Adhyaya 175
Varaha PuranaAdhyaya 17528 Shlokas

Adhyaya 175: The Sanctity of the Kṛṣṇagaṅgā Pilgrimage-Ford and the Account of the Brahmin Vasu’s Daughter

Kṛṣṇagaṅgā-tīrtha-māhātmyaṃ tathā Vasu-brāhmaṇa-kanyā-vṛttāntaḥ

Tīrtha-māhātmya (Sacred Geography) with Social-Ethical Narrative

वराह पृथिवी को कृष्णगंगा और यमुना (कालिंदी) से जुड़े तीर्थ-समूह का माहात्म्य बताते हैं। नियमपूर्वक स्नान, स्मरण और विधिवत आचरण को पाप-शोधन का साधन कहा गया है। मथुरा-प्रदेश में व्यास का आश्रम ऋतु-विशेष पर विद्वान तपस्वियों का संगम-स्थल है, जहाँ श्रौत, स्मार्त और पुराण-परंपराओं के संशय सुलझाए जाते हैं। फिर कथा आती है—पाञ्चाल ब्राह्मण वसु अकाल में दक्षिण जाकर गृहस्थ बनता है; उसकी पुत्री ‘अर्धचंद्र’ समान स्थल पर अस्थि-विसर्जन से परलोक-पुण्य की बात सुनकर यात्रियों के साथ मथुरा जाती है। उसके सौंदर्य के कारण वह राजा के शिव-मंदिर में चल रहे निरंतर अनुष्ठान से जुड़े गणिका-परिवेश में खिंच जाती है, जिससे असुरक्षा, सामाजिक प्रभाव और तीर्थ-स्थानों के शासन-धर्म पर नैतिक प्रश्न उठते हैं।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

Kṛṣṇagaṅgā / Yamunā (Kālindī) as purifying riverine sacred geographyTīrtha-snānā (ritual bathing) and mental recollection (smaraṇa) as complementary practicesVyāsa as an authority mediating śrauta–smārta–purāṇa interpretive doubtsCāturmāsya observance and ascetic dietary restraints (pakṣāhāra, phalāhāra)Śiva as tīrthapati and the economy of merit linked to darśanaFamine-driven migration (durbhikṣa) and household precarityGendered vulnerability and social capture within a veshyā-network near ritual institutionsImplicit environmental ethic: rivers and tīrthas as regulated commons requiring disciplined use

Shlokas in Adhyaya 175

Verse 1

श्रीवराह उवाच ॥ शृणु चान्यद्वरारोहे कृष्णगङ्गासमुद्भवम् ॥ यमुनास्रोतसि स्नात्वा कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥

श्रीवराह बोले—हे वरारोहे, कृष्णगंगा की उत्पत्ति का और भी वृत्तांत सुनो। यमुना की धारा में स्नान करके मुनि कृष्णद्वैपायन (व्यास) ने…

Verse 2

ध्यात्वा मनसि गङ्गां तां कालिन्दीं पापहारिणीम् ॥ नित्यं च कर्म कुरुते तत्र तीर्थजलाप्लुतिम् ॥

मन में उस गंगा—अर्थात् पापहारिणी कालिंदी—का ध्यान करके, वह वहाँ नित्य कर्म करता है और तीर्थ-जल में स्नान/अवगाहन करता है।

Verse 3

सोमवैकुण्ठयोर्मध्ये कृष्णाङ्गेति कथ्यते ॥ यत्रातप्यत स व्यासो मथुरायां स्थितोऽमलः ॥

सोम और वैकुण्ठ के बीच ‘कृष्णांग’ नामक स्थान कहा जाता है। वहीं मथुरा में स्थित निर्मल व्यास ने तप किया।

Verse 4

तत्राश्रमपदं दिव्यं मुनिप्रवरसेवितम् ॥ आगच्छन्ति सदा तत्र चातुर्मास्यमुपासितुम् ॥

