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यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ का द्वार है: राजसुख के शिखर पर खड़े होकर भी राम-धर्म के लिए स्वेच्छा से वनगमन स्वीकारते हैं। साधक के भीतर यही रूपांतरण घटता है—‘मेरा अधिकार’ से ‘ईश्वर-आज्ञा’ की ओर, तथा गृह-आश्रय से नाम-आश्रय की ओर। अयोध्या यहाँ ‘अहं-गृह’ का प्रतीक भी है; राम का निष्क्रमण वैराग्य नहीं, धर्म-निष्ठा और लोक-कल्याण-हित करुणा है।
यह खंड ‘त्याग-धर्म’ का द्वार है: राजसुख के शिखर पर खड़े होकर भी राम का वनगमन वैराग्य-प्रदर्शन नहीं, मर्यादा-पालन और लोक-कल्याण-करुणा है। अयोध्या ‘अहं-गृह’ का प्रतीक बनती है—जहाँ अधिकार, प्रतिष्ठा, और आसक्ति का निवास है; राम का निष्क्रमण साधक के भीतर ‘मेरा’ से ‘आज्ञा’ की ओर, ‘गृह-आश्रय’ से ‘नाम-आश्रय’ की ओर यात्रा है। लक्ष्मण का आवेग बताता है कि प्रेम जब मर्यादा से न बँधे तो वह क्रोध/विक्षेप बन सकता है; राम का धैर्य उसी प्रेम को दास्य-भक्ति में शुद्ध करता है। सुमित्रा का उपदेश गृहस्थ-धर्म का निषेध नहीं करता—उसे राम-आश्रित बनाकर पवित्र करता है: ‘अवध तहाँ जहँ राम निवासू’—स्थान नहीं, प्रभु-निवास ही तीर्थ है। रचनात्मक स्तर पर चोपाई की प्रवाहशीलता के बाद दोहा/सोरठा का ‘स्थैर्य-बिंदु’ साधक की चंचल वृत्ति को नीति-सिद्धांत में स्थिर करता है; सगुण राम (राजकुमार) ही निर्गुण-धर्म (मर्यादा/सत्य) के अधिष्ठाता बनकर मुक्ति-पथ खोलते हैं।
Verse 143 (चौपाई)
समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।। कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।। कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।। सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।। मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।। राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।। बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।। तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।
जब लक्ष्मण को पता चला, वो बहुत परेशान हो गया। रोते हुए उठ के दौड़ा गया। उसका बदन काँप रहा था, आँखों में आँसू थे। उसने बड़े प्यार से पाँव पकड़ लिए। कुछ बोल नहीं पा रहा था, खड़ा रह गया। जैसे मछली पानी से निकाल के मर रही हो। दिल सोच रहा था कि भगवान का क्या इरादा है। सारी खुशी दुख में बदल गई। मैं रघुनाथ से क्या कहूँ? क्या वो मुझे अयोध्या में रखेंगे या साथ ले जाएँगे? राम को देख के भाई ने हाथ जोड़े। शरीर और घर, सब कुछ कचरा लगने लगा। राम ने प्यार से बोला, वो बड़े अच्छे थे। भाई, प्यार में परेशान मत हो। दिल में समझो कि असली खुशी क्या है।
Verse 144 (दोहा/सोरठा)
मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।
माँ, बाप, गुरु और मालिक की बात सर पे रखो और दिल से मानो। उन्होंने इस जनम का असली फायदा उठा लिया, नहीं तो यह जनम बेकार है।
Verse 145 (चौपाई)
अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।। भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।। मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।। गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।। रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।। जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।। रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।। सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।
भाई, यह बात दिल में रखो और सुनो। माँ और बाप की सेवा करो। भरत घर संभालेगा, रिप्सुदन यहाँ नहीं है। राजा बुढ़े हो गए, मेरा मन दुखी है। मैं वन जाऊँगा, तुम्हे साथ ले के। अयोध्या सब अनाथ हो जाएगा। गुरु, माँ, बाप, प्रजा, परिवार, सब पे बड़ा दुख पड़ेगा। तुम रह के सब को खुश रखना। नहीं तो बड़ा दोष होगा। जिसका राज में प्रजा दुखी हो, वो राजा नरक जाता है। भाई, तुम रहना, यह सही है। यह सुन के लक्ष्मण बहुत परेशान हो गया। सीता की बात सुन के उसके शरीर सूख गए, जैसे कमल को ठंड लग जाए।
Verse 146 (दोहा/सोरठा)
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।
इतने प्यार में उसका जवाब भी नहीं आता था। वो परेशान हो के उसके पाँव पकड़ लेती है। बोलती है, प्रभु, मैं आपकी दासी हूँ और आप मेरे स्वामी हैं। अगर आप मुझे छोड़ दोगे तो मैं कहाँ जाऊँगी?
