वन-प्रवेश का सोपान: समाज-व्यवस्था से हटकर ‘अन्तःकरण-वन’ में साधना। यहाँ प्रकृति (सरसिज, पवन, खग) ‘मन-सर’ का रूप लेती है—इन्द्रिय-आकर्षण भी, और वैराग्य-प्रेरक शीतलता भी। इसी चरण में भक्ति का परिष्कार होता है: सौन्दर्य का आस्वाद ‘लीला’ बने, और माया का विवेचन ‘विवेक’—यही अरण्य-सोपान का द्वार है।
यह प्रकरण ‘वन’ को बाह्य भूगोल से अधिक ‘अन्तःकरण-वन’ बनाता है: सरोवर = मन-सर, कमल = शुद्ध भाव/भक्ति का प्रस्फुटन, भृंग-गुंजन/खग-कलरव = जगत का भगवदाभिमुख हो जाना (प्रकृति का कीर्तन)। सौन्दर्य यहाँ परीक्षा भी है और साधन भी—यदि आस्वाद ‘लीला’ बने तो शान्ति बढ़ती है; यदि आसक्ति बने तो माया का जाल। नारद के द्वारा नाम-तत्त्व स्थापित होता है: राम-नाम निराकार-साक्षात् शक्ति है, और राम-रूप लीला-आश्रय; दोनों एक ही मुक्ति-सीढ़ी के क्रमिक पायदान। ‘माया-रूपी नारी/वन’ रूपक साधक को चेताता है कि आकर्षण का विवेचन (विवेक) ही वैराग्य को स्थिर करता है। अंततः ‘संत-लक्षण’ मानक-मानचित्र है—भक्ति का परिष्कार चरित्र-शुद्धि, दया, दीनता, और निरहंकारता में प्रकट होता है।
चौपाई 40.1-5
बिकसे सरसिज नाना रंगा।मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।।
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा।प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।।
चक्रवाक बक खग समुदाई।देखत बनइ बरनि नहिं जाई।।
सुन्दर खग गन गिरा सुहाई।जात पथिक जनु लेत बोलाई।।
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए।चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।।
चंपक बकुल कदंब तमाला।पाटल पनस परास रसाला।।
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना।चंचरीक पटली कर गाना।।
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ।संतत बहइ मनोहर बाऊ।।
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं।सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।
bikase sarasija nānā raṁgā |madhura mukhara guṁjata bahu bhṛṁgā ||
bolata jalakukkuṭa kalahaṁsā |prabhu biloki janu karata prasaṁsā ||
cakravāka baka khaga samudāī |dekhata banai barani nahiṁ jāī ||
sundara khaga gana girā suhāī |jāta pathika janu leta bolāī ||
tāla samīpa muninha gṛha chāe |cahu disi kānana biṭapa suhāe ||
caṁpaka bakula kadaṁba tamālā |pāṭala panasa parāsa rasālā ||
nava pallava kusumita taru nānā |caṁcarīka paṭalī kara gānā ||
sītala maṁda sugaṁdha subhāū |saṁtata bahai manohara bāū ||
kuhū kuhū kokila dhuni karahīṁ |suni rava sarasa dhyāna muni ṭarahīṁ ||
बहुत सारे रंगे के कमल खिल रहे थे, और उनपर भद-भद मेहंगन की मधुर आवाज़ गूंज रही थी। जल का पक्षी और हंस भी बोल रहे थे, जैसे राम को देख कर उनकी तारीफ कर रहे हो। चक्रवाक, बगुले और दूसरे पक्षियों का झुंड वहाँ था। ये देख कर ही विश्वास होता है, वरना लफ़ज़ों में बयान नही हो सकता। प्यारे-प्यारे पक्षियों की आवाज़ ऐसी थी, जैसे रास्ते जाते मुसाफिरों को बुला रही हो। ताल के पास रिशियों ने अपने कुटिया बना रखे थे, और हर तरफ़ जंगल के पेड़ खूबसूरत लग रहे थे। वहाँ चम्पक, बकुल, कदम्ब, तमाल, पाटल, कटहल, पलाश और आम के पेड़ थे। ना-ना प्रकार के पेड़ नए पत्ते और फूलों से लदे थे, और भन्वरे की झुंडों ने गाना शुरू कर दिया था। एक ठंडी, धीमी और खुशबू वाली हवा वहाँ हमेशा चलती थी, अपने आप में ही बहुत प्यारी। कोयल कू-कू कू-कू आवाज़ कर रही थी, और उनकी मधुर आवाज़ सुन कर रिशियों का ध्यान भंग हो गया।
दोहा 40
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।
phala bhārana nami biṭapa saba rahe bhūmi niarāi |para upakārī puruṣa jimi navahiṁ susaṁpati pāi ||40||