वहाँ एक दिव्य आश्रम-स्थान है, जिसकी सेवा श्रेष्ठ मुनि करते हैं। वे चातुर्मास्य-व्रत का अनुष्ठान करने हेतु सदा वहाँ आते हैं।

Verse 5

मुनयो वेदतत्त्वज्ञा ज्ञानिनः संहितव्रताः ॥ श्रौतस्मार्त्तपुराणेषु सन्देहो यस्य कस्यचित् ॥

वेद-तत्त्व के ज्ञाता, ज्ञानसम्पन्न और दृढ़-व्रती मुनि—श्रौत, स्मार्त और पुराण-परम्पराओं के विषय में जिनके मन में कोई संदेह उठता है, उसका निवारण करते हैं।

Verse 6

व्यासोऽपनodayāmāsa नानावाक्यैः सताङ्गतिः ॥

सज्जनों के संग रहने वाले व्यास ने अनेक वचनों द्वारा (उनका) संदेह दूर कर दिया।

Verse 7

कालञ्जरे महादेवं तत्र तीर्थपतिं शिवम् ॥ यस्य सन्दर्शनादेव कृष्णगङ्गाफलं भवेत् ॥

कालञ्जर में महादेव—वहाँ तीर्थपति शिव हैं; जिनके केवल दर्शन से ही कृष्णगङ्गा का फल प्राप्त होता है।

Verse 8

तत्र स्थितो द्वादशाब्दव्रती सङ्गविवर्जितः॥ पक्षाहारी च फलभुग्दर्शे वै पौर्णमासिके॥

वहाँ निवास करते हुए उसने बारह वर्ष का व्रत किया, सांसारिक संग से रहित। वह पखवाड़े में एक बार भोजन करता, फलाहार पर रहता, और अमावस्या तथा पूर्णिमा के अनुष्ठान करता था।

Verse 9

गत्वा हिमालयं चासौ बदरीमभितो गतः॥ व्यासश्चर्यापरस्तत्र ध्यानयोगपरायणः॥

वह हिमालय जाकर बदरी-प्रदेश के आसपास भी पहुँचा। वहाँ आचार-निष्ठ व्यास ध्यान-योग में पूर्णतः तत्पर था।

Verse 10

प्रत्यक्षं कृष्णतीर्थे तु पाञ्चाल्यकुलतन्तुना। पाञ्चाल्योऽथ द्विजः कश्चिन्नाम्ना वसुरिति श्रुतः॥

कृष्ण-तीर्थ में, पाञ्चाल वंश-परंपरा के प्रत्यक्ष संबंध में, पाञ्चाल देश का एक ब्राह्मण था, जो ‘वसु’ नाम से प्रसिद्ध था।

Verse 11

दुर्भिक्षपीडितोऽत्यन्तं सभार्यो दक्षिणां गतः॥ शिवनद्याः दक्षिणे तु कूले स वरपत्तने॥

भयंकर दुर्भिक्ष से अत्यन्त पीड़ित होकर वह पत्नी सहित दक्षिण दिशा को गया। शिवा नदी के दक्षिण तट पर वह वरपत्तन में बस गया।

Verse 12

निवासमकरोत्तत्र ब्राह्मणीं वृत्तिमाश्रितः॥ तत्रस्थस्य तदा पञ्च पुत्राः कन्याभवम्स्तदा॥

उसने वहीं निवास किया और ब्राह्मणोचित आजीविका अपनाई। वहाँ रहते हुए उस समय पाँच संतानें उत्पन्न हुईं—वे कन्याएँ थीं।

Verse 13

ब्राह्मणाय च दत्ता सा धनधान्यसमन्विता॥ स द्विजः कालसम्पन्नः सभार्यस्तत्र संस्थितः॥

और वह (कन्या) धन-धान्य से युक्त होकर एक ब्राह्मण को विवाह में दी गई। वह द्विज समयोचित परिपक्वता प्राप्त कर पत्नी सहित वहीं स्थिर होकर रहने लगा।

