधि’—आकाशवाणी और श्राप-फल के माध्यम से यह उद्घाटन कि जगत-व्यवहार के पीछे दैवी-व्यवस्था काम कर रही है; (3) ‘कर्म-न्याय’—निर्दोष राजा भी सामाजिक-धर्म की संरचना में दंड-चक्र से अछूता नहीं; (4) ‘कुल बनाम भाव’—रावण-कुलोत्पत्ति दिखाकर तुलसी यह स्थापित करते हैं कि मुक्ति/पतन वंश से नहीं, अंतःस्वभाव (तमस-रजस-सत्त्व) और शरणागति से तय होता है; (5) ‘नाम-भक्ति की अनिवार्यता’—अनिश्चित जगत के बीच एकमात्र निश्चित आश्रय ‘भगवत्पद’ और ‘नाम’ है।

Verses

चौपाई 170.1-4

सयन कीन्ह नृप आयसु मानी।आसन जाइ बैठ छलग्यानी।।

श्रमित भूप निद्रा अति आई।सो किमि सोव सोच अधिकाई।।

कालकेतु निसिचर तहँ आवा।जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा।।

परम मित्र तापस नृप केरा।जानइ सो अति कपट घनेरा।।

तेहि के सत सुत अरु दस भाई।खल अति अजय देव दुखदाई।।

प्रथमहि भूप समर सब मारे।बिप्र संत सुर देखि दुखारे।।

तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा।तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा।।

जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ।भावी बस न जान कछु राऊ।।

sayana kīnha nṛpa āyasu mānī.āsana jāi baiṭha chala-gyānī..

śramita bhūpa nidrā ati āī.so kimi sova soca adhikāī..

kālaketu nisi-cara tahaṁ āvā.jehiṁ sūkāra hoi nṛpahi bhulāvā..

parama mitra tāpasa nṛpa kerā.jānai so ati kapaṭa ghanerā..

tehi ke sata suta aru dasa bhāī.khala ati ajaya deva dukhadāī..

prathamahĩ bhūpa samara saba māre.bipra santa sura dekhi dukhāre..

tehiṁ khala pāchila bayaru saṁbharā.tāpasa nṛpa mili mantra bicārā..

jehi ripu chaya soi racenhĩ upāū.bhāvī basa na jāna kachu rāū..

राजा ने हुकुम माना और लेट गया सोने के लिए, और धोखेबाज वहा जाके उसकी जगह बैठ गया। थका हुआ राजा गहरी नींद में चला गया, लेकिन दूसरा कैसे सो सकता था जिसका इतना बड़ा चिंता था? फिर वहा कलकेतु नाम का डेमन आया, वही जिसने सुअर का रूप लेके राजा को भटकाया था। वो तपस राजा का बहुत करीबी दोस्त था, और धोखे के बहुत सारे तरीके जानता था। उसके एक सो बेटे और दस भाई थे, बहुत बुरे लोग, जीतना मुश्किल, और भगवान के लिए परेशानी के वजह। पहले राजा ने लडाई में उन सब को मार डाला था, जब देखा कि उनसे ब्राह्मन, संत और भगवान परेशान थे। उस बुरे आदमी ने पुरानी दुश्मनी याद की, और तपस राजा के साथ मिलकर प्लान बनाया। उन दोनो ने ऐसी चाल सोची जिससे उनका दुश्मन खतम हो जाये, लेकिन राजा किस्मत के बस में था और उसको इसकी खबर बिलकुल नही थी।

दोहा 170

रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु।।⁠170।।

ripu tejasī akela api laghu kari gani-a na tāhu |ajahũ det dukha rabi sasihi sira avaseṣita rāhu ||⁠170||

कोई दुश्मन कितना भी तगड़ा हो, अगर वो अकेला भी हो, तो उसे छोटा समझना नहीं चाहिए. राहु का सिर ही बचा है, फिर भी वो अभी तक सूरज और चाँद को परेशान करता है.