सारे पेड़ अपने फल के बोझ से झुक गए थे और ज़मीन के पास आ गए। बिलकुल वैसे ही, जो लोग दूसरों का भला करते हैं, जब उनको बहुत दौलत मिलता है तो वो झुक के रहते हैं।
चौपाई 41.1-6
देखि राम अति रुचिर तलावा।मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।
देखी सुंदर तरुबर छाया।बैठे अनुज सहित रघुराया।।
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए।अस्तुति करि निज धाम सिधाए।।
बैठे परम प्रसन्न कृपाला।कहत अनुज सन कथा रसाला।।
बिरहवंत भगवंतहि देखी।नारद मन भा सोच बिसेषी।।
मोर साप करि अंगीकारा।सहत राम नाना दुख भारा।।
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई।पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।।
यह बिचारि नारद कर बीना।गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।।
गावत राम चरित मृदु बानी।प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।।
करत दंडवत लिए उठाई।राखे बहुत बार उर लाई।।
स्वागत पूँछि निकट बैठारे।लछिमन सादर चरन पखारे।।
dekhi rāma ati rucira talāvā |majjanu kīnha parama sukha pāvā ||
dekhī suṁdara tarubara chāyā |baiṭhe anuja sahita raghurāyā ||
tahã puni sakala deva muni āe |astuti kari nija dhāma sidhāe ||
baiṭhe parama prasanna kṛpālā |kahata anuja sana kathā rasālā ||
birahavaṁta bhagavaṁtahi dekhī |nārada mana bhā soca biseṣī ||
mora sāpa kari aṁgīkārā |sahata rāma nānā dukha bhārā ||
aise prabhuhi bilokaũ jāī |puni na banihi asa avasaru āī ||
yaha bicāri nārada kara bīnā |gae jahā̃ prabhu sukha āsīnā ||
gāvata rāma carita mṛdu bānī |prema sahita bahu bhā̃ti bakhānī ||
karata daṁḍavata lie uṭhāī |rākhe bahuta bāra ura lāī ||
svāgata pū̃chi nikaṭa baiṭhāre |lachimana sādara carana pakhāre ||
राम को बहुत सुंदर तालाब दिखा। उसने उसमे नहा लिया और बहुत ज्यादा खुशी पायी। एक खूबसूरत पेड की ठंडी छाया मिलती ही रघु के स्वामी राम अपने छोटे भाई के साथ वहाँ बैठ गए। फिर वहाँ सारे भगवान और रिशि आ गए। उनहोने स्तुति की और अपने अपने घर चले गए। दयालु राम वहाँ बहुत खुश बैठ के अपने छोटे भाई को प्यारी प्यारी कहानियाँ सुना रहे थे। राम को सीता के बिना तड़पते देख कर नारद का मन बहुत ज्यादा परेशान हुआ। उनका सोचना था कि मेरा श्राप कुबूल करके राम इतने सारे दुख उठा रहे हैं। मैं जाकर राम को ऐसे हाल मे देखूंगा, ऐसा मौका दोबारा नहीं मिलेगा। ऐसा सोच कर नारद अपने हाथ मे बीना लिए वहाँ चले गए जहाँ राम आराम से बैठे थे। उनहोने राम के काम को ढीमी आवाज मे गाते हुए, बहुत प्यार से अलग अलग तरीके से बयान किया। नारद दंडवत गिरते ही राम ने उन्हे उठा लिया और बार बार सीने से लगा लिया। राम ने उनका हाल पूछा, पास बिठाया, और लक्ष्मण ने इज्जत से उनके पाँव धो दिए।
दोहा 41
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।
nānā bidhi binatī kari prabhu prasanna jiyã jāni |nārada bole bacana taba jori saroruha pāni ||41||
नारद ने कई तरह से प्रभु को रिक्वेस्ट की, और दिल में समझ लिया कि भगवान खुश हो गए हैं। तब दोनों हाथ जोड़ कर नारद ने बात कही।
चौपाई 42.1-4
सुनहु उदार सहज रघुनायक।सुंदर अगम सुगम बर दायक।।
deहु एक बर मागउँ स्वामी।जद्यपि जानत अंतरजामी।।
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ।जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी।जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें।अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।।
तब नारद बोले हरषाई।अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।।
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका।श्रुति कह अधिक एक तें एका।।
