Ramayana Yuddha Kanda Sarga 83
Yuddha KandaSarga 8344 Verses

Sarga 83

त्र्यशीतितमः सर्गः (Sarga 83): Hanumān Reports Sītā’s ‘Slaying’; Rāma Collapses; Lakṣmaṇa’s Counter-Discourse on Dharma and Artha

युद्धकाण्ड

This sarga opens with Rāma hearing the intense saṅgrāma-nirghoṣa (war-roar) between Rākṣasas and Vānaras and directing Jāmbavān, the ṛkṣapati (bear-king), to reinforce Hanumān at the western gate. Hanumān arrives with battle-worn Vānaras and reports a devastating claim: Indrajit, son of Rāvaṇa, struck down the weeping Sītā before their eyes. The news precipitates a psychological collapse—Rāma, overcome by śoka, falls like a root-cut tree. Vānara leaders rush in, lift him, and sprinkle fragrant water (lotus-and-lily scented) as if calming a sudden flare of inextinguishable fire. Lakṣmaṇa then embraces the distressed Rāma and delivers a sharply reasoned speech that frames a dharma-sankat: if a virtuous, self-controlled person suffers while the unrighteous prosper, then dharma appears ineffective. He advances skeptical arguments—questioning whether dharma yields visible recompense, whether destiny rather than agency bears moral residue, and whether ‘truth-speaking’ as dharma is consistent with royal conduct. The speech pivots to artha-śāstra-like realism: prosperity enables social bonds, action, and even virtues; renouncing wealth can interrupt undertakings and invite error. Lakṣmaṇa concludes with resolve to neutralize the sorrow caused by Indrajit through decisive action and urges Rāma to recognize his own mahātman stature. The chapter thus juxtaposes battlefield intelligence, grief management, and a philosophically charged debate on dharma, artha, and effective kingship.

Recitation with translationValmiki Ramayana 6.83

Shlokas

Verse 1

राघवश्चापिविपुलंतंराक्षसवनौकसाम् ।श्रुत्वासङ्ग्रामनिर्घोषंजाम्बवन्तमुवाच ह ॥१॥

रघव ने सुना कि राक्षस और वानरों के बीच बड़ी लड़ाई हो रही है। आवाज़ बहुत ज़ोर की थी। उसने जाम्बवन्त को कहा कुछ।

Verse 2

सौम्यनूनंहनुमताकृतंकर्मसुदुष्करम् ।श्रूयते च यथाभीमस्सुमहावायुधस्वनः ॥२॥

हनुमान ने बहुत बड़ा काम किया है। बहुत मुश्किल काम था वो। अब बहुत ज़ोर की आवाज़ आ रही है। ऐसे लग रहा है जैसे आसमान फट रहा हो।

Verse 3

तद्गच्छकुरुसाहाय्यंस्वबलेनाभिसम्वृतः ।क्षिप्रमक्षपतेतस्यकपिश्रेष्ठस्ययुध्यतः ॥३॥

अब जाओ, अपनी पूरी सेना ले के। जल्दी जाओ और उस बंदर के बड़े सरदार की मदद करो। वो लड़ रहा है, उसकी ज़रूरत है।

Verse 4

ऋक्षराक्षस्तथोक्तस्तुस्वेनानीकेनसम्वृतः ।आगच्छत्पश्चिमद्वारंहनूमान्यत्रवानरः ॥४॥

राक्षस राजा ने कहा था, तो वो अपनी सेना ले के चला गया। पश्चिम की तरफ दरवाज़े पे गया, जहाँ हनुमान बैठा हुआ था।

Verse 5

अथायान्तंहनूमन्तंददर्शर्क्षपतिपथि ।वानरैःकृतसङ्ग्रामैश्श्वसद्भिरभिसम्वृतम् ॥५॥

रास्ता में भालुओं के सरदार ने हनुमान को आते हुए देखा। हनुमान के साथ वहाँ बहुत सारे वानर थे। वो सब लड़ाई लड़ के आ रहे थे और उनकी साँस चल रही थी।

Verse 6

दृष्टापथिहनूमांश्चतदृक्षबलमुद्यतम् ।नीलमेघनिभंभीमंसन्निवार्यन्यवर्तत ॥६॥

हनुमान ने रास्ते पर देखा कि भालू का पूरा सेना लड़ने के लिए तैयार है। वो इतने काले थे जैसे बादल हो। हनुमान ने उन्हे रोका और वापस भेज दिया।