चौपाई 171.1-4

तापस नृप निज सखहि निहारी।हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी।।

मित्रहि कहि सब कथा सुनाई।जातुधान बोला सुख पाई।।

अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा।जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा।।

परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई।बिनु औषध बिआधि बिधि खोई।।

कुल समेत रिपु मूल बहाई।चौथे दिवस मिलब मैं आई।।

तापस नृपहि बहुत परितोषी।चला महाकपटी अतिरोषी।।

भानुप्रतापहि बाजि समेता।पहुँचाएसि छन माझ निकेता।।

नृपहि नारि पहिं सयन कराई।हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई।।

tāpasa nṛpa nija sakhahi nihārī |haraṣi mileu uṭhi bhayu sukhārī ||

mitrahi kahi saba kathā sunāī |jātudhāna bolā sukha pāī ||

aba sādheuṁ ripu sunahu naresā |jauṁ tumha kīnha mora upadesā ||

parihari soca rahahu tumha soī |binu auṣadha biādhi bidhi khoī ||

kula sameta ripu mūla bahāī |cauthē divasa milaba maiṁ āī ||

tāpasa nṛpahi bahuta paritoṣī |calā mahā-kapaṭī ati-roṣī ||

bhānu-pratāpahi bāji sametā |pahuṁcāesi chana mājha niketā ||

nṛpahi nāri paiṁ sayana karāī |haya-gṛhaṁ bāṁdhesi bāji banāī ||

तपस्वी राजा ने अपने दोस्त को देखा। खुशी से उठा, गले लगा, और खुश हो गया। अपने दोस्त को सब बात बता दी। राक्षस खुश होकर जवाब दिया। अब मैं तुम्हारे दुश्मन को खतम कर ही दिया है। सुनो राजा, अगर तुम मेरी बात मानो। परेशानी छोड़ दो, आराम से रहो। भगवान ने बिना दवा के तुम्हारी बिमारी हटा दी है। तुम्हारे दुश्मन को पूरे खानदान के साथ जड़ से उखाड़ दूंगा। चौथरे दिन मिलने आऊंगा। तपस्वी राजा को बहुत तसल्ली देकर, बड़ा ढोंगी और गुस्से भरा हुआ चला गया। पल भर में उसने प्रतापभानु को उसके घोड़े के साथ उसके महल पहुंचा दिया। राजा को उसकी रानी के पास सुला दिया। घोड़े को ठेकिले में अच्छे से बांध दिया।

दोहा 171

राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि।।⁠171।।

rājā ke uparohitahi hari lai gayau bahori |lai rākhēsi giri khoha mahũ māyā̃ kari mati bhori ||⁠171||

फिर उस राक्षस ने राजा के पुरोहित को उठा ले गया। जादू करके उनका दिमाग फेर दिया, और उन्हें पहाड़ की गुफा में छुपा कर रख दिया।

चौपाई 172.1-4

आपु बिरचि उपरोहित रूपा।परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा।।

जागेउ नृप अनभएँ बिहाना।देखि भवन अति अचरजु माना।।

मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी।उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी।।

कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं।पुर नर नारि न जानेउ केहीं।।