Verse 14

कन्याऽस्थीनि तु सङ्गृह्य मथुरामाजगाम ह॥ श्रुत्वा पुराणे पतितमर्धचन्द्रेऽस्थिपातनम्॥

कन्या की अस्थियाँ समेटकर वह मथुरा आया। उसने पुराण में अर्धचन्द्र तीर्थ पर अस्थि-विसर्जन का वर्णन सुना था।

Verse 15

नित्यं स्वर्गे वसति स यस्यास्थि ह्यर्धचन्द्रके॥ तीर्थयात्राप्रसङ्गेन लोकैः प्रचलिता बहिः॥

जिसकी अस्थियाँ अर्धचन्द्र तीर्थ में रखी जाती हैं, वह नित्य स्वर्ग में वास करता है—ऐसा कहा जाता है। तीर्थ-यात्राओं के प्रसंग से यह कथा लोगों में व्यापक रूप से फैल गई।

Verse 16

तेन सार्थेन सा कन्या मथुरायां जगाम च॥ कनिष्ठा भगिनी तेषां बालरण्डा बभूव ह॥

उस कारवाँ के साथ वह कन्या भी मथुरा गई। उनकी सबसे छोटी बहन अल्पवय में ही विधवा हो गई।

Verse 17

सुरूपा सुकुमाराङ्गी नीलकुञ्चितमूर्द्धजा॥ कदलीकाण्डसङ्काशे तस्या ऊरू सुमांसले॥

वह सुन्दर रूपवती, कोमल देहवाली और काले घुँघराले केशों वाली थी। उसके जाँघें सुगठित और मांसल थीं, जो केले के काण्ड के समान प्रतीत होती थीं।

Verse 18

सुश्लिष्टाङ्गुलिपादा तु नखास्ताम्रोज्ज्वलाः शुभाः ॥ गम्भीरा दक्षिणावर्त्ता नाभिस्त्रिवलिशोभिता ॥

उसकी उँगलियाँ और पाँव सुगठित थे; उसके नाखून शुभ थे और ताम्र-सी आभा से चमकते थे। उसकी नाभि गहरी, दक्षिणावर्त और तीन सुन्दर वलियों से शोभित थी।

Verse 19

सुनखी स्वक्षिणी सुभ्रूः सुप्रमाणा सुभाषिणी ॥ तेन तेनैव सम्पूर्णरूपेण च तिलोत्तमा ॥

उसके नख सुन्दर थे, नेत्र मनोहर थे और भौंहें रमणीय थीं; उसके अंग-प्रमाण उत्तम थे और वाणी मधुर थी। वह प्रत्येक प्रकार से पूर्णरूपा तिलोत्तमा के समान प्रतीत होती थी।

Verse 20

यं यं पश्यति चार्वङ्गी यस्तां चैव प्रपश्यति ॥ स स चित्र इव न्यस्तो विचेता जायते नरः ॥

सुन्दर अंगों वाली वह जिस-जिसको देखती है, और जो उसे देखता है—वह पुरुष मानो चित्र की भाँति जड़-सा रख दिया गया हो, ऐसा होकर विवेक-चेतना खो बैठता है।

Verse 21

एवंविधा तत्र तत्र तीर्थस्नानपरायणा ॥ दृष्टा वेश्यसमूहेन प्रागल्भ्येन तदा क्वचित् ॥

ऐसी रूपवती वह यहाँ-वहाँ तीर्थों में स्नान करने में तत्पर रहती थी। किसी समय उसे धृष्ट स्वभाव वाली वेश्याओं के समूह ने देख लिया।

Verse 22

कान्यकुब्जाधिपो राजा क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ॥ तस्य सत्रं सर्वकाले देवगर्त्तेश्वरे शिवे ॥