Verse 7

स तेनसहसैन्येनसन्निकर्षंमहायशाः ।शीघ्रमागम्यरामायदुःखितोवाक्यमब्रवीत् ॥७॥

फिर वो अपनी पूरी सेना ले के जल्दी से राम के पास गया। वो बहुत दुखी था। उसने राम को सब कुछ बताया।

Verse 8

समरेयुध्यमानानामस्माकंप्रेक्षतांपुरः ।जघानरुदतींसीतामिन्द्रजिद्रावणात्मजः ॥८॥

जब हम लोग लड़ाई में लगे हुए थे, तब इंद्रजीत ने हमारी आँखों के सामने सीता को मारा। सीता रो रही थी। इंद्रजीत रावण का बेटा था।

Verse 9

उद्भ्रान्तचित्तस्तांदृष्टवाविषण्णोऽहमरिन्दमः ।तदहंभवतोवृतंविज्ञापयितुमागतः ॥९॥

जब मैंने उसे देखा, मेरा दिल बहुत घबरा गया। मैं बहुत दुखी हो गया। इसलिए मैं आपको यह सब बताने के लिए आया हूँ।

Verse 10

तस्यतद्वचनंश्रुत्वाराघवश्शोकमूर्चितः ।निपपाततदाभूमौछिन्नमूलंइवद्रुमः ॥१०॥

जब रघव ने उसकी बात सुनी, वो बहुत दुखी हो गया। इतना दुख हुआ कि बेहोश सा हो गया। ज़मीन पे गिर गया जैसे किसी पेड़ की जड़ कट गयी हो।

Verse 11

तंभूमौदेवसङ्काशंपतितंदृश्यराघवम् ।अभिपेतुस्समुत्पत्यसर्वतःकपिसत्तमाः ॥११॥

रघव जैसे भगवान है, वो ज़मीन पे गिरा हुआ था। सबसे बड़े बंदर सब तरफ से दौड़े आए। वो सब उसके पास गए।

Verse 12

आसिञ्चन् सलिलैश्चैनंपद्मोत्पलसुगन्धिभिः ।प्रदहन्तमानासाद्यंसहसाग्निमिवोद्यतम् ॥१२॥

वो सब उसके पास गए। कमल और कुमुद के फूल की खुशबू वाला पानी उसके ऊपर छिड़का। जैसे अचानक आग लग गयी हो और बुझा रहे हो।

Verse 13

तंलक्ष्मणोऽथबाहुभ्यांपरिष्वज्यसुदुःखितः ।उवाचराममस्वस्थंवाक्यंहेत्वर्थसम्युतम् ॥१३॥

लक्ष्मण बहुत दुखी था। उसने बीमार राम को अपनी बाहों में जकड़ लिया। फिर उसने राम से कुछ ऐसे बात की जो सही रीज़न से बनी थी।

Verse 14

शुभेवर्त्मनितिष्ठन्तंत्वामार्यविजितेन्द्रियम् ।अनर्थेभ्यो न शक्नोतित्रातुंधर्मोनिरर्थकः ॥१४॥

आप ऐसे इंसान हो जो सही रास्ते पर चल रहे हो, अपने आप को कंट्रोल में रखते हो। अगर धरम आपको बड़ी से नहीं बचा सकता, तो फिर धरम का क्या मतलब? धरम ही बेकार हो जाएगा।

Verse 15

भूतानांस्थावाराणां च जङ्गमानां च दर्शनम् ।यथास्ति न तथाधर्मस्तेननास्तीतिमेमतिः ॥१५॥

देखो, कुछ लोग खुश रहते हैं, कुछ दुखी। यह सब अपनी किस्मत से होता है। धरम से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। मेरी समझ में यह बात सही है।

Verse 16

यथैवस्थावरंव्यक्तंजङ्गमं न तथाविधम् ।नायमर्थस्तथायुक्तस्त्वद्विधो न विपद्यते ॥१६॥

जो चीज़ें एक जगह खड़ी रहती हैं, उनका हाल साफ दिखता है। पर जो चलती-फिरती हैं, उनका कोई फिक्स रूल नहीं होता। यह तुम्हारी बात सही नहीं लगी। तुम जैसे लोग कैसे बरबाद हो सकते हो।

