Rig Veda Sukta 47
Mandala 6Sukta 4731 Mantras

Sukta 47

Sukta 6.47

Rishi

Bharadvāja Bārhaspatya (traditional for RV 6.47)

Devata

Indra (with Soma as empowering medium)

Chandas

Triṣṭubh

भरद्वाज का यह त्रिष्टुभ सूक्त सोम से सशक्त हुए अजेय योद्धा इन्द्र की स्तुति करता है—जो अंतः और बाह्य दोनों संग्रामों में विजयी है। यह पिष्ट सोम की मधुरता और प्रबल शक्ति से आरम्भ होकर मनुष्य-गणों के बीच इन्द्र के उमड़ते पराक्रम का वर्णन करता है, और अंत में रथ-प्रेरित युद्ध में रक्षा, संगठित बल तथा विजय के लिए प्रार्थनाओं पर समाप्त होता है।

Mantras

Mantra 1

स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम् । उतो न्वस्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु ॥

यह निश्चय ही मधुर है, यह मधु-परिपूर्ण है; यह निश्चय ही तीव्र है, यह रस-सम्पन्न है। और अब, जब इन्द्र ने इसका पान कर लिया, तब संग्रामों के भीतर किसी भी युद्ध में कोई भी उसे सह नहीं सकता।

Mantra 2

अयं स्वादुरिह मदिष्ठ आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद । पुरूणि यश्च्यौत्ना शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्यो हन् ॥

यह यहाँ मधुर है, अत्यन्त मदकारी है; इसी में इन्द्र वृत्र-वध के लिए उल्लसित होता है। जिसने शम्बर के अनेक दृढ़ दुर्गों को चूर किया, जिसने निन्यानवे को भी गिरा दिया—वही इस बल में आनन्द लेता है।

Mantra 3

अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः । अयं षळुर्वीरमिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे ॥

यह, मेरे द्वारा पिया हुआ, मेरी वाणी को उन्नत करता है; यह अभिलाषी मनोभाव को जाग्रत करता है। यह—धीर वीर-बल—छः विस्तीर्ण प्रदेशों को नापकर ठहराता है; जिनके परे कोई भी लोक कदापि स्थित नहीं।

Mantra 4

अयं स यो वरिमाणं पृथिव्या वर्ष्माणं दिवो अकृणोदयं सः । अयं पीयूषं तिसृषु प्रवत्सु सोमो दाधारोर्वन्तरिक्षम् ॥

यह वही है जिसने पृथ्वी की विशालता और द्यौ (स्वर्ग) की ऊँची ऊँचाई रची। यही सोम तीन प्रवाहों/अवतरणों में पीयूष (अमृत) को धारण करता है और विस्तृत अन्तरिक्ष को संभाले रखता है।

Mantra 5

अयं विदच्चित्रदृशीकमर्णः शुक्रसद्मनामुषसामनीके । अयं महान्महता स्कम्भनेनोद्द्यामस्तभ्नाद्वृषभो मरुत्वान् ॥

इसी ने अनेक दर्शनों वाला वह प्रवाह/बाढ़ खोज निकाला—उषाओं के मुख में, उज्ज्वल सदन में। यही महान, महा-स्कम्भन (मजबूत स्तम्भ-बल) से, मरुतों के सहित वृषभ (बैल-स्वरूप) होकर, ऊपर द्यौ को थामे रहा।

Mantra 6

धृषत्पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम् । माध्यंदिने सवन आ वृषस्व रयिस्थानो रयिमस्मासु धेहि ॥

हे इन्द्र, वृत्रहा, वसुओं के लिए संग्राम में शूर—कलश में सोम को धृष्टता से पी। मध्यान्ह-सवन में अपने बल से परिपूर्ण हो; हे रयि-स्थान (समृद्धि-आसन), वह रयि/समृद्धि हमारे भीतर स्थापित कर।

Mantra 7

इन्द्र प्र णः पुरएतेव पश्य प्र नो नय प्रतरं वस्यो अच्छ । भवा सुपारो अतिपारयो नो भवा सुनीतिरुत वामनीतिः ॥

