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वैवाहिकसंबन्ध-निश्चयः / Fixing the Mithila-Ayodhya Marital Alliance
बालकाण्ड
Sarga 72 formalizes the dynastic alliance between the Ikṣvāku princes and the Videha household through a sequence of courtly dialogue and ritual preparation. After Janaka’s genealogical account, Viśvāmitra—supported by Vasiṣṭha—frames the Ikṣvāku and Videha lineages as incomparable in glory and recommends a ‘sadṛśa’ (befitting) union: Sītā with Rāma and Ūrmilā with Lakṣmaṇa, alongside the proposal that Kuśadhvaja’s daughters be given to Bharata and Śatrughna. Janaka, with folded hands, accepts the counsel, declares his lineage blessed, and fixes the marriages to occur on an astrologically praised time associated with the Phalgunī asterisms and Bhaga as Prajāpati. He honors the sages with seats and affirms parity of royal authority between Mithilā and Ayodhyā, inviting appropriate governance of proceedings. Daśaratha responds with gratitude and praise, then withdraws to perform śrāddha rites and initiatory go-dāna on behalf of his sons, donating vast numbers of cows with ceremonial adornments and valuables to brāhmaṇas. The sarga closes with Daśaratha depicted as radiant, surrounded by his sons, like Prajāpati among the lokapālas—an image that sacralizes the political alliance through ritual generosity.
Verse 1
तमुक्तवन्तं वैदेहं विश्वामित्रो महामुनि:।उवाच वचनं वीरं वसिष्ठसहितो नृपम्।।।।
जब विदेह का राजा बात कर चुका था, तब विश्वामित्र रिशि ने उससे बात की। वशिष्ठ रिशि भी उसके साथ थे। दोनों ने मिलके राजा को सही जवाब दिया।
Verse 2
अचिन्त्यान्यप्रमेयानि कुलानि नरपुङ्गव।इक्ष्वाकूणां विदेहानां नैषां तुल्योऽस्ति कश्चन।।।।
इक्ष्वाकु और विदेह के वंश कितने बड़े हैं, कोई सोच भी नहीं सकता। इन दोनों के बराबर कोई नहीं है। यह दोनों खानदान बहुत बड़े हैं।
Verse 3
सदृशो धर्मसम्बन्ध: सदृशो रूपसम्पदा।रामलक्ष्मणयो राजन् सीता चोर्मिलया सह।।।।
राजा ने कहा, अब मैं अपने घर जाऊँगा। सब ठीक हो जाए, आपको भी भला हो। मैं जाके अपने पुरखों के लिए पूजा और दान सब करूँगा।
Verse 4
वक्तव्यं च नरश्रेष्ठ श्रूयतां वचनं मम।भ्राता यवीयान् धर्मज्ञ एष राजा कुशध्वज:।।।।
सुन्नो, मैं एक बात बताता हूँ। मेरा छोटा भाई है कुशध्वज। यह भी राजा है और धरम को बहुत समझता है।
Verse 5
अस्य धर्मात्मनो राजन् रूपेणाप्रतिमं भुवि ।सुताद्वयं नरश्रेष्ठ पत्न्यर्थं वरयामहे।।।।
राजा साहब, आप लोगों में बड़े हैं। यह दशरथ के बेटा बहुत धरम वाला है। दुनिया में उसका चेहरा मिलता नहीं। इसलिए हम आपकी दोनों बेटियों को उसके लिए माँगने आए हैं।
Verse 6
भरतस्य कुमारस्य शत्रुघ्नस्य च धीमत:।वरयामस्सुते राजन् तयोरर्थे महात्मनो:।।।।
राजा साहब, हम आपकी दोनों बेटियों को भरत और शत्रुघ्न के लिए माँगते हैं। भरत अभी जवान है और शत्रुघ्न समझदार है। दोनों बड़े अच्छे इंसान हैं।
Verse 7