राम सकल नामन्ह ते अधिका।होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
sunahu udāra sahaja raghunāyaka |sundara agama sugama bara dāyaka ||
dehū eka bara māgaū̃ svāmī |jadyapi jānat antarjāmī ||
jānahu muni tumha mora subhāū |jana sana kabahũ ki karaũ durāū ||
kavana bastu asi priya mohi lāgī |jo munibara na sakahu tumha māgī ||
jana kahũ kachu adeya nahĩ morẽ |asa bisvāsa tajahu jani bhorẽ ||
taba nārada bolē haraṣāī |asa bara māgaū̃ karaũ ḍhiṭhāī ||
jadyapi prabhu ke nāma anekā |śruti kaha adhika eka tẽ ekā ||
rāma sakala nāmanha te adhikā |hou nātha agha khaga gana badhikā ||
नारद बोले, सुनो रघु के स्वामी, आप बहुत उदार हैं और सहज स्वभाव के हैं, आप सुंदर हैं, पास पाना मुश्किल फिर भी आसान है, और आप वरदन देते हैं। मुझे एक वरदन दो, मेरे स्वामी, मैं यह माँग रहा हूँ, हालांकि आप दिल की बात जानने वाले हैं और पहले से जानते हैं। प्रभु बोले, हे मुनि, आप मेरा स्वभाव जानते हैं, अपने भक्त से मैं कभी कोई बात छुपा सकता हूँ क्या। मुझे ऐसी कौन सी चीज़ प्यारी है जो आप, सबसे बड़े मुनि, उसे माँग ना सको। अपने भक्त के लिए मेरे पास ऐसी कोई चीज़ नहीं जो मैं ना दो, इस विश्वास को कभी मत छोड़ो, गलती से भी नहीं। तब नारद खुशी से बोले, मैं हिम्मत करके ऐसा वरदन माँगता हूँ। हालांकि प्रभु के बहुत नाम हैं, और वेद कहते हैं कि हर नाम पिछले से भी बड़ा है। प्रभु, राम नाम सारे नाम से बड़ा हो, और पाप जो पक्षियों का झुंड है, उसका शिकारी बने।
दोहा 42(क)-(ख)
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।।
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।
rākā rajanī bhagati tava rāma nāma soi soma |apara nāma uḍagana bimala basuhũ bhagata ura byoma ||42(ka)||
evam-astu muni sana kaheu kṛpāsindhu raghunātha |taba nārada mana haraṣa ati prabhu pada nāyu mātha ||42(kha)||
तेरे ऊपर भगती हो पूरी चाँद की रात। राम का नाम उस रात का चाँद हो। तेरे बाकी नाम साफ तारे हैं, जो भक्त के दिल के आसमान में रहते हैं। राम, रघु के स्वामी, दया का सागर, रिशी से बोले, ठीक है, ऐसा ही होगा। फिर नारद के दिल में बहुत खुशी आयी, और उन्होंने भगवान के पैर पर सिर झुका दिया।
चौपाई 43.1-5
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी।पुनि नारद बोले मृदु बानी।।
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया।मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।।
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा।प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।।
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा।भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।जिमि बालक राखइ महतारी।।
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई।तहँ राखइ जननी अरगाई।।
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता।प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।।
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी।बालक सुत सम दास अमानी।।
जनहि मोर बल निज बल ताही।दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं।पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।
ati prasanna raghunāthahi jānī |puni nārada bolē mṛdu bānī ||
rāma jabahĩ prerēu nija māyā |mohehu mohi sunahu raghurāyā ||
taba bibāha maĩ cāhaũ kīnhā |prabhu kehi kārana karai na dīnhā ||
sunu muni tohi kahaũ sa-harosā |bhajahĩ je mohi taji sakala bharosā ||
karaũ sadā tinh kai rakhavārī |jimi bālaka rākhai mahatārī ||
gaha sisu baccha anala ahi dhāī |tahã̄ rākhai jananī aragāī ||
prauṛha bhaẽ tehi suta para mātā |prīti karai nahĩ pāchili bātā ||