हे इन्द्र! हमारे लिए अग्रणी-नेता की भाँति आगे देखकर मार्ग दिखाओ; हमें प्रातःकाल के श्रेष्ठ, अधिक प्रकाशमान कल्याण की ओर ले चलो। हमारे लिए सु-पार (सुगम पार कराने वाले) बनो, हमें अति-पार कराओ; हमारे लिए सुनीति (सम्यक् मार्गदर्शन) बनो और वामनीति (अनुग्रहपूर्ण, प्रिय मार्गदर्शन) भी बनो।

Mantra 8

उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्वर्वज्ज्योतिरभयं स्वस्ति । ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप स्थेयाम शरणा बृहन्ता ॥

हे विद्वान्! हमें विस्तृत लोक में ले चलो—स्वर्युक्त (सूर्य-सम्बद्ध) ज्योति में, अभय में और स्वस्ति में। हे इन्द्र, स्थविर! तेरे दोनों ऊँचे, महान् बाहुओं के नीचे हम विशाल शरण के समान आश्रय लेकर स्थित हों।

Mantra 9

वरिष्ठे न इन्द्र वन्धुरे धा वहिष्ठयोः शतावन्नश्वयोरा । इषमा वक्षीषां वर्षिष्ठां मा नस्तारीन्मघवन्रायो अर्यः ॥

हे इन्द्र! हमें वरिष्ठ वन्धुर (रथ-आसन) में स्थापित कर; हे शतावन्! दो श्रेष्ठ अश्वों के साथ। हमारे लिए इषम्—बल की अत्यन्त वर्षिष्ठ (अतिप्रचुर) पोषण-सम्पदा—ले आ; हे मघवन्! असत्य का पराया (अ-आर्य) हमारी रयि (समृद्धि) को न हर ले।

Mantra 10

इन्द्र मृळ मह्यं जीवातुमिच्छ चोदय धियमयसो न धाराम् । यत्किं चाहं त्वायुरिदं वदामि तज्जुषस्व कृधि मा देववन्तम् ॥

हे इन्द्र, मुझ पर कृपा कर; मेरे लिए जीवन-शक्ति की इच्छा कर। मेरी बुद्धि को ऐसे प्रेरित कर जैसे अयस (लोहे) को भेदती हुई धारा। जो कुछ मैं, तेरे भीतर स्थित आयु (प्राण-बल) के रूप में, यहाँ कहता हूँ—उसे स्वीकार कर; और मुझे देव-सम्पन्न कर दे।

Mantra 11

त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम् । ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रं स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः ॥

उद्धारकर्ता इन्द्र, रक्षक इन्द्र—हर-हर आह्वान पर मैं उस सुहव, शूर इन्द्र को पुकारता हूँ। मैं शक्र, पुरुहूत इन्द्र का आह्वान करता हूँ; मघवा इन्द्र हमारे भीतर स्वस्ति स्थापित करे।

Mantra 12

इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः । बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम ॥

इन्द्र—सुत्रामा, स्ववान—अपने सहायों से सर्वथा सुमृळीक, विश्ववेदाः हो। वह द्वेष को बाधे, अभय करे; और हम सुवीर्य के स्वामी बनें।

Mantra 13

तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम । स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद्द्वेषः सनुतर्युयोतु ॥

उस यज्ञार्ह (पूज्य) देव की सुमति में हम स्थित हों—हाँ, कल्याणकारी सौमनस्य (प्रसन्न-चित्तता) में रहें। वह सुत्रामा, स्ववान् इन्द्र, हमारे लिए दूर ही से—अत्यन्त दूर—द्वेष को हटाकर परे कर दे।

Mantra 14

अव त्वे इन्द्र प्रवतो नोर्मिर्गिरो ब्रह्माणि नियुतो धवन्ते । उरू न राधः सवना पुरूण्यपो गा वज्रिन्युवसे समिन्दून् ॥

हे इन्द्र, तेरी ओर हमारी गिरः और ब्रह्माणि—मानो ढलान से उतरती लहर—वेग से दौड़ते हैं; नियुत (रथ-युग) भी धावते हैं। तेरा दान उरु है; सवन अनेक हैं; हे वज्रिन्, तेरे युव-बल के लिए आपः, गाः (किरणें/गौएँ) और सोम-बिन्दु एकत्र किए जाते हैं।

Mantra 15

क ईं स्तवत्कः पृणात्को यजाते यदुग्रमिन्मघवा विश्वहावेत् । पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः ॥