Verse 147 (चौपाई)
दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।। नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।। मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।। गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।। जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।। मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।। धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।। मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।
मेरे स्वामी ने मुझे अच्छी बात समझायी है। उन्होंने मुझे इतना चाहा कि मैं अपने आप को कोई बड़ा समझने लगी। आप इंसान में सबसे बड़े हो, धरम के धारण करते हो। वेद और नीति में भी आपके जैसा कोई नहीं। मैं तो बच्ची हूँ, आपने अपने प्यार से मुझे पाला है। क्या कोई बड़ा पहाड़ हंस को अपने पास रख लेता है? मैं किसी गुरु, पिता या माँ को नहीं जानती, सिर्फ आपको जानती हूँ। यह मेरी असली बात है, प्रभु। जितना प्यार दुनिया में होता है, वेद भी उसी प्यार की बात करते हैं। मेरा सब प्यार सिर्फ आपके लिए है, स्वामी। गरीबों के दोस्त, आप मेरे दिल में रहते हो। मुझे ही धरम और नीति समझाओ, इससे बड़ाई मिलेगी, अच्छी राह मिलेगी, और आपको भी पसंद आएगी। मेरा मन, काम, बात सब आपके चरणों में है। दया के समुंदर, आप मुझे कैसे छोड़ सकते हो?
Verse 148 (दोहा/सोरठा)
करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।
उसके नरम और झुक के बात सुन के, प्रभु ने उसे अपने दिल में लगा लिया। वो दया के समुंदर थे और अच्छे रिश्ते वाले थे। उन्हें पता था वो प्यार में डर गयी है, इसलिए उसे समझाया।
Verse 149 (चौपाई)
मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।। मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।। हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए। जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।। पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।। गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।। लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।। मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।
जाओ माँ से आशीर्वाद लो और जल्दी आओ, भाई, चल के जंगल चलते हैं। रघु कुल के सबसे बड़े की बात सुन के लक्ष्मण खुश हो गया। जो बड़ा नुकसान लग रहा था वो बड़ा फायदा बन गया। खुशी से दिल भरा हुआ था, वो माँ के पास गया। जैसे कोई अंधा आँखें वापस पा ले। जा के माँ के पाँव में माथा टेक दिया। उसका मन रघुनंदन के साथ जाने में लगा था। माँ ने देखा उसका मन उदास है, तो पूछा क्या हुआ। लक्ष्मण ने सारी बात बता दी। वो कठिन बात सुन के डर गयी, जैसे हिरण खतरा देख के डर जाता है। लक्ष्मण ने समझा आज तो बड़ा काम बिगड़ गया। इतने प्यार में कुछ नहीं हो पाएगा। डर और शर्म से उसने आशीर्वाद माँगा। क्या वो उसके साथ जाएगा, भगवान क्या करेंगे?