more prauṛha tanaya sama gyānī |bālaka suta sama dāsa amānī ||
janahi mora bala nija bala tāhī |duhu kahã kāma krodha ripu āhī ||
yaha bicāri paṇḍita mohi bhajahī̃ |pāehũ gyāna bhagati nahĩ tajahī̃ ||
नारद ने देखा कि राम बहुत खुश हैं। फिर उन्होंने नरम आवाज में बात शुरू की। राम, सुनिए। जब आपने अपनी माया भेजी थी और मुझे भटका दिया था, तब मैं शादी करना चाहता था। प्रभु, किस वजह से आपने वो नहीं होने दिया? सुन रिशि, मैं खुशी से बताऊंगा। जो लोग मुझे भगवान मानते हैं और किसी और का भरोसा छोड़ देते हैं, मैं हमेशा उनकी रखवाली करता हूं, जैसे मां अपने बच्चे की रक्षा करती है। अगर छोटा बच्चा आग या सांप पकड़ने भागता है, तो मां वहां दौड़ी जाती है और उसे छीन लेती है। जब वो बेटा बड़ा हो जाता है, मां उससे प्यार करती है, पर पहले जैसा नहीं रहता। ज्ञानी लोग मेरे बड़े बेटे जैसे हैं, और सेवक लोग मेरे छोटे बच्चे जैसे हैं। सेवक को मेरी ताकत मिलती है, और ज्ञानी अपनी ताकत पर भरोसा करता है। दोनों के लिए काम और गुस्से दुश्मन हैं। ये सोच कर ज्ञानी लोग मुझे भगवान मानते हैं, और ज्ञान पाने के बाद भी भक्ति नहीं छोड़ते।
दोहा 43
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
kāma krodha lobhādi mada prabala moha kai dhāri |tinha mahã ati dāruna dukhada māyārūpī nāri ||43||
काम, गुस्सा, ललच और घमंद, ये सब मोह की बहुत ताकतवार धारयें हैं। और इन सबके बीच सबसे खतरनाक और सबसे दर्द भरी वो नारी है जो माया का रूप है।
चौपाई 44.1-4
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता।मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।
जप तप नेम जलाश्रय झारी।होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।
काम क्रोध मद मत्सर भेका।इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।
दुर्बासना कुमुद समुदाई।तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा।होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।
पुनि ममता जवास बहुताई।पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।
पाप उलूक निकर सुखकारी।नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।
बुधि बल सील सत्य सब मीना।बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।
suni muni kaha purāna śruti santā |moha bipina kahũ nāri basantā ||
japa tapa nema jalāśraya jhārī |hoi grīṣama soṣai saba nārī ||
kāma krodha mada matsara bhekā |inha hi haraṣa-prada baraṣā ekā ||
durbāsanā kumuda samudāī |tinha kahã sarada sadā sukhadāī ||
dharma sakala sarasīruha bṛndā |hoi hima tinhahi dahai sukha mandā ||
puni mamatā javāsa bahutāī |paluhai nāri sisira ritu pāī ||
pāpa ulūka nikara sukhakārī |nāri nibiṛa rajanī ãdhiārī ||
budhi bala sīla satya saba mīnā |banasī sama triy kahahĩ prabīnā ||
सुन रिशि, पुरान, वेद और संत यही कहते हैं. मोह का जंगल है और उसमे औरत बसंत रितु है. जप, तप और नियम पानी और तालाब हैं. औरत ग्रीष्म बन जाती है और सारा पानी सूखा देती है. काम, गुस्सा, अहंकार और ईर्षा मेंढक हैं. इनके लिए औरत बरसात बनती है, जो इन्हें खुशी देती है. बुरी इच्छा कुमुद फूल की तरह बहुत हैं. इनके लिए औरत शरद रितु है, हमेशा खुशी देती है. सारे गुण कमल के फूल हैं. इनके लिए औरत पाला बन जाती है, जिससे ये जल जाते हैं और इनका सुख कम हो जाता है. फिर ममता बहुत सा जवासा पौधा है. जब औरत शिशिर रितु बनती है तो ये पौधा बहुत फैल जाता है. पाप उल्लू का झुंड हैं जिन्हें औरत खुशी देती है. औरत घनी अंधेरी रात है. बुद्धि, बल, शील और सत्य, ये सब मछलियां हैं. समझदार लोग कहते हैं कि औरत मछली पकड़ने का कांटा है.