गएँ जाम जुग भूपति आवा।घर घर उत्सव बाज बधावा।।

उपरोहितहि देख जब राजा।चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा।।

जुग सम नृपहि गए दिन तीनी।कपटी मुनि पद रह मति लीनी।।

समय जानि उपरोहित आवा।नृपहि मते सब कहि समुझावा।।

āpu biraci uparohita rūpā |pareu jāi tehi seja anūpā ||

jāgeu nṛpa anabhaẽ bihānā |dekhi bhavana ati acaraju mānā ||

muni mahimā mana mahũ anumānī |uṭheu gavãhi jehi jāna na rānī ||

kānana gayau bāji caṛhi tehĩ |pura nara nāri na jāneu kehī̃ ||

gaẽ jāma juga bhūpati āvā |ghara ghara utsava bāja badhāvā ||

uparohitahi dekha jaba rājā |cakita biloki sumiri soi kājā ||

juga sama nṛpahi gae dina tīnī |kapaṭī muni pada raha mati līnī ||

samaya jāni uparohita āvā |nṛpahi mate saba kahi samujhāvā ||

उसने खुद राजा के पूजारी का रूप धर लिया, और जा कर उस अनोखी चारपाई पर लेट गया। राजा सुबह होने से पहले जग गया, और अपने महल में खुद को देख कर बहुत हैरान हुआ। उसने रिशी की ताकत के बारे में सोचा, और चुपके से उठ गया, ताकि रानी को पता ना चले। फिर उसने घोड़ा चढ़ कर जंगल को चल दिया, और शहर के किसी आदमी या औरत को इसकी खबर नहीं हुई। जब दिन के दो पहर गुजर गए, तब राजा वापस आया। हर घर में त्योहार था, ढोल बज रहे थे और बधाई दी जा रही थी। जब राजा ने पूजारी को देखा, तोह वोह हैरान होकर उसे देखने लगा, और वोही पुरानी बात याद आयी। राजा के लिए तीन दिन ऐसे गुजरे जैसे युग बीत गए, क्योंकि उसका दिमाग उस झूठे रिशी के चरणों में ही लगा रहा। सही समय जान कर पूजारी आ गया, और राजा को सारी बात बता दी जो सोची गयी थी, और उसे समझा दिया।

दोहा 172

नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत।।⁠172।।

nṛpa haraṣeu pahicāni guru bhrama-basa rahā na ceta |bare turata sata sahasa bara bipra kuṭumba sameta ||⁠172||

राजा ने अपने गुरु को पहचाना तो बहुत खुश हुआ। पर वोह इतना घबरा गया कि उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था। फिर भी जल्दी से उसने एक लाख अच्छे ब्राह्मन को बुलाया, उनके परिवार के साथ।

चौपाई 173.1-4

उपरोहित जेवनार बनाई।छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई।।

मायामय तेहिं कीन्ह रसोई।बिंजन बहु गनि सकइ न कोई।।

बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा।तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा।।

भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए।पद पखारि सादर बैठाए।।

परुसन जबहिं लाग महिपाला।भै अकासबानी तेहि काला।।

बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू।है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू।।

भयउ रसोईं भूसुर माँसू।सब द्विज उठे मानि बिस्वासू।।

भूप बिकल मति मोहँ भुलानी।भावी बस आव मुख बानी।।

uparohita jevanāra banāī |charasa cāri bidhi jasi śruti gāī ||

māyāmaya tehiṁ kīnha rasoī |biṁjana bahu gani sakai na koī ||

bibidh mṛganha kara āmiṣa rā̃dhā |tehi mahuṁ bipra mā̃su khala sā̃dhā ||

bhojana kahuṁ saba bipra bolāe |pada pakhāri sādara baiṭhāe ||

parusana jabahiṁ lāga mahi-pālā |bhai ākāsa-bānī tehi kālā ||

bipra-bṛṁda uṭhi uṭhi gṛha jāhū |hai baṛi hāni anna jani khāhū ||

bhayau rasoīṁ bhūsura mā̃sū |saba dvija uṭhe māni bisvāsū ||

bhūpa bikala mati mohaṁ bhulānī |bhāvī basa āva mukha bānī ||

पुरोहित ने खाना बनाया। छह स्वाद के चार तरह के डिश थे, जैसे वेदों में बताया है। उसने जादू से खाना बनाया। इतना सारा टेस्टी खाना था कि कोई गिन नहीं सकता। उसने कई तरह के जानवरों का मास पकाया। उस कमीने ने उसमें ब्राह्मण का मास मिला दिया। उसने सारे ब्राह्मण को खाने पर बुलाया। उनके पैर धोए और इज्जत से बिठाया। जैसे ही राजा खाना परोसने लगा, उसी वक्त आसमान से आवाज आई। ब्राह्मण सब, उठो उठो और अपने घर जाओ। यहाँ बहुत नुकसान है, ये खाना मत खाओ। खाना ब्राह्मण के मास से बनाया गया है। आवाज पर बिस्वास करके सारे ब्राह्मण उठ गए। राजा परेशान हो गया, उसका दिमाग घूम गया। भाग्य के वस होने से उसके मुँह से कोई बात नहीं निकली।