पुत्रा दशरथस्येमे रूपयौवनशालिन:।लोकपालोपमास्सर्वे देवतुल्यपराक्रमा:।।।।
यह दशरथ के बेटे हैं। दोनों कितने अच्छे दिखते हैं, जवान हैं। दुनिया के रक्षक जैसे हैं, और दम में भगवान जैसा है।
Verse 8
उभयोरपि राजेन्द्र सम्बन्धेनानुबध्यताम्।इक्ष्वाको: कुलमव्यग्रं भवत:पुण्यकर्मण:।।।।
राजा साहब, आप बड़े राजा हैं। आपका घर और इक्ष्वाकु का खानदान दोनों अच्छे हैं। इनकी शादी से दोनों खानदान जुड़ जाएंगे। कोई झगड़ा नहीं होगा।
Verse 9
विश्वामित्रवच श्शृत्वा वसिष्ठस्य मते तदा।जनक: प्रांजलिर्वाक्यमुवाच मुनिपुङ्गवौ।।।।
विश्वामित्र ने जो कहा, वशिष्ठ भी वही समझे। दोनों की बात सुन के जनक ने हाथ जोड़ के दोनों रिशियों से बात की।
Verse 10
कुलं धन्यमिदं मन्ये येषां नो मुनिपुङ्गवौ ।सदृशं कुलसम्बन्धं यदाज्ञापयथ: स्वयम्।।।।
मैं समझता हूँ कि यह परिवार बहुत खुशकिस्मत है। आप दोनों बड़े रिशि हो और खुद आए हो। आपने दोनों परिवारों के लिए अच्छा रिश्ता बनाया है।
Verse 11
एवं भवतु भद्रं व: कुशध्वजसुते इमे।पत्न्यौ भजेतां सहितौ शत्रुघ्नभरतावुभौ।।।।
ठीक है, यह होना चाहिए। कुशध्वज की दोनों बेटियाँ भरत और शत्रुघ्न की पत्नियाँ बनेंगी। दोनों अपना घर संभालेंगे।
Verse 12
एकाह्ना राजपुत्रीणां चतसृणां महामुने।पाणीन् गृह्णन्तु चत्वारो राजपुत्रा महाबला:।।।।
हे महा रिशि, चारों राजकुमार बहुत बलवान हैं। एक ही दिन में चारों राजकुमारियों का हाथ ले लेंगे।
Verse 13
उत्तरे दिवसे ब्रह्मन् फल्गुनीभ्यां मनीषिण:।वैवाहिकं प्रशंसन्ति भगो यत्र प्रजापति:।।।।
ब्राह्मण, वाइज लोग कहते हैं कि अगले दिन शादी का टाइम बेस्ट है। जब फाल्गुनी तारे होते हैं और भग प्रजापति के रूप में होता है, तब शादी करना शुभ माना जाता है।
Verse 14
एवमुक्त्वा वचस्सौम्यं प्रत्युत्थाय कृताञ्जलि:।उभौ मुनिवरौ राजा जनको वाक्यमब्रवीत्।।।।
जनक ने अपनी बात खत्म की, जो बहुत नरम थी। फिर वो उठा, हाथ जोड़े, और दोनों बड़े रिशियों से बात की।
Verse 15
परो धर्म: कृतो मह्यं शिष्योऽस्मिभवतो सदा।इमान्यासनमुख्यानि आसातां मुनिपुङ्गवौ।।।।
जनक ने कहा, तुमने मेरे लिए बहुत बड़ा काम किया है। मैं हमेशा तुम्हारा शिष्य हूँ। अब बेटा, इन अच्छी सीटों पर बैठ जाओ।
Verse 16
यथा दशरथस्येयं तथाऽयोध्या पुरी मम।प्रभुत्वे नास्ति सन्देहो यथार्हं कर्तुमर्हथ।।।।
जैसे यह शहर दशरथ की है, वैसे अयोध्या मेरी है। कोई डाउट नहीं कि कौन का राजा है। अब तुम जो सही समझो वही करो।
Verse 17
तथा ब्रुवति वैदेहे जनके रघुनन्दन:।राजा दशरथो हृष्ट: प्रत्युवाच महीपतिम्।।।।
जब जनक ने ऐसा कहा, तब दशरथ बहुत खुश हुआ। वो रघु के वंश का था और उसने ज़मीन के राजा को जवाब दिया।
Verse 18
युवामसङ्ख्येयगुणौ भ्रातरौ मिथिलेश्वरौ।ऋषयो राजसङ्घाश्च भवद्भ्यामभिपूजिता:।।।।
तुम दोनों भाई हो और मिथिला के राजा हो। तुम दोनों में गुण कितने हैं, कोई गिन नहीं सकता। रिशि और राजा लोग तुम दोनों को बहुत इज्जत देते हैं।
Verse 19
स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गमिष्यामि स्वमालयम्।श्राद्धकर्माणि सर्वाणि विधास्यामीति चाब्रवीत्।।।।
राजा ने कहा, अब मैं अपने घर जाऊँगा। सब ठीक हो जाए, आपको भी भला हो। मैं जाके अपने पुरखों के लिए पूजा और दान सब करूँगा।
