
Rishi: Atharvanic tradition (often treated as anonymous/collective for this rain-charm cycle)
Devata: Parjanya/Varṣa (Rain) mediated through frogs as rain-messengers
Chandas: Anuṣṭubh (with colloquial/onomatopoetic coloring)
Mantra 1
वृष्टिः। स॒मुत्प॑तन्तु प्र॒दिशो॑ नभ॑स्वतीः॒ सम॒भ्राणि॒ वात॑जूतानि यन्तु । म॒ह॒ऋ॒ष॒भस्य॒ नद॑तो॒ नभ॑स्वतो वा॒श्रा आपः॑ पृथि॒वीं त॑र्पयन्तु
बारिश आए। बादल वाले आसमान उभर आए। हवा के साथ बादल ढेर सारे आए। भगवान इंद्र के पानी, जो बादल में गरजते हैं, वो धरती को निहाल करें। धरती को गीला करके तरपुआ दें।
Mantra 2
समी॑क्षयन्तु तवि॒षाः सु॒दान॑वो॒ ऽपां रसा॒ ओष॑धीभिः सचन्ताम्। व॒र्षस्य॒ सर्गा॑ महयन्तु॒ भूमिं॒ पृथ॑ग् जायन्ता॒मोष॑धयो वि॒श्वरू॑पाः
ताकत वाले लोग मिलकर काम करें। पानी के रस और सारे पोधे मिल जाएँ। बारिश की बूँदें धरती को बड़ा करें। हर तरह के पोधे अलग-अलग उग आएँ।
Mantra 3
समी॑क्षयस्व॒ गाय॑तो॒ नभां॑स्य॒पां वेगा॑सः॒ पृथ॒गुद् वि॑जन्ताम्। व॒र्षस्य॒ सर्गा॑ महयन्तु॒ भूमिं॑ पृथ॑ग् जायन्तां वी॒रुधो॑ वि॒श्वरू॑पाः
जो गा रहा है उसकी तरफ देखो। बादल के टुकड़े अलग-अलग फैल जाओ। पानी की तेज़ धार भी अलग-अलग बहने दो। बारिश से धरती बड़ी हो। हर तरह की पोधे अलग-अलग उग आएँ।
Mantra 4
ग॒णास्त्वोप॑ गायन्तु॒ मारु॑ताः पर्जन्य घो॒षिणः॒ पृथ॑क्। सर्गा॑ व॒र्षस्य॒ वर्ष॑तो॒ वर्ष॑न्तु पृथि॒वीमनु॑
मरुत गण पर्जन्य के लिए गाना गाएँ, हर तरफ से आवाज़ करके। बारिश के पानी की बूंदें धरती पर गिरते रहें, बारिश के साथ।
Mantra 5
उदी॑रयत मरुतः समुद्र॒तस्त्वे॒षो अ॒र्को नभ॒ उत् पा॑तयाथ । म॒ह॒ऋ॒ष॒भस्य॒ नद॑तो॒ नभ॑स्वतो वा॒श्रा आपः॑ पृथि॒वीं त॑र्पयन्तु
हे मरुत गण, समुंदर से पानी उठाओ और बादल से बिजली गिराओ। बड़े बैल की तरह गरजते हुए बादल से पानी गिरके धरती को तृप्त करें।
Mantra 6
अ॒भि क्र॑न्द स्त॒नया॒र्दयो॑द॒धिं भूमिं॑ पर्जन्य॒ पय॑सा॒ सम॑ङ्धि । त्वया॑ सृ॒ष्टं ब॑हु॒लमैतु॑ व॒र्षमा॑शारै॒षी कृ॒शगु॑रे॒त्वस्त॑म्
हे पर्जन्य, गरज और बादल फाड़। दूध जैसा पानी धरती पर बहा। तू जो बारिश भेजता है वो बहुत आए। जहाँ उम्मीन कम हो गई हो, जहाँ लोग थके हुए हैं, वहाँ भी पानी पहुँचे।
Mantra 7
सं वो॑ऽवन्तु सु॒दान॑व॒ उत्सा॑ अजग॒रा उ॒त। म॒रुद्भिः॒ प्रच्यु॑ता मे॒घा वर्ष॑न्तु पृथि॒वीमनु॑
अच्छे पानी के चश्मे तुम्हारी मदद करें। अजगरा भी साथ हो। मरुत गण के कारण बादल हिल जाएँ और धरती पर बारिश हो।
Mantra 8
आशा॑माशां॒ वि द्यो॑ततां॒ वाता॑ वान्तु दि॒शोदि॑शः । म॒रुद्भिः॒ प्रच्यु॑ता मे॒घाः सं य॑न्तु पृथि॒वीमनु॑
यह चमक एक जगह से दूसरी जगह फैल जाए। हवा हर तरफ से चले। बादल, जब मरुत के साथ हिलते हैं, तो आपस में जुड़ के धरती के ऊपर से गुज़र जाते हैं।
Mantra 9
आपो॑ वि॒द्युद॒भ्रं व॒र्षं सं वो॑ऽवन्तु सु॒दान॑व॒ उत्सा॑ अजग॒रा उ॒त। म॒रुद्भिः॒ प्रच्यु॑ता मे॒घाः प्राव॑न्तु पृथि॒वीमनु॑