दोहा 173

बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार।।⁠173।।

bole bipra sa-kopa taba nahiṁ kachu kīnha bicāra |jāi nisācara hohu nṛpa mūṛha sahita parivāra ||⁠173||

तब ब्राह्मन गुस्से में बोले, बिना कुछ सोचे। उन्होंने कहा, जा मूर्ख राजा, दानव बन जा, तू और तेरा पूरा परिवार।

चौपाई 174.1-4

छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई।घालै लिए सहित समुदाई।।

ईस्वर राखा धरम हमारा।जैहसि तैं समेत परिवारा।।

संबत मध्य नास तव होऊ।जलदाता न रहिहि कुल कोऊ।।

नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा।भै बहोरि बर गिरा अकासा।।

बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा।नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा।।

चकित बिप्र सब सुनि नभबानी।भूप गयउ जहँ भोजन खानी।।

तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा।फिरेउ राउ मन सोच अपारा।।

सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई।त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई।।

chatra-bandhu taiṁ bipra bolāī.ghālai liye sahita samudāī..

īsvara rākhā dharama hamārā.jaihasī taiṁ sameta parivārā..

saṁbata madhya nāsa tava hoū.jala-dātā na rahihi kula koū..

nṛpa suni śrāpa bikala ati trāsā.bhai bahori bara girā akāsā..

biprahu śrāpa bicāri na dīnhā.nahiṁ aparādha bhūpa kachu kīnhā..

cakita bipra saba suni nabha-bānī.bhūpa gayau jahaṁ bhojana khānī..

tahaṁ na asana nahiṁ bipra suārā.phireu rāu mana soca apārā..

saba prasaṅga mahisuranha sunāī.trasita pareu avanīṁ akulāī..

तुम ने खराब क्षत्रिय, ब्राह्मण को बुलाया और सब को यहाँ लाया ताकि उन सब को मिटा सको। भगवान ने हमारा धरम बचा लिया है। तुम अपने परिवार के साथ खुद ही मर जाओगे। एक साल के अंदर तुम्हारा नाश होगा, और तुम्हारे खंडान में कोई भी पानी देने के लिए नहीं बचेगा। राजा ने श्राप सुन कर बहुत घबराया और डर गया। फिर आसमान से एक अच्छी आवाज आई। ब्राह्मण, तुमने बिना सोचे समझे ये श्राप दे दिया। राजा ने कोई गलती नहीं की थी। सब ब्राह्मण आसमान की आवाज सुन कर हैरान हो गए। राजा वहाँ चला गया जहाँ खाना बन रहा था। वहाँ न खाना था और न कोई ब्राह्मण रसोइया था। राजा वापस मुड़ गया, उसके मन में बहुत चिंता थी। उसने सब बात ब्राह्मण को बता दी, और डर के मारे परेशान होकर ज़मीन पर गिर गया।

दोहा 174

भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर।।⁠174।।

bhūpati bhāvī miṭai nahiṃ jadapi na dūṣana tora |kieṃ anyathā hoi nahiṃ bipra-śrāpa ati ghora ||⁠174||

राजा, जो लिखा है वो मिट नहीं सकता, चाहे इसमे तुम्हारा कोई दोष नहीं है। ब्राह्मन की श्राप बहुत खतरनाक होती है, और कुछ भी किया जाये तो उसको बदला नहीं जा सकता।

चौपाई 175.1-4

अस कहि सब महिदेव सिधाए।समाचार पुरलोगन्ह पाए।।

सोचहिं दूषन दैवहि देहीं।बिचरत हंस काग किय जेहीं।।

उपरोहितहि भवन पहुँचाई।असुर तापसहि खबरि जनाई।।

तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए।सजि सजि सेन भूप सब धाए।।

घेरेन्हि नगर निसान बजाई।बिबिध भाँति नित होई लराई।।

जूझे सकल सुभट करि करनी।बंधु समेत परेउ नृप धरनी।।

सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा।बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा।।