दोहा 44
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।
avaguṇa mūla sūlaprada pramadā saba dukha khāni |tāte kīnha nivārana muni maiṁ yaha jiyã jāni ||44||
औरत ही सब खराबियां पैदा करने की जड है। वो दर्द देती है और हर दुख की खान है। रिशि, ये बात मैने अपने दिल में जान कर तुम्हे शादी से रोका था।
चौपाई 45.1-5
सुनि रघुपति के बचन सुहाए।मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती।सेवक पर ममता अरु प्रीती।।
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी।ग्यान रंक नर मंद अभागी।।
पुनि सादर बोले मुनि नारद।सुनहु राम बिग्यान बिसारद।।
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा।कहहु नाथ भव भंजन भीरा।।
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ।जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।।
षट बिकार जित अनघ अकामा।अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
अमितबोध अनीह मितभोगी।सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।
सावधान मानद मदहीना।धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
suni raghupati ke bacana suhāe |muni tana pulaka nayana bhari āe ||
kahahu kavana prabhu kai asi rītī |sevaka para mamatā aru prītī ||
je na bhajahiṁ asa prabhu bhrama tyāgī |gyāna raṅka nara manda abhāgī ||
puni sādara bole muni nārada |sunahu rāma bigyāna bisārada ||
santanha ke lacchana raghubīrā |kahahu nātha bhava bhanjana bhīrā ||
sunu muni santanha ke guna kahū̃ |jinha te maiṁ unha keṁ basa rahū̃ ||
ṣaṭ bikāra jita anagha akāmā |acala akiñcana suci sukhadhāmā ||
amitabodha anīha mitabhogī |satyasāra kabi kobida jogī ||
sāvadhāna mānada madahīnā |dhīra dharma gati parama prabīnā ||
राम के प्यारे बोल सुन के रिशि के शरीर मे खुशी से रोंगटे खड़े हो गए और आँखों मे आँसू आ गए। रिशि बोले, बताओ क्या कोई और प्रभु ऐसा है जिसका अपने सेवक के ऊपर इतना प्यार और लगाव हो। जो लोग ऐसे प्रभु को भगते नहीं और अपने भ्रम छोड़ देते हैं, वो ज्ञान मे गरीब, सोच मे स्लो और भाग्य वाले नहीं हैं। फिर रिशि नारद ने इज़्ज़त से फिर से बोला, सुनो राम, तुम डीप नॉलेज के मास्टर हो। रघु के वीर, मेरे नाथ, दुनिया के डर मिटाने वाले, मुझे संतों की निशानियां बताओ। सुनो रिशि, मैं संतों के गुण बताता हूँ, जिनकी वजह से मैं उनके कंट्रोल मे रहता हूँ। उन्होंने छह पैशन्स जीत लिए हैं, वो पाप से फ्री हैं और किसी चाहत मे नहीं हैं, स्टेडी हैं, कुछ अपना नहीं रखते, प्योर हैं और खुशी का घर हैं। उनका ज्ञान अनलिमिटेड है, वो दुनिया की चाहत से फ्री हैं और एन्जॉय करने मे मॉडरेट हैं, सच को अपना एसेंस मानते हैं, और कवि, पढ़े लिखे और योगी हैं। वो अलर्ट रहते हैं, दूसरों को इज़्ज़त देते हैं, और घमंड से फ्री हैं, वो पेशेंट हैं और धरम के रास्ते मे सबसे स्किल्ड हैं।
दोहा 45
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।
guṇāgāra saṁsāra dukha rahita bigata saṁdeha |taji mama carana saroja priya tinh kahũ deha na geha ||45||
वो लोग गुनों का भंडार हैं, दुनिया के दुखों से बिलकुल दूर हैं, और कोई शक भी नहीं रहता उनका। मेरे चरण कमल के अलावा उन्हें कुछ भी प्यारा नहीं, ना अपना शरीर, ना अपना घर।
चौपाई 46.1-4
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं।पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती।सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती।।
जप तप ब्रत दम संजम नेमा।गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।
श्रद्धा छमा मयत्री दाया।मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना।बोध जथारथ बेद पुराना।।
दंभ मान मद करहिं न काऊ।भूलि न देहिं कुमारग पाऊ।।
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला।हेतु रहित परहित रत सीला।।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते।कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।