Verse 150 (दोहा/सोरठा)
समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।
सुमित्रा ने समझा कि राम और सीता कैसे हैं, उनका रूप, उनका अच्छा स्वभाव। राजा का प्यार देख के उसने सर झुकाया। उस पापी को उसने बड़ा बुरा कहा।
Verse 151 (चौपाई)
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।। तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।। अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।। जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।। गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।। रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।। पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।। अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।
उस वक़्त काफ़ी क्रिटिकल था, लेकिन उसने पेशेंस रखा। नॉर्मल दोस्त की तरह बोला, आराम से। तुम्हारी माँ जनक की बेटी है। राम तुम्हारे पापा हैं, जो तुमसे बहुत प्यार करते हैं। जहाँ राम रहते हैं, वही अयोध्या है। जहाँ सूरज चमकता है, वही दिन है। अगर सीता और राम जंगल चले जाते हैं, तो अयोध्या का तुम्हारे लिए कोई मतलब नहीं बचता। गुरु, पापा, माँ, भाई, भगवान, इन सब की सेवा करो जैसे अपनी जान की सेवा करते हो। राम जान से भी प्यारे हैं, सब की जान हैं। वो सब के दोस्त हैं, किसी अपना फ़ायदा नहीं सोचते। सब उनकी पूजा करते हैं, सब उन्हें प्यार करते हैं। यह बात दिल में रख के तुम भी जंगल चलो। बेटा, इस दुनिया में यही सबसे बड़ा काम है।
Verse 152 (दोहा/सोरठा)
भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ। जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।
मेरा तो बहुत अच्छा भाग है, मैं खुद को बलि दे देना चाहता हूँ। अगर तुमने अपने दिल से सारी चालाकी छोड़ दी है और राम के चरणों में शरण ली है, तो मैं बहुत खुश किस्मत वाला हूँ।
Verse 153 (चौपाई)
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।। नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।। तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।। सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।। राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।। सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।। तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।। जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।
असली माँ वो है जिसका बेटा राम का भक्त हो। नहीं तो कोई बेटा न हो, वही बेटर है। जो बेटा राम से दूर हो, उसे अच्छा है कि माँ ही न हो। तुम्हारा भाग अच्छा है कि राम जंगल जा रहे हैं। इसमें कोई और वजह नहीं है, बेटा। सब अच्छे काम का सबसे बड़ा रिज़ल्ट यह है कि राम और सीता के चरणों में प्यार हो। गुस्सा, ईर्शा, अहंकार, मोह, इन सब से दूर रहो। सपने में भी इनके पास मत जाओ। दिल से, काम से, बात से, राम की सेवा करो। तुम्हारा सब कुछ सही है। तुम्हारे साथ पापा, माँ, राम, सीता सब जा रहे हैं। अपने बेटे को यही सिखाना, जब राम जंगल जाएँगे तो दुख न हो।
Verse 154 (छंद)
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।। तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई। रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।
यही सिखाना है, बेटा, इससे तुम, राम और सीता खुश रहोगे। पापा, माँ, परिवार, शहर, यह सब याद भी नहीं रहेगा जंगल में। तुलसीदास ने राम को समझाया, राम ने उनको आशीर्वाद दिया। राम और सीता के चरणों में हमेशा प्यार रहे, रोज़ नया प्यार।
Verse 155 (दोहा/सोरठा)
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ। बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।
माँ के चरणों में सर रख के उसने तुरंत निकल लिया। दिल में बहुत टेंशन था। जैसे कोई शिकारी के पीछे हिरन भाग रहा हो, वैसे भाग रहा था।
Verse 156 (चौपाई)
गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।। बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।। कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।। तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।। कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।। भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।। सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।। सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।
लक्ष्मण वहाँ गया जहाँ जानकी के स्वामी थे। उसका मन खुश हो गया जब उसने अपना प्यारा साथी पा लिया। राम और सीता के सुंदर चरणों को प्रणाम करके वो उनके साथ चल पड़ा। वो तीनों राजा के महल तक आए। शहर के लोग आपस में बात करने लगे। भगवान ने जो अच्छी चीज़ बनाया था, वो बुरा हो गया। उनका बॉडी दुख से सुकर गया, चेहरा उदास हो गया। मन में घबराहट थी, जैसे मधु मक्खी का छीना हो। हाथ मलने लगे, सिर पीटने लगे, पछतावा हो रहा था। जैसे पक्षी बिना पंख के उड़ने की कोशिश करे। राजा के दरबार में बड़ा डर फैल गया। इतना बड़ा दुख है कि बताया नहीं जा सकता। मंत्रियों ने राजा को उठाया और बिठाया। राम प्यारे बोल बोलके उसके पाँव के पास खड़ा हो गया। सीता और दोनों बेटों को साथ देखकर राजा बहुत घबराता गया।
Verse 157 (दोहा/सोरठा)
सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ। बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।