Verse 17

यद्यधर्मोभवेद्भूतोरावणोनरकंव्रजेत् ।भवांश्चधर्मसम्युक्तोनैवंव्यसनमाप्नुयात् ॥१७॥

अगर बुराई सच में इतनी ताकत रखती, तो रावण नरक में जाता। और तुम जो धरम पे चलते हो, तुम्हे इतना दुख नहीं मिलता।

Verse 18

तस्य च व्यसनाभावाद्व्यसनंचागतेत्वयि ।धर्मोभवत्यधर्मश्चपरस्परविरोधिनौ ॥१८॥

देखो, उसको तो कोई तकलीफ़ नहीं है। और तुम्हारे ऊपर इतना दुख आ गया है। लगता है धरम और अधरम अपनी जगह बदल गए हैं। जो होना चाहिए था, वो नहीं हो रहा।

Verses 19-20

धर्मेणोपलभेद्धर्ममधर्मंचाप्यधर्मतः ।यद्यधर्मेणयुज्येयुर्येष्वधर्मःप्रतिष्ठितः ॥१९॥यदिधर्मेणवियुज्येरन्नधर्मरुचयोजनाः ।धर्मेणचरतांधर्मंचैषांधर्मफलंभवेत् ॥२०॥

जो इंसान अच्छा काम करता है, उसको अच्छा ही मिलता है। जो बुरा करता है, उसको बुरा ही मिलता है। अगर लोग बुराई में लगे हैं और उन्हे बुराई ही पसंद है, तो वो अच्छे काम का फल नहीं पा सकते। यह सिंपल बात है।

Verse 21

यस्मादर्थाविवर्धन्तेयेष्वधर्मःप्रतिष्ठितः ।क्लिश्यन्तेधर्मशीलाश्चतस्मादेतौनिरर्थकौ ॥२१॥

देख, जिनके पास बुराई है, उनके पास पैसा और पावर बढ़ रहा है। जो धरम पे चलते हैं, वो दुखी हैं। इसलिए लगता है धरम और बुराई दोनों की बात में कोई मतलब नहीं। सब कुछ उल्टा चल रहा है।

Verse 22

वध्यन्तेपापकर्माणोयद्यधर्मेणराघव ।वधकर्महतोऽधर्मः स हतःकिंवधिष्यति ॥२२॥

रघव, अगर पापी लोग मारे जाते हैं किसी गलत काम से, तो वो गलत काम खुद मर जाता है। एक बार मरने के बाद वो गलत काम फिर किसको मारेगा?

Verse 23

अथवाविहितेनायंहन्यतेहन्तिवापरम् ।विधिरालिप्यतेतेन न स पापेनकर्मणा ॥२३॥

या फिर कोई आदमी लिखे हुए विधि से मरता है या मारता है। उसमें दोष विधि का होता है, आदमी का नहीं। उस पाप करम में उसका कोई दोष नहीं।

Verse 24

अदृष्टप्रतिकारेणत्वव्यक्तेनासतासता ।कथंशक्यंपरंप्राप्तुंधर्मेणारिविकर्षण ॥२४॥

दुश्मनों को कुचलने वाले, धरम का फल सामने नहीं दिखता। पता नहीं वो सच है या झूठ। तो ऐसे में कैसे कोई बड़ा फल पा सकेगा धरम से?

Verse 25

यदिसत्स्यात्सतांमुख्यनासत्स्यत्तवकिञ्चन ।त्वयायदीदृशंप्राप्तंतस्मात्सन्नोपपद्यते ॥२५॥

अगर अच्चे काम सच में अच्छा फल देते, तो तुम्हे इतनी बड़ी तकलीफ न मिलती। तुम तो अच्चों में भी मैन हो। देखो तुम्हाला क्या हाल हुआ, इसलिए लगता है कि अच्छा होना का कोई पक्का रूल नहीं।

Verse 26

अथवादुर्बलःक्लीबोबलंधर्मोऽनुवर्तते ।दुर्बलोहृतमर्यादो न सेव्यइतिमेमतिः ॥२६॥

या फिर धरम कमज़ोर है, सिर्फ ताकत के पीछे पीछे चलता है। जो धरम कमज़ोर हो और उसकी कोई लिमिट न हो, उसका क्या फायदा? मेरा तो यही सोचना है।

Verse 27

बलस्ययदिचेद्धर्मोगुणभूतःपराक्रमे ।धर्ममुत्सृज्यवर्तस्वयथाधर्मेतथाबले ॥२७॥

अगर ताकत के काम में धरम छोटा पड़ता है, तो धरम को छोड़ दो। सिर्फ ताकत से काम चलाओ। जैसे पहले धरम से काम चलाते थे, वैसे ही अब ताकत से चलाओ।

Verse 28

अथचेत्सत्यवचनंधर्मः किलपरन्तप ।अनृतस्त्वय्यकरुणःकिं न बद्धस्त्वयापिता ॥२८॥

अगर सच बोलना धरम है, तो एक बात बताओ। तुम्हारा बाप तुम्हारे साथ ठीक नहीं था, उसने झूठ भी किया। फिर भी तुमने उसे क्यों नहीं रोका? उसे क्यों नहीं पकड़ा?