Verse 20
तमापृष्ट्वा नरपतिं राजा दशरथस्तदा।मुनीन्द्रौ तौ पुरस्कृत्य जगामाशु महायशा:।।।।
राजा दशरथ ने उस राजा से अनुमति ली। फिर दोनों रिशियों को आगे करके वो जल्दी निकल गए। उनकी बड़ाई थी सब जगह।
Verse 21
स गत्वा निलयं राजा श्राद्धं कृत्वा विधानत:।प्रभाते काल्यमुत्थाय चक्रे गोदानमुत्तमम्।।।।
राजा दशरथ अपने घर गए। वहाँ जाके पुरखों के लिए पूजा और दान किया। सुबह जल्दी उठके उन्होंने गाय दान किया। यह बहुत बड़ा काम है।
Verse 22
गवां शतसहस्राणि ब्राह्मणेभ्यो नराधिप:।एकैकशो ददौ राजा पुत्रानुद्दिश्य धर्मत:।।।।
राजा ने ब्राह्मणों को एक लाख गायें दी। एक-एक गाय उसने अपने हर बेटे के नाम पे दी। यह सब धरम के हिसाब से हुआ।
Verse 23
सुवर्णश्रुङ्गा स्सम्पन्ना स्सवत्सा: कांस्यदोहना:।गवां शतसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभ:।।।।वित्तमन्यच्च सुबहुद्विजेभ्यो रघुनन्दन:।ददौ गोदानमुद्दिश्य पुत्राणां पुत्रवत्सल:।।।।
रघुकुल के राजा ने ब्राह्मणों को चार लाख गायें दी। वो गायें सोने की सींग वाली थी। बच्चे भी उनके साथ थे। दूध निकालने के लिए कांसी के बर्तन भी दिए। राजा ने उनको अपने बेटों के नाम पे दिया। बहुत सारा पैसा भी दिया ब्राह्मणों को।
Verse 24
सुवर्णश्रुङ्गा स्सम्पन्ना स्सवत्सा: कांस्यदोहना:।गवां शतसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभ:।।1.72.23।।वित्तमन्यच्च सुबहुद्विजेभ्यो रघुनन्दन:।ददौ गोदानमुद्दिश्य पुत्राणां पुत्रवत्सल:।।1.72.24।।
रघुकुल के राजा ने ब्राह्मणों को चार लाख गायें दी। वो गायें सोने की सींग वाली थी। बच्चे भी उनके साथ थे। दूध निकालने के लिए कांसी के बर्तन भी दिए। राजा ने उनको अपने बेटों के नाम पे दिया। बहुत सारा पैसा भी दिया ब्राह्मणों को।
Verse 25
स सुतै: कृतगोदानैर्वृतस्तु नृपतिस्तदा।लोकपालैरिवाभाति वृत: स्सौम्य: प्रजापति:।।।।
राजा के बेटों ने गायें दान कर दी। अब राजा उनके बीच में खड़ा था। वो इतना अच्छा लग रहा था जैसे प्रजापति देवता हो। प्रजापति भी तो दुनिया के रक्षकों के बीच में रहते हैं।
The pivotal action is the dharmic authorization of inter-dynastic marriage: Janaka must publicly accept the sages’ recommendation that the alliances are ‘sadṛśa’ (properly matched) and then bind political intent to ritual correctness through auspicious timing and sanctioned gifts.
Legitimate power is shown as counsel-responsive and rite-grounded: kings act within an ethical framework where lineage prestige alone is insufficient unless confirmed by humility before sages, correct muhurta selection, and charitable redistribution (go-dāna) that anchors prosperity in dharma.
Geographically, Mithilā (Videha) and Ayodhyā are paired as equal royal spheres; culturally, the sarga highlights nakṣatra-based wedding timing (Pūrva/Uttara Phalgunī with Bhaga as Prajāpati), śrāddha observance, and the go-dāna ceremony with ritually described cattle and vessels.
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