कौन उसे यथार्थ स्तुति कर सकता है, कौन उसे तृप्त कर सकता है, कौन उसे यजन कर सकता है—जब वह उग्र शक्ति को सर्वथा जानने वाला मगवान् है? मानो दो पाँवों से एक के बाद एक प्रहार करता हुआ, वह अपनी शचीभिः (कौशल-शक्तियों) से पूर्व को अपर और अपर को पूर्व कर देता है।

Mantra 16

शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः । एधमानद्विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान् ॥

वीर इन्द्र का उग्र-से-उग्र रूप सुनाई देता है—वह दमन करता हुआ, एक-एक को परे ढकेलता हुआ आगे बढ़ता है। बढ़ता हुआ, विभाजितों से द्वेष रखने वाला, दोनों पक्षों का राजा—इन्द्र मनुष्यों की विशः (जन-समुदायों) को चलने और प्रयत्न करने को प्रेरित करता है।

Mantra 17

परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति । अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्वीरिन्द्रः शरदस्तर्तरीति ॥

वह पूर्वजों की मित्रताओं को परे कर देता है; वेग से आगे बढ़ता हुआ वह उत्तरवर्तियों के साथ चलता है। जो वास्तव में अनुभूत नहीं, उसे झटककर दूर करता हुआ—इन्द्र बार-बार अतीत की अनेक शरदों (ऋतु-वर्षों) को लाँघ जाता है।

Mantra 18

रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश ॥

रूप-पर-रूप वह प्रतिरूप बनता गया; वही उसका रूप है—हमारे प्रतिचक्षण (दर्शन) के लिए। इन्द्र मायाभिः (रूप-रचना की शक्तियों) से, बहुरूप होकर चलता है; उसके रथ में युक्त हैं निश्चय ही उसके हरयः (ताम्रवर्ण अश्व)—एक सौ दस।

Mantra 19

युजानो हरिता रथे भूरि त्वष्टेह राजति । को विश्वाहा द्विषतः पक्ष आसत उतासीनेषु सूरिषु ॥

रथ में हरित (ताम्र) अश्वों को जोतकर यहाँ वह बहु-रूप गढ़ने वाला त्वष्टा तेजस्वी होता है। कौन कभी द्वेषियों का पक्ष/आश्रय बन सकता है—यहाँ तक कि आसनस्थ सूरियों (अधिपतियों) के बीच भी?

Mantra 20

अगव्यूति क्षेत्रमागन्म देवा उर्वी सती भूमिरंहूरणाभूत् । बृहस्पते प्र चिकित्सा गविष्टावित्था सते जरित्र इन्द्र पन्थाम् ॥

हे देवो, हम अगव्यूति-क्षेत्र में आए हैं—गवेषणा (प्रकाश-गवों) का यह क्षेत्र; पृथ्वी सचमुच विशाल है और वह क्लेशरहित हो जाती है। हे बृहस्पते, गविष्टि (गवों/किरणों की खोज) में ज्ञान को स्पष्ट करो; और हे इन्द्र, जरीत्र (स्तुतिकर्ता) के लिए सत्य और विजयी पथ स्थापित करो।

Mantra 21

दिवेदिवे सदृशीरन्यमर्धं कृष्णा असेधदप सद्मनो जाः । अहन्दासा वृषभो वस्नयन्तोदव्रजे वर्चिनं शम्बरं च ॥

दिन-प्रतिदिन, जो कृष्ण अन्धकार दूसरे अर्ध को जकड़े था, वह जन्म-गृह से दूर धकेल दिया गया। वृषभ-शक्ति ने दासों का वध किया; वस्न (समृद्धि) की खोज में उसने वर्चिन् और शम्बर को भी उनके दुर्ग/व्रज से बाहर कर दिया।

Mantra 22

प्रस्तोक इन्नु राधसस्त इन्द्र दश कोशयीर्दश वाजिनोऽदात् । दिवोदासादतिथिग्वस्य राधः शाम्बरं वसु प्रत्यग्रभीष्म ॥

हे इन्द्र! तेरे राधस् (दान-वैभव) का तो मानो एक छोटा-सा अंश ही—तथापि तूने दस कोश (धन-पेटियाँ) और दस वाजिन् (वेगवान्) अश्व दिये। दिवोदास से, अतिथिग्व से, हमने शाम्बर-वसु (शाम्बर का धन) प्राप्त किया—विजय के प्रत्युत्तर में मिलने वाली वे बल-सम्पदाएँ।

