Rig Veda Sukta 47
Mandala 7Sukta 474 Mantras

Sukta 47

Sukta 7.47

Rishi

Vasiṣṭha

Devata

Āpaḥ (Waters)

Chandas

Triṣṭubh

वसिष्ठ का यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ सूक्त आपः (जल/नदियों) की स्तुति करता है—उन्हें दिव्य शुद्धिकर्ता बताता है, जिनकी प्रथम मधुर तरंग इन्द्र के लिए तथा मनुष्यों के अर्पण हेतु उपयुक्त बनती है। सूक्त जलों से प्रार्थना करता है कि वे देवताओं के पथ और इन्द्र की विधियों के अनुरूप सामंजस्य से प्रवाहित हों, और उपासकों को व्यापक अवकाश (वरिवस्) तथा स्थायी कल्याण (स्वस्ति) प्रदान करें।

Mantras

Mantra 1

आपो यं वः प्रथमं देवयन्त इन्द्रपानमूर्मिमकृण्वतेळः । तं वो वयं शुचिमरिप्रमद्य घृतप्रुषं मधुमन्तं वनेम ॥

हे आपः! तुम्हारी वह प्रथम ऊर्मि (तरंग), जिसे देव-यन्त जनों ने इन्द्र के पान के रूप में रचा—उसी को हम आज प्राप्त करें: जो शुचि है, अरि-प्रमद्य (दूषणरहित) है, घृत-प्रुष (घृत-सा झरने वाली) है, और मधुमन्त (मधुर रस से परिपूर्ण) है—हम उसे अपने अन्तर्यज्ञ हेतु वरण करें।

Mantra 2

तमूर्मिमापो मधुमत्तमं वोऽपां नपादवत्वाशुहेमा । यस्मिन्निन्द्रो वसुभिर्मादयाते तमश्याम देवयन्तो वो अद्य ॥

हे आपः! अपां नपात्—स्वर्णमय वेग से शीघ्र गमन करने वाला—तुम्हारी उस ऊर्मि की रक्षा करे, जो मधुमत्तम (अत्यन्त मधुर) है। जिसमें इन्द्र वसुओं के साथ मद करता है—उसको, देवयन्त हम, तुम्हारे द्वारा आज प्राप्त करें।

Mantra 3

शतपवित्राः स्वधया मदन्तीर्देवीर्देवानामपि यन्ति पाथः । ता इन्द्रस्य न मिनन्ति व्रतानि सिन्धुभ्यो हव्यं घृतवज्जुहोत ॥

शत-पवित्रा (सौ-सौ धाराओं से पवित्र करने वाली) देवियाँ, स्वधया (अपने स्वाभाविक बल) से मदन्ती, देवों के पथ पर चलती हैं। वे इन्द्र के व्रतों (नियमों/ऋत-व्यवस्था) का उल्लंघन नहीं करतीं। सिन्धुओं (नदियों) को घृतवत् (घृत-समृद्ध) हवि अर्पित करो।

Mantra 4

याः सूर्यो रश्मिभिराततान याभ्य इन्द्रो अरदद्गातुमूर्मिम् । ते सिन्धवो वरिवो धातना नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

हे आपः—जिन्हें सूर्य ने अपनी किरणों से फैलाया है, और जिनके द्वारा इन्द्र ने मार्ग और ऊर्मि (तरंग) को काटकर बनाया—हे सिन्धवो (नदियो), हमारे लिए विस्तृत अवकाश/स्वतंत्र स्थान धारण करो। तुम अपनी स्वस्तियों से सदा हमारी रक्षा करो।

Frequently Asked Questions

The main deities are the Āpaḥ—the divine Waters, also addressed as Sindhavaḥ (rivers). Sūrya and Indra appear as cosmic powers who guide and shape their flow.

It asks the waters to purify the worshipper, to grant “wide free space” (varivas—freedom from constraint), and to protect continuously with well-being (svasti).

These images express clarity, purity, and delight: the waters are envisioned as luminous and nourishing, fit to carry offerings and to refresh the inner life of the seeker.

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