nija guna śravana sunata sakucāhīṁ |para guna sunata adhika haraṣāhīṁ ||
sama sītala nahiṁ tyāgahiṁ nītī |sarala subhāu sabahi sana prītī ||
japa tapa brata dama sañjama nemā |guru gobinda bipra pada premā ||
śraddhā chamā mayatrī dāyā |muditā mama pada prīti amāyā ||
birati bibeka binaya bigyānā |bodha jathāratha beda purānā ||
dambha māna mada karahiṁ na kāū |bhūli na dehiṁ kumāraga pāū ||
gāvahiṁ sunahiṁ sadā mama līlā |hetu rahita parahita rata sīlā ||
muni sunu sādhunha ke guna jete |kahi na sakahiṁ sārada śruti tete ||
अपने गुन सुन के वो शर्माते हैं, और दूसरों के गुन सुन के बहुत खुश होते हैं। उनका दिमाग ठंडा रहता है, वो कभी धरम नहीं छोड़ते। वो सीधे स्वभाव के हैं और सबसे प्यार करते हैं। वो जाप, तप, व्रत करते हैं, अपने आप को कंट्रोल करते हैं, और सब नियम फॉलो करते हैं। गुरु, गोविंद और ब्राह्मण के चरणों से उन्हें प्यार है। उनमे विश्वास है, वो बर्दाश्त करते हैं, सब के साथ दोस्ती करते हैं और दया रखते हैं। दूसरों की खुशी से खुश होते हैं। बिना किसी चल के मेरे चरणों से प्यार करते हैं। उनमे वैराग्य है, समझदारी है, विनम्रता है और ज्ञान है। वेद और पुरान को सही समझते हैं। वो कभी दिखावा, घमंड या अहंकार नहीं करते। गलती से भी कभी गलत रास्ते पर पैर नहीं रखते। वो हमेशा मेरी लीला गाते और सुनते हैं। उनमे कोई स्वार्थ नहीं होता, और वो हमेशा दूसरों के भले के लिए रहते हैं। सुनो रिशि, संत के गुन इतने हैं कि सरस्वती और वेद भी सब नहीं बता सकते।
छंद 46
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे।।
सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए।।
kahi saka na sārada seṣa nārada sunata pada paṅkaja gahe |asa dīnabandhu kṛpāla apane bhagata guna nija mukha kahe ||
siru nāi bārahiṁ bāra carananhi brahmapura nārada gae |te dhanya tulasīdāsa āsa bihāi je hari raṁga raṁe ||
सारदा और शेष भी ये सब बातें पूरी तरह नहीं कह सकते। ये सुन के नारद ने भगवन के चरण पकड़ लिए। गरीबों का दोस्त और दयालु भगवन ने अपने मुह से अपने भक्तों के गुण खुद कह दिए। बार बार भगवन के चरण में सिर झुका के नारद ब्रह्म लोक चले गए। तुलसीदास कहते हैं, ब्लेस्ड हैं वो लोग जिन्होंने हर और उम्मीद छोड़ दी और हरि के रंग में रंग गए।
दोहा 46(क)-(ख)
रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग।।46(क)।।
दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग।।46(ख)।।
rāvanāri jasu pāvana gāvahiṁ sunahiṁ je loga |rāma bhagati dṛṛha pāvahiṁ binu birāga japa joga ||46(ka)||
dīpa sikhā sama jubati tana mana jani hosi pataṅga |bhajahi rāma taji kāma mada karahi sadā satasaṅga ||46(kha)||
जो लोग राम की तारीफ गाते हैं और सुनते हैं, उन्हें राम की पक्की भक्ति मिल जाती है। राम वो हैं जिन्होंने रावन को हरा था। इसके लिए दुनिया से लगाव छोड़ना जरूरी नहीं, ना कोई जप करना पड़ता है ना योग करना पड़ता है। जवान औरत का बदन दिया की लौ जैसा है, अपना दिमाग पतंगा ना बना लेना। काम और घमंड छोड़ दो, राम की भक्ति करो, और हमेशा साधु लोगों के संग में रहो।
परम्परा में यह खण्ड ‘राम-नाम-महिमा’ और ‘संत-लक्षण’ के कारण नाम-निष्ठा दृढ़ करता है; माना जाता है कि इसके पाठ से मन की चंचलता शान्त होती है, माया-विकारों पर विवेक बढ़ता है, और सत्संग/कीर्तन में रुचि स्थिर होती है—विशेषतः दोहा 42 (राम-नाम) और दोहा 45 (संत-लक्षण) का पाठ ‘नाम-रस’ और ‘साधु-संग’ की प्राप्ति हेतु फलदायी कहा जाता है।
व्यवहार में प्रचलित समपुट: (1) ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-कीर्तन समपुट) विशेषतः दोहा 42 के साथ; (2) ‘सीता राम’ या ‘राम राम’ का जप-समपुट प्रकृति-वर्णन (दोहा 40) के पाठ के बाद ध्यान-स्थिरता हेतु। (स्थानीय परम्परा/सम्प्रदाय के अनुसार पाठ-रीति बदल सकती है।)
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