सीता और दोनों बेटों को देखकर राजा बहुत दुखी हुआ। बार बार देखता और प्यार में उनको अपने सीने से लगा लेता। दिल भर आता था, फिर भी छोड़ता नहीं था।
Verse 158 (चौपाई)
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।। नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।। पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।। तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।। सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।। सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।। सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।। करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।
राजा इतना दुखी था कि बोल नहीं पा रहा था। दिल में आग लगी थी, दुख से जला जा रहा था। फिर भी उनके चरणों में सर झुकाया, प्यार से। राम उठकर जाने की इजाज़त माँगने लगे। बाबा, आप मुझे आशीर्वाद दो और आज्ञा दो। खुशी का टाइम है, आप दुखी क्यों हो रहे हो? आपने प्यार में जो किया, उसकी वजह से लोग आपको बुरा कहेंगे। यह सुनके राजा उठा। राम को बाहों में पकड़कर बिठाया। बेटा, सुनो। रिशि लोग कहते हैं कि तुम सारी दुनिया के स्वामी हो। भगवान सबका भला या बुरा देखता है। जो कर्म करते हो, वही फल मिलता है। यह शास्त्रों में लिखा है, सब जानते हैं।
Verse 159 (दोहा/सोरठा)
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।
कोई और गलती करता है, और दूसरा उसका फल भुगता है। भगवान के रास्ते बहुत अजीब हैं। इस दुनिया में कौन जान सकता है कि क्या सही है।
Verse 160 (चौपाई)
रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।। लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।। तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।। कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।। औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।। सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।। तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।
राजा ने राम को रोकने के लिए बहुत कोशिश की। हर तरह का उपाय सोचा, कोई भी चालाकी नहीं चाहिए थी। राम ने राजा का दुख देखा, पर रुके नहीं। धरम पर चले गए, पक्का फैसला किया। फिर राजा ने सीता को अपने पास बिठाया। बहुत प्यार से समझाया, हर तरह से। जंगल में कितना दुख होगा, यह बताया। ससुर, सास, पिताजी के पास खुश रहो, यह कहा। सीता का मन तो राम के चरणों में ही लगा था। घर भी अच्छा नहीं लगता था, जंगल भी बुरा नहीं लगता था। उसने सबको समझाया। जंगल में कितनी मुश्किलें हैं, बार बार बताया। मंत्री की पत्नी, गुरु की पत्नी, सब बड़ी समझदार औरतों ने प्यार से कहा। तुम्हे तो वनवास का ऑर्डर नहीं मिला। जो ससुर, गुरु, सास कहते हैं, वही करो।
Verse 161 (दोहा/सोरठा)
-सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि। सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।
जब सीता को समझाया गया कि वो शांत हो जाए, उसको यह बात पसंद नहीं आई। मानो किसी ने उसको सज़ा दी हो। ऐसा लग रहा था जैसे सरद का चाँद उसपे चमक रहा हो, और वो चकई पक्षी की तरह परेशान हो गई।
Verse 162 (चौपाई)
सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।। मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।। नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।। सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।। अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।। भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।। लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।। रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।
सीता शर्मा गई, उसने मना नहीं किया। यह सुनके कैकेयी गुस्सा हो गई। उसने साधू के कपड़े, गहने और बर्तन लाकर राजा के सामने रख दिए। फिर धीरे से बोली कि राजा को तम उसकी जान से भी ज़्यादा प्यारे हो। तम अपना अच्छा काम और अच्छा नाम मत बिगाड़ो। कोई तुम्हे जंगल जाने का नहीं कहेगा। जो तुम्हे सही लगता है वो करो। राम की माँ को यह सुनके थोड़ा सुकून मिला। राजा की बात उसको तीर की तरह लगी। वो अब जीना नहीं चाहते थे। लोग रोए, राजा बेहोश हो गया। कोई समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। राम ने जल्दी से साधू के कपड़े पहने। माँ को माथा टेका और चल दिए।
Verse 163 (दोहा/सोरठा)
सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।
जंगल के लिए सामान पैक कर लिया। औरतों और रिश्तेदारों के साथ साथ सब तैयार हो गए। भगवान ने पंडित और गुरु के पाँव पैरना, फिर सबको छोड़ के चले गए। सब लोग बेहोश हो गए थे।
परंपरागत मान्यता में दोहा 70–79 का पाठ ‘सेवा-धर्म’ और ‘मर्यादा-पालन’ की बुद्धि देता है: माता-पिता-गुरु-स्वामी के चरण-आज्ञा को सिर धरने की वृत्ति (दोहा 70) दृढ़ होती है, तथा लक्ष्मण-सुमित्रा प्रसंग से दास्य-भाव और विकार-त्याग का संस्कार पुष्ट होता है—जिसे गृहस्थ-धर्म में रहते हुए भी राम-आश्रय की सिद्धि माना जाता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में इस खंड के साथ ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-सम्पुट) या ‘राम राम’ का जप-सम्पुट रखा जाता है; विशेषतः लक्ष्मण के दास्य-वाक्य (‘नाथ दासु मैं’) के बाद नाम-स्मरण को साधक-सम्पुट माना जाता है।
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