रिपु जिति सब नृप नगर बसाई।निज पुर गवने जय जसु पाई।।

asa kahi saba mahideva sidhāe |samācāra pura-loganha pāe ||

sochahiṁ dūṣana daivahi dehīṁ |bicarata haṁsa kāga kiya jehīṁ ||

uporohitahi bhavana pahuṁcāī |asura tāpasahi khabari janāī ||

tehiṁ khala jahã-tahã patra paṭhāe |saji-saji sena bhūpa saba dhāe ||

gherenhi nagara nisāna bajāī |bibidha bhāṁti nita hoī larāī ||

jūjhe sakala subhaṭa kari karanī |bandhu sameta pareu nṛpa dharanī ||

satyaketu kula kou nahiṁ bāṁcā |bipraśrāpa kimi hoi asāṁcā ||

ripu jiti saba nṛpa nagara basāī |nija pura gavane jaya jasu pāī ||

यह कह के सब ब्राह्मिन चले गए, और शहर के लोगों को खबर लग गई। लोग दुखी हुए और तकदीर को दोस दिया, जो हंस बनाना चाह रहा था पर कौवा बना दिया। असुर ने पुरोहित को वापस उसके घर पहुँचाया, और उस तपस्वी को सब खबर दे दी। उस बुरे आदमी ने इधर उधर चिट्ठियाँ भेजी, और सब राजा अपनी सेना सजाके वहाँ दौड़ गए। ढोल बजाके शहर को घेर लिया, और रोज़ रोज़ तरह तरह से लड़ाई होती रही। सब सिपाही लड़े और बहादुरी करके गिर गए, और राजा अपने भाई के साथ ज़मीन पर गिर गया। सत्यकेतु के खानदान का कोई बचा नहीं, ब्राह्मिन का शाप कैसे झूठा होता। दुश्मन को हराके सब राजा शहर में बस गए, और जीत और नाम कमाके अपने शहर वापस चले गए।

दोहा 175

भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम।।⁠175।।

bharadvāja sunu jāhi jaba hoi bidhātā bāma |dhūri meru-sama janaka jama tāhi byāla-sama dāma ||⁠175||

सुन भरद्वाज, जब किसी इंसान की किस्मत खराब हो जाती है, तोह उसके लिए धूल भी माउंट मेरु जैसी भारी लगती है, अपना बाप भी यमराज जैसा लगता है, और एक रस्सी भी साँप जैसी दिखती है।

चौपाई 176.1-4

काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा।भयउ निसाचर सहित समाजा।।

दस सिर ताहि बीस भुजदंडा।रावन नाम बीर बरिबंडा।।

भूप अनुज अरिमर्दन नामा।भयउ सो कुंभकरन बलधामा।।

सचिव जो रहा धरमरुचि जासू।भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू।।