Verse 29

यदिधर्मोभवेद्भूतअधर्मोवापरन्तप ।न स्महत्वामुनिंवज्रीकुर्यादिज्यांशतक्रतुः ॥२९॥

अगर धरम सच में होता, या बुराई होती, तो इंद्र ने एक रिशि को मारा। फिर भी वो यज्ञ करता रहा। किसी ने उसे कुछ नहीं कहा। यह बड़ा अजीब बात है।

Verse 30

अधर्मसंश्रितोधर्मोविनाशयतिराघव ।सर्वमेतद्यथाकामंकाकुत्स्थकुरुतेनरः ॥३०॥

जब धरम बुरी चीज़ के साथ मिल जाता है, तो सब खराब हो जाता है। लोग जो चाहते हैं वही करते हैं। कोई धरम नहीं देखता, बस अपनी मर्ज़ी चलाते हैं।

Verse 31

ममचेदंमतंतातधरोऽयमितिराघव ।धर्ममूलंत्वयाछिन्नंराज्यमुत्सृजतातदा ॥३१॥

मेरा भी यही कहना है, रघु के बेटा। यह तो धरम है, लेकिन तुमने राज्य छोड़ा तो उस वक़्त धरम की जड़ ही काट दी।

Verse 32

अर्थेभ्योहिप्रवृद्धेभ्यःसम्वृत्तेभ्यस्ततस्ततः ।क्रियाःसर्वाःप्रवर्तन्तेपर्वतेभ्यःइवापगाः ॥३२॥

जब पैसा और रिसोर्सेज़ बढ़ते हैं, हर तरफ़ से आते हैं, तब काम चलने लगता है। जैसे पहाड़ से पानी बहता है।

Verse 33

अर्थेनहिविमुक्तस्यपुरुषस्याल्पचेतसः ।विच्छिद्यन्तेक्रियास्सर्वाग्रीष्मेकुसरितोयथा ॥३३॥

जो इंसान समझदार नहीं है और पैसा छोड़ देता है, उसका काम रुक जाता है। जैसे गर्मी में छोटे नल्ले सूख जाते हैं।

Verse 34

सोऽयमर्थंपरित्यज्यसुखकामःसुखैधितः ।पापमारभतेकर्तुंतदादोषःप्रवर्तते ॥३४॥

पैसा छोड़ के भी सुख माँगता है, आदत भी सुख की है। तो पाप करने लगता है, और फिर प्रॉब्लम शुरू हो जाती है।

Verse 35

यस्यार्थास्तस्यमित्राणियस्यार्थास्यस्यबान्धवाः ।यस्यार्थास्सपुमान्लोकेयस्यार्थाः स च पण्डितः ॥३५॥

जिसके पास पैसा है, उसके दोस्त हैं। जिसके पास पैसा है, उसके रिश्तेदार हैं। दुनिया में जिसके पास पैसा है वो आदमी माना जाता है, और वो पंडित भी कहलाता है।

Verse 36

यस्यार्थास्स च विक्रान्तोयस्यार्थास्स च बुद्धिमान् ।यस्यार्थास्समहाभागोयस्यार्थास्समहागुणः ॥३६॥

जिसके पास पैसा होता है, लोग उसे बहादुर बोलते हैं। जिसके पास पैसा होता है, उसे समझदार मानते हैं। जिसके पास पैसा होता है, उसे खुशनसीब कहते हैं। जिसके पास पैसा होता है, उसे अच्छा इंसान बताते हैं।

Verse 37

अर्थस्यैतेपरित्यागेदोषाःप्रव्याहृतामया ।राज्यमुत्सृजतावीरयेनबुद्धिस्त्वयाकृता ॥३७॥

मैंने तुम्हे बताया कि पैसा छोड़ने में क्या क्या प्रॉब्लम आती है। वीर, जब तुमने राज्य छोड़ा था, उस वक्त जो सोचा था वो मैं सही नहीं मानता।