पानी की यह दुआ है कि बिजली और बादल के साथ बारिश आए। पानी देने वाले तुम्हारी मदद करें। नाले और छुपे हुए पानी भी आए। बादल बारिश के साथ धरती पर पानी दे। मरुत देवता बादल को हिला के बारिश लाते हैं।
Mantra 10
अ॒पाम॒ग्निस्त॒नूभिः॑ संविदा॒नो य ओष॑धीनामधि॒पा ब॒भूव॑ । स नो॑ व॒र्षं व॑नुतां जा॒तवे॑दाः प्रा॒णं प्र॒जाभ्यो॑ अ॒मृतं॑ दि॒वस्परि॑
पानी का अग्नि अपनी सारी शक्तियों के साथ आया। वो पौधों का मालिक बन गया। जातवेदस हमें बारिश दिलाए। वो जान और प्राण दे जो कभी न मरे। यह चीज़ आसमान से आती है।
Mantra 11
प्र॒जाप॑तिः सलि॒लादा स॑मुद्रादाप॑ ई॒रय॑न्नुद॒धिम॑र्दयाति । प्र प्या॑यतां॒ वृष्णो॒ अश्व॑स्य॒ रेतो॒ऽर्वाङे॒तेन॑ स्तनयि॒त्नुनेहि॑
प्रजापति ने समुंदर से पानी निकाला। उसने बड़े समुंदर को हिला दिया। घोड़े की ताकत बढ़ जाए। बिजली की तरह आवाज़ हो। यह बारिश यहाँ आए।
Mantra 12
अ॒पो नि॑षि॒ञ्चन्नसु॑रः पि॒ता नः॒ श्वस॑न्तु॒ गर्ग॑रा अ॒पां व॑रु॒णाव॒ नीची॑र॒पः सृ॑ज । वद॑न्तु॒ पृश्नि॑बाहवो म॒ण्डूका॒ इरि॒णानु॑
बाप ने ऊपर से पानी गिराया। नालियों में पानी बहे। वरुण देवता ने पानी नीचे गिराया। मेंढक बोलने लगे सूखली ज़मीन पर।
Mantra 13
सं॒व॒त्स॒रं श॑शया॒ना ब्रा॑ह्म॒णा व्र॑तचा॒रिणः॑ । वाचं॑ प॒र्जन्य॑जिन्वितां॒ प्र म॒ण्डूका॑ अवादिषुः
एक साल तक मेंढक चुप रहते हैं, जैसे ब्राह्मण लोग व्रत में रहते हैं। फिर बारिश आती है और वो सब एक साथ आवाज़ निकालते हैं। वो अपनी आवाज़ से बोलने लगते हैं।
Mantra 14
उ॒प॒प्रव॑द मण्डूकि व॒र्षमा व॑द तादुरि । मध्ये॑ ह्र॒दस्य॑ प्लवस्व वि॒गृह्य॑ च॒तुरः॑ प॒दः
मेंढक, अब बोल और पुकार, बारिश को बुला। तादुरी, तू भी आवाज़ लगा। तालाब के बीच में तैरना और अपने चारों पाँव फैला के चल।
Mantra 15
खण्व॒खा३इ॒ खैम॒खा३इ॒ मध्ये॑ तदुरि । व॒र्षं व॑नुध्वं पितरो म॒रुतां॒ मन॑ इछत
खण्वखाई, खैमखाई, यह आवाज़ें बीच में गूँज रही हैं। तादुरी, तुम भी हो। पितरों, बारिश जीत लो। मरुतों के मन और इरादे को ढूँढो।
Mantra 16
म॒हान्तं॒ कोश॒मुद॑चा॒भि षि॑ञ्च सविद्यु॒तं भ॑वतु॒ वातु॒ वातः॑ । त॒न्वतां॑ य॒ज्ञं ब॑हु॒धा विसृ॑ष्टा आन॒न्दिनी॒रोष॑धयो भवन्तु
बड़े पानी के कोश से पानी बहाओ। बिजली चमके और हवा चले। यज्ञ का काम बहुत तरह से फैल जाए। सारी झाड़ी-पत्ती खुशी से हरी-भरी हो जाए।
Because frogs typically begin calling when rains arrive; the sukta treats their croaking as Parjanya’s messenger-sound—an omen and a ritual signal that helps ‘summon’ the showers.
To gather and drive the clouds with wind and then release strong rain-waters that refresh the earth, refill ponds, and secure crops and prosperity.
Primarily prosperity (paustika): rain ensures food, fodder, and stability. It is also “health-adjacent” because drought relief protects communal well-being.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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