नाम बिभीषन जेहि जग जाना।बिष्नुभगत बिग्यान निधाना।।

रहे जे सुत सेवक नृप केरे।भए निसाचर घोर घनेरे।।

कामरूप खल जिनस अनेका।कुटिल भयंकर बिगत बिबेका।।

कृपा रहित हिंसक सब पापी।बरनि न जाहिं बिस्व परितापी।।

kāla pāi muni sunu soi rājā |bhayau nisācara sahita samājā ||

dasa sira tāhi bīsa bhujadaṇḍā |rāvan nāma bīra baribaṇḍā ||

bhūpa anuj arimardana nāmā |bhayau so kumbhakarana baladhāmā ||

saciva jo rahā dharmaruci jāsū |bhayau bimātra bandhu laghu tāsū ||

nāma bibhīṣana jehi jaga jānā |biṣṇubhagata bigyāna nidhānā ||

rahe je suta sevaka nṛpa kere |bhae nisācara ghora ghanere ||

kāmarūpa khala jinasa anekā |kuṭila bhayaṅkara bigata bibekā ||

kṛpā rahita hiṁsaka saba pāpī |barani na jāhiṁ bisva paritāpī ||

सुन रिशि, उस राजा का वक्त आने पर एक राक्षस की तरह जनम हुआ, अपने पूरी टीम के साथ। उसके दस सिर थे और बीस हाथ थे, नाम रावन था, एक बहुत ताकतवर योद्धा। राजा का छोटा भाई जिसका नाम अरिमर्दन था, वो कुंभकरन बना, ताकत का घर। जो मंत्री था जिसे धर्मरुचि कहते थे, वो उसका आधा भाई बना। उसका नाम विभीषन था, दुनिया भर में जाना जाता था, विष्णु का भक्त और ज्ञान का भंडार। राजा के बेटे और नौकर बहुत सारे भयंकर राक्षस बन के पैदा हुए। वो बुरे लोग थे, जो भी रूप चाहें ले सकते थे, कई तरह के, टेढ़े और डराऊने, समझ से सूने। सब बिना दया के, हिंसक और पापी थे, दुनिया को सताने वाले थे, जिन्हें अलग से लिखना मुश्किल है।

दोहा 176

उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।⁠176।।

upaje jadapi pulastya-kula pāvana amala anūpa |tadapi mahīsura śrāpa basa bhae sakala agha-rūpa ||⁠176||

ये लोग पुलस्त्य रिशि के खानदान में पैदा हुए थे, और बिलकुल साफ और साफ-सुथरे थे, कोई उनके जैसा नहीं था। फिर भी ब्राह्मन के शाप की वजह से सब पाप रूप बन गए।

चौपाई 177.1-4

कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई।परम उग्र नहिं बरनि सो जाई।।

गयउ निकट तप देखि बिधाता।मागहु बर प्रसन्न मैं ताता।।

करि बिनती पद गहि दससीसा।बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा।।

हम काहू के मरहिं न मारें।बानर मनुज जाति दुइ बारें।।

एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा।मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा।।

पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ।तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ।।

जौं एहिं खल नित करब अहारू।होइहि सब उजारि संसारू।।

सारद प्रेरि तासु मति फेरी।मागेसि नीद मास षट केरी।।

kīnha bibidh tapa tīn'ihu bhāī.parama ugra nahiṁ barani so jāī..

gayau nikaṭa tapa dekhi bidhātā.māgahu bara prasanna maiṁ tātā..

kari binatī pada gahi dasasīsā.boleu bacana sunahu jagadīsā..

hama kāhū ke marahiṁ na mārẽ.bānara manuja jāti dui bārẽ..

evam-astu tumha baṛa tapa kīn'hā.maiṁ brahmā̃ mili tehi bara dīn'hā..

puni prabhu kumbhakaraṇa pahiṁ gayau.tehi biloki mana bisamaya bhayau..

jaũ ehiṁ khala nita karaba ahārū.hoihi saba ujāri saṁsārū..

sārada preri tāsu mati pherī.māgesi nīda māsa ṣaṭ kerī..

टीन भाइयों ने बहुत तरह की तपस्या की थी, इतनी कड़क कि भी बता नही जा सकती। ब्रह्मा ने उनकी तपस्या देखी तो पास आए और बोले, वर मांगो, बेटा, मैं खुश हूँ। रावन ने पैर पकड़कर विनम्री निवेदन किया और बोला, सुनो जग के स्वामी। हम किसी के हाथों मरें नही। बांदो और इंसान, बस यह दो जात छोड़ दी। ऐसा ही हो। तुमने बड़ी तपस्या की है। ब्रह्मा और मैं मिलकर उसको यह वर दे दिया। फिर प्रभु कुम्भकरन के पास गए, और उसको देखकर उनके मन में हैरानी हुई। अगर यह खराब आदमी रोज खाता रहेगा तो पूरी दुनिया उजाड़ देगा। सरस्वती को भेजकर उसके दिमाग को मोड़ दिया, और वह छह महीने की नींद मांगने लगा।

