
Rishi: RV-source attribution required for precision (AV20 is RV-derived).
Devata: Indra (soma-recipient; giver of wealth and victory)
Chandas: Mixed/extended RV meter (multi-pāda structure; requires RV locus confirmation).
Mantra 1
सव॒नोति॒ हि सु॒न्वन् क्षयं॒ परी॑णसः सुन्वा॒नो हि ष्मा॒ यज॒त्यव॒ द्विषो॑ दे॒वाना॒मव॒ द्विषः॑ । सु॒न्वा॒न इत् सि॑षासति स॒हस्रा॑ वा॒ज्यवृ॑तः । सु॒न्वा॒नायेन्द्रो॑ ददात्या॒भुवं॑ र॒यिं द॑दात्या॒भुव॑म्
जो सोम का रस निकालता है, उसके लिए घर मिलता है। कोई कमी नहीं रहती। रस निकालने वाला भगवान के पूजा करता है। वो भगवान के दुश्मनों को हराता है, उनको नीचे गिरा देता है। रस निकालने वाला हज़ारों चीज़ें माँगता है। उसके लिए पुरस्कार भी मिलते हैं। इंद्र उसको धन देता है, जो बढ़ता रहता है। वो धन कभी ख़त्म नहीं होता।
Mantra 2
मो षु वो॑ अ॒स्मद॒भि तानि॒ पौंस्या॒ सना॑ भूवन् द्यु॒म्नानि॒ मोत जा॑रिषुर॒स्मत् पु॒रोत जा॑रिषुः । यद् व॑श्चि॒त्रं यु॒गेयु॑गे॒ नव्यं॒ घोषा॒दम॑र्त्यम्। अ॒स्मासु॒ तन्म॑रुतो॒ यच्च॑ दु॒ष्टृरं॑ दिधृ॒ता यच्च॑ दु॒ष्टर॑म्
मरुत देवताओं की पुरानी शक्ति हमारे खिलाफ न हो। वो हमारे लिए अच्छी चीज़ें लाएँ। वो हमें न बिगाड़ें, हमारा खराब न करें। मरुत की जो शक्ति हर वक्त नयी है और अमर है, वो हमें मिले। जो मुश्किल से रोका जा सके और जिससे आगे बढ़ना मुश्किल हो, वो ताकत हमारे अंदर आए।
Mantra 3
अ॒ग्निं होता॑रं मन्ये॒ दास्व॑न्तं॒ वसुं॑ सू॒नुं सह॑सो जा॒तवे॑दसं॒ विप्रं॒ न जा॒तवे॑दसम्। य ऊ॒र्ध्वया॑ स्वध्व॒रो दे॒वो दे॒वाच्या॑ कृ॒पा। घृ॒तस्य॒ विभ्रा॑ष्टि॒मनु॑ वष्टि शो॒चिषा॒जुह्वा॑नस्य स॒र्पिषः॑
अग्नि को मैं पुजारी मानता हूँ, जो बहुत देता है और एक खज़ाना है। वो ताकत का बेटा है, जातवेदस कहते हैं उसे। अग्नि की आग ऊपर जाती है, वो देवताओं की कृपा से घी की चमक को पकड़ता है जब कोई हवन करता है।
Mantra 4
य॒ज्ञैः समि॑श्लाः॒ पृष॑तीभिरृ॒ष्टिभि॒र्यामं॑ छु॒भ्रासो॑ अ॒ञ्जिषु॑ प्रि॒या उ॒त। आ॒सद्या॑ ब॒र्हिर्भ॑रतस्य सूनवः पो॒त्रादा सोमं॑ पिबता दिवो नरः
यज्ञ के साथ, घोड़ों और भालों के साथ, चमकदार देवता यहाँ आएँ। भरत के आश्रम में बैठ के सोम पियो, जो आसमान से आए हैं। यह सब देवताओं के बेटे हैं।
Mantra 5
आ व॑क्षि दे॒वां इ॒ह वि॑प्र॒ यक्षि॑ चो॒शन् हो॑त॒र्नि ष॑दा॒ योनि॑षु त्रि॒षु। प्रति॑ वीहि॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॒ पिबाग्नी॑ध्रा॒त् तव॑ भा॒गस्य॑ तृष्णुहि
देवताओं को यहाँ बुलाओ और पूजा करो। तीन जगह बैठो। सोम का पानी पियो जो रखा है। अपना हिस्सा ले लो और प्यास बुझाओ।
Mantra 6
ए॒ष स्य ते॑ त॒न्वो नृम्ण॒वर्ध॑नः॒ सह॒ ओजः॑ प्र॒दिवि॑ बा॒ह्वोर्हि॒तः । तुभ्यं॑ सु॒तो म॑घवन् तुभ्य॒माभृ॑त॒स्त्वम॑स्य॒ ब्राह्म॑णा॒दा तृ॒पत् पि॑ब
यह मंत्र तुम्हारे लिए है, ताकि तुम्मे ताकत आए। भगवान की शक्ति आसमान में है, और तुम्हारे हाथों में भी। हे इंद्र, यह सोम रस तुम्हारे लिए निकाला है, तुम्हारे लिए लाया गया है। ब्रह्म के शब्द से खुश हो जाओ, पूरा पियो और तृप्त हो जाओ।
Mantra 7
यमु॒ पूर्वमहु॑वे॒ तमि॒दं हु॑वे॒ सेदु॒ हव्यो॑ द॒दिर्यो नाम॒ पत्य॑ते । अ॒ध्व॒र्युभिः॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॑ पो॒त्रात् सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑
जिसे मैं पहले बुला रहा था, उसे फिर से बुला रहा हूँ। वो हवा के लायक है, वो देता है, उसका नाम मालिक है। पंडित लोग सोम की दृष्टि रख के तैयार करते हैं। तू सोम पी, तू ही माल देने वाला है। सही समय पे पी।
For prosperity with stability—winning a secure dwelling and increasing wealth—while also repelling hostile forces, within a soma-offering framework to Indra.
Indra is the main recipient who grants wealth and victory when pleased by soma; Agni is praised as the Hotṛ/Jātavedas who carries ghee offerings and ensures the sacrifice succeeds.
It refers to wealth that grows and keeps expanding—prosperity that increases over time rather than being a one-time gain.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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