Verse 38

यस्यार्थाःधर्मकामार्थास्तस्यसर्वंप्रदक्षिणम् ।अधनेनार्थकामेननार्थश्शक्योविचिन्वता ॥३८॥

जिसके पास पैसा है, उसका धरम और काम सब आसान चलता है। जो बंदा गरीब है और पैसा चाहता है, उसे पैसा आसान से नहीं मिलता।

Verse 39

हर्षःकामश्चदर्पश्चधर्मःक्रोधश्शमोदमः ।अर्थादेतानिसर्वाणिप्रवर्तन्तेनराधिप ॥३९॥

खुशी, इच्छा, अहंकार, फिर धरम भी, गुस्सा, शांत रहना, सब पैसा से ही चलता है। राजा, यह सब चीज़ें पैसा के बिना काम नहीं करती।

Verse 40

येषांनश्यत्ययंलोकश्चरतांधर्मचारिणाम् ।तेऽर्थास्त्वयि न दृश्यन्तेदुर्दिनेषुयथाग्रहाः ॥४०॥

जब लोग धरम के साथ रहते हैं, तब भी कभी-कभी दुनिया में उनकी इज़्ज़त रह नहीं पाती। ऐसे लोगों का पैसा और शक्ति तुम्हारे पास नहीं दिखती। जैसे बादल वाले दिन ग्रह नहीं दिखते, वैसे ही यह चीज़ें भी छुप जाती हैं।

Verse 41

त्वयिप्रव्रजितेवीरगुरोश्चवचनेस्थिते ।रक्षसापहृताभार्याप्राणैःप्रियतरातव ॥४१॥

जब तुम वनवास गए थे, तब तुमने अपने गुरु की बात मानी थी। उस वक़्त एक राक्षस ने तुम्हारी बीवी को उठा लिया। वो बीवी तुम्हारे लिए अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी थी।

Verse 42

तदद्यविपुलंवीरदुःखमिन्द्रजिताकृतम् ।कर्मणाव्यपनेष्यामितस्मादुत्तिष्ठराघव ॥४२॥

इंद्रजीत ने जो बड़ा दुख दिया है, मैं आज उसको खत्म करूँगा। उठो राघव, हिम्मत से काम लो। मैं अभी कुछ करके यह दुख दूर करूँगा।

Verse 43

उत्थिष्ठनरशार्दूलदीर्घबाहोधृतव्रत ।किमात्मानंमहात्मानंमात्मानं न बुध्यसे ॥४३॥

उठो, तुम तो लोगों में शेर हो। तुम्हारे हाथ लंबे हैं और तुम अपनी बात से कभी नहीं हटते। तुम खुद को पहचानो। तुम बड़े आदमी हो, अपने आप को संभालने वाले।

Verse 44

अयमनघतवोदितःप्रियार्थंजनकसुतानिधनंनिरीक्ष्यरुष्टः ।सरथगजहयांसराक्षसेन्द्रांभृशमिषुभिर्विनिपातयामिलङ्काम् ॥४४॥

हे तुम तो बिल्कुल साफ़ हो। मैंने प्यार में यह बात कही थी। पर जब मैंने देखा कि सीता पे खतरा है, मुझे गुस्सा आ गया। अब मैं अपने तीर से लंका को गिरा दूंगा। उसकी सारी रथ, हाथी, घोड़े, और उसका राजा सब को बरबाद कर दूंगा।

Inside Sarga 83

Voices in this sarga

  • Rāma
  • Hanumān
  • Lakṣmaṇa

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether dharma is meaningful when a righteous leader (Rāma) suffers and the unrighteous (Rāvaṇa/Indrajit) appear to succeed; the pivotal action is Lakṣmaṇa’s attempt to restore Rāma’s agency by reframing the crisis and calling for forceful counter-action.

The text stages a deliberate tension: Lakṣmaṇa articulates skepticism about moral causality (dharma’s fruits) and elevates artha as the practical basis of effective action, yet the narrative channels this critique into renewed resolve—ethical leadership must endure grief, but cannot abdicate decisive responsibility.

The western gate of Laṅkā functions as a tactical landmark in the siege narrative, while Laṅkā itself is invoked as the political-military center to be destroyed; culturally, the fragrant water sprinkling evokes a ritualized care-response to royal collapse, blending battlefield urgency with courtly/ritual sensibilities.

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