कान्यकुब्ज का अधिपति राजा क्षत्रिय-धर्म में स्थित था। उसके लिए देवगर्त्तेश्वर शिव के स्थान पर सर्वदा चलने वाला सत्र (यज्ञ-दान) होता था।

Verse 23

प्रवर्त्तते सुवित्ताढ्य प्रेक्षणीयं मनोरमम् ॥ वादित्राणि च गीतानि शक्रस्य भवने यथा ॥

वह यज्ञ-कार्य अत्यन्त वैभवयुक्त होकर चलता था—दर्शनीय और मनोहर। वहाँ वाद्य और गीत ऐसे होते थे मानो शक्र (इन्द्र) के भवन में हों।

Verse 24

तस्य देवस्य या वेश्यास्ताभिः सा प्रतिलोभिता ॥

उस देवालय-सम्बद्ध वेश्याओं ने उसे फुसलाकर आकर्षित कर लिया।

Verse 25

गीतनृत्यादिषु रता तासां धर्ममुपागता ॥ अल्पैस्तु दिवसैः साध्वी असाध्वीभिः परिवृता ॥

गीत-नृत्य आदि में आसक्त होकर उसने उनका आचार अपना लिया। थोड़े ही दिनों में वह साध्वी स्त्री असाध्वी स्त्रियों से घिर गई।

Verse 26

एवं वसति सा बाला देवस्यास्य परिग्रहा ॥ यथासुखं समेताभिर्विहरन्ती दिने दिने ॥

इस प्रकार वह युवती उस देवालय-सम्बद्ध परिग्रह में रहती हुई, उन संगिनियों के साथ दिन-प्रतिदिन अपनी इच्छा से सुखपूर्वक विहार करती रही।

Verse 27

त्रिकालदर्शी शुद्धात्मा सिद्धत्वं प्राप्नुयात्प्रभुः॥ तस्याश्रमपदस्थस्य यद्दृष्टं ज्ञानचक्षुषा ॥

त्रिकालदर्शी शुद्धात्मा प्रभु सिद्धत्व को प्राप्त होता है। आश्रम में स्थित उस महात्मा ने ज्ञान-चक्षु से जो देखा, वही आगे कहा जाता है।

Verse 28

क्षामोदरी समकुक्षिः पीनोन्नतपयोधरा ॥ कम्बुग्रीवा संवृतास्या सुदती स्वधराहनुः

उसकी कटि क्षीण थी, उदर सम था और स्तन पूर्ण व उन्नत थे। उसकी ग्रीवा शंख-सी, मुख सुगठित, दन्त सुन्दर और हनु दृढ़ थी।

Frequently Asked Questions

The chapter frames tīrtha practice as requiring disciplined conduct—ritual bathing, mental recollection, and regulated vows—while also implying a social ethic: sacred institutions and pilgrimage settings can become sites of moral risk, especially for the vulnerable, when pleasure economies (e.g., courtesan networks) intersect with ritual patronage. The text thus juxtaposes ascetic regulation with a cautionary social narrative.

Cāturmāsya (the four-month observance) is explicitly mentioned as a recurring period when ascetics gather. The narrative also notes lunar timing: darśa and paurṇamāsī (new-moon and full-moon observances) in connection with regulated intake (phalāhāra) and periodic practice.

Although not couched in explicit ecological theory, the text treats rivers (Yamunā/Kālindī, Kṛṣṇagaṅgā) and tīrthas as shared terrestrial resources whose benefits depend on disciplined, repeatable practices (snāna, smaraṇa, vrata). This implicitly promotes a stewardship model: sacred waters function as regulated commons, sustained through norms of restraint and seasonal observance rather than indiscriminate use.

Kṛṣṇadvaipāyana Vyāsa is central as an authoritative sage associated with Mathurā, Himālaya, and Badarī. A Brahmin identified as Pāñcālya (from Pāñcāla lineage/region) named Vasu appears in the social narrative. A ruler titled the king of Kānyakubja is also referenced, linked to an ongoing satra at Devagartteśvara (Śiva).