दोहा 177

गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु।।⁠177।।

gae bibhīṣana pāsa puni kaheu putra bara māgu |tehiṁ māgeu bhagavaṁta pada-kamala amala anurāgu ||⁠177||

फिर ब्रह्मा विभीषण के पास गए और बोले, बेटा, कोई वरदान मांग लो। उसने भगवान के चरण कमल के लिए बिलकुल साफ और पाक प्यार मांगा।

चौपाई 178.1-4

तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए।हरषित ते अपने गृह आए।।

मय तनुजा मंदोदरि नामा।परम सुंदरी नारि ललामा।।

सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी।होइहि जातुधानपति जानी।।

हरषित भयउ नारि भलि पाई।पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई।।

गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी।बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी।।

सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा।कनक रचित मनिभवन अपारा।।

भोगावति जसि अहिकुल बासा।अमरावति जसि सक्रनिवासा।।

तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका।जग बिख्यात नाम तेहि लंका।।

tinhi dei bara brahma sidhāe |haraṣita te apane gṛha āe ||

maya tanujā mandodari nāmā |parama suṃdarī nāri lalāmā ||

soi mayã dīnhi rāvanahi ānī |hoihi jātudhāna-pati jānī ||

haraṣita bhayau nāri bhali pāī |puni dou baṃdhu biāhesi jāī ||

giri trikūṭa eka siṃdhu majhārī |bidhi nirmita durgama ati bhārī ||

soi maya dānavã bahuri saṃvārā |kanaka racita mani-bhavana apārā ||

bhogāvatī jasi ahi-kula bāsā |amarāvatī jasi sakra-nivāsā ||

tinh teṃ adhika ramya ati baṃkā |jaga bikhyāta nāma tehi laṅkā ||

ब्रह्मा ने उन सभी को वरदान दे दिया और वहां से चला गया. सब खुशी खुशी अपने अपने घर आ गए. मय की एक बेटी थी जिसका नाम मंदोदरी था. वो बहुत ही खूबसूरत औरत थी. मय ने उसे रावन के पास लाकर दे दिया, क्योंकि उसको पता था कि रावन दानवों का राजा बनेगा. रावन बहुत खुश हुआ कि इतनी अच्छी पत्नी मिल गई. फिर उसके दोनों भाइयों की भी शादी करवा दी. सागर के बीच में त्रिकुट नाम का एक पहाड़ था. ब्रह्मा ने उसको बनाया था और वहां बहुत मुश्किल से पहुंचा जा सकता था. फिर उसी पहाड़ को मय दानव ने सबसे सजाया. उसने वहां सोने और नगीना से बने बहुत बड़े महल बनवाए. वो शहर भोगावती जैसा था जहां नाग लोग रहते हैं, और अमरावती जैसा था जहां इंद्र रहता है. उन दोनों से भी ज्यादा सुंदर और शानदार वो शहर था. उसका नाम लंका है और पूरे जग में मशहूर है.

दोहा 178(क)-(ख)

खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव॥

कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥⁠178(क)॥

हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ॥

सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥⁠178(ख)॥

khāīṁ sindhu gabhīra ati cārihuṁ disi phiri āva |kanaka koṭ mani khacita dṛṛha barani na jāi banāva ||⁠178(ka)||

hari-prerita jehiṁ kalapa joi jātudhāna-pati hoi |sūra pratāpī atula-bala dala sameta basa soi ||⁠178(kha)||

इस शहर के चारों तरफ बहुत गहरा समुंदर है, जैसे किसी किले के पानी का सुरक्षा कुंड चारों तरफ घूम रहा हो. इसकी दीवार सोने की बनी है, उसमे हीरे मोती जड़े हुए हैं, बहुत मजबूत है. और उसकी बनावत इतनी सुंदर है कि बता नहीं सकते. भगवान हरि जिस को जब भी इस शहर का राजा बनाते हैं, वो राक्षसों का सरदार बनता है. वो बहुत तेज और बहुत ताकतवर होता है, और अपनी पूरी फौज के साथ वहीं रहता है.

चौपाई 179.1-4

रहे तहाँ निसिचर भट भारे।ते सब सुरन्ह समर संघारे।।

अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे।रच्छक कोटि जच्छपति केरे।।

दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई।सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई।।

देखि बिकट भट बड़ि कटकाई।जच्छ जीव लै गए पराई।।

फिरि सब नगर दसानन देखा।गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा।।

सुंदर सहज अगम अनुमानी।कीन्हि तहाँ रावन रजधानी।।

जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे।सुखी सकल रजनीचर कीन्हे।।

एक बार कुबेर पर धावा।पुष्पक जान जीति लै आवा।।

rahe tahā̃ nisi-cara bhaṭ bhāre |te saba suranha samara saṅghāre ||

aba tahā̃ rahahĩ sakra ke prere |racchaka koṭi jacchapati kere ||

dasamukha katahũ khabari asi pāī |sena sāji gaṛha gheresi jāī ||

dekhi bikaṭa bhaṭ baṛi kaṭakāī |jaccha jīva lai gae parāī ||

phiri saba nagara dasānana dekhā |gayu socha sukha bhayu biseṣā ||

sundara sahaja agama anumānī |kīnha tahā̃ rāvana rajadhānī ||

jehi jasa joga bā̃ṭi gṛha dīnhe |sukhī sakala rajanīcara kīnhe ||

ek bāra kubera para dhāvā |puṣpaka jāna jīti lai āvā ||

पहले वहाँ बहुत ताकतवर राक्षस योद्धा रहते थे, लेकिन भगवान ने सब को युद्ध में मार दिया। अब वहाँ इन्द्र के कहने पर यक्षों के राजा के करोड़ों गार्ड रखे गए। कहीं से रावन को इसकी खबर लग गई। उसने अपनी सेना सजाई और उस गढ़ को घेरने चला गया। वो भयानक योद्धा और इतनी बड़ी सेना देख कर यक्ष लोग अपनी जान बचा कर भाग गए। फिर रावन ने पूरा शहर घूम कर देखा। उसका चिंता गया और बहुत खुशी हुई। उसने सोचा ये शहर सुंदर है और अपने आप सुरक्षित है, तो वही अपनी राजधानी बना ली। जिस हिसाब से जिसका काम था, घर बांट दिए। सब राक्षस खुश कर दिए। एक बार उसने कुबेर पर हम्मर किया, उसे हरा कर पुष्पक विमान ले आया।

दोहा 179

कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ।।⁠179।।

kautukahī̃ kailāsa puni līnhesi jāi uṭhāi |manahũ tauli nija bāhubala calā bahuta sukha pāi ||⁠179||

फिर वोह खेल-कूद में कैलाश पर्वत उठाने गया, और उसको उठा कर ले गया। जैसे अपने हाथों की ताकत तोली हो, बहुत खुश होकर चला गया।

Frequently Asked Questions

परंपरा में इसे ‘अनर्थ-निवारक’ पाठ माना जाता है: माया-छल, कुटिल-मित्र, और अनिष्ट-शत्रु से सावधानी का विवेक जगता है; साथ ही विभीषण-वृत्तांत के कारण शरणागति-भाव पुष्ट होता है—‘भगवत्पद-अनुराग’ की सिद्धि का संस्कार मिलता है।

सामान्य मानस-परंपरा में रक्षा/शरणागति हेतु ‘राम’ नाम-संपुट या ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जप-संपुट जोड़ा जाता है; विभीषण-भाव को लक्ष्य कर ‘रामचरण-शरणं’ प्रकार का संकल्प/स्मरण भी कुछ परंपराओं में किया जाता है।

Ask anything about Prakarana 18 of the Ramcharitmanas

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Ramcharitmanas in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Awadhi recitation where available, and more.

Download on the App StoreGet it on Google Play

Continue reading in the Vedapath app

Open in App
Download on the App StoreGet it on Google Play