Mantra 23

दशाश्वान्दश कोशान्दश वस्त्राधिभोजना । दशो हिरण्यपिण्डान्दिवोदासादसानिषम् ॥

दस अश्व, दस कोश, दस वस्त्र—और उनके साथ भोग्य-आहार/उपभोग के साधन; तथा दस हिरण्य-पिण्ड—ये सब हमने दिवोदास से जीते/पाए।

Mantra 24

दश रथान्प्रष्टिमतः शतं गा अथर्वभ्यः । अश्वथः पायवेऽदात् ॥

दस रथ—प्रष्टिमत् (सुसज्जित/उत्तम उपकरणों वाले), और अथर्वणों के लिए सौ गौएँ (किरण-रूप गाएँ)। अश्वथ ने पायू को ये दिये।

Mantra 25

महि राधो विश्वजन्यं दधानान्भरद्वाजान्त्सार्ञ्जयो अभ्ययष्ट ॥

महान्, समस्त जनों के लिए कल्याणकारी राधस् (दान/समृद्धि) धारण करते हुए, सार्ञ्जय ने भरद्वाजों के सम्मान में यज्ञ किया।

Mantra 26

वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः । गोभिः संनद्धो असि वीळयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि ॥

हे वनस्पते! दृढ़-अङ्ग वाला हो; हमारे सखा बन, अग्र-तर (विजय-प्रद) और सुवीर (वीरों से सम्पन्न) हो। गोभिः (किरणों/गवों) से सन्नद्ध होकर दृढ़ खड़ा रह; तेरा सारथि जय पाए, और तेरी जीतें विजयी हों।

Mantra 27

दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः । अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज ॥

हविषा से इन्द्र के वज्ररूप रथ का यजन कर: जिसका बल द्यावा-पृथिवी से परि-उद्भृत है, जिसका सहस् वनस्पतियों से परि-आभृत है; जो अपाम् ओज्मान से परितः आवृत है और गोभिः (किरणों/गवों) से आच्छादित है।

Mantra 28

इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः । सेमां नो हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय ॥

यह इन्द्र का वज्र है, मरुतों का अग्रभाग; मित्र का गर्भ, वरुण की नाभि। हे दिव्य रथ! हमारी हवि-दान को स्वीकार करते हुए, हमारे हव्य ग्रहण कर—यज्ञ-दान को अनुग्रहपूर्वक स्वीकार कर और उसे यथाविधि प्रतिष्ठित कर।

Mantra 29

उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत् । स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून् ॥

पृथ्वी और द्यौ पर श्वास भर; अनेक स्थानों में विस्तृत मनुष्यों का जगत् तेरे द्वारा धैर्य पाए। हे दुन्दुभि! इन्द्र और देवों के साथ संयुक्त होकर, शत्रुओं को दूर—और भी दूर—हटा; हमारे क्षेत्र से वैरियों को अपसारित कर।

Mantra 30

आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि दुरिता बाधमानः । अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व ॥

हे संग्राम-दुन्दुभि! गर्जना कर और हमारे भीतर बल तथा ओज धारण करा। दुर्नीतियों को बाधित करते हुए गड़गड़ा—दुरित को दूर कर। हे दुन्दुभि! यहाँ से शत्रुजन्य दुच्छुना को प्रहार कर हटाकर दे; क्योंकि तू इन्द्र की मुट्ठी है—आगे बढ़, विजय पा।

Mantra 31

आमूरज प्रत्यावर्तयेमाः केतुमद्दुन्दुभिर्वावदीति । समश्वपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु ॥

उन दूरस्थ शत्रु-बलों को पीछे हटा दो; केतु-चिह्नयुक्त दुन्दुभि (रण-नगाड़ा) गूँज उठे। हमारे नर अश्व-पक्ष-सी तीव्र गति के साथ संगठित होकर चलें; हे इन्द्र, हमारे रथी योद्धा जय पावें।

Frequently Asked Questions

It teaches that Indra, strengthened by Soma, becomes irresistible and can protect the community—helping them overcome enemies, obstacles, and inner weakness through united effort.

Soma is presented as the power that intensifies Indra’s strength; ritually, the Soma offering is the means by which worshippers invoke Indra’s victorious energy.

No. While it uses martial imagery (drum, banner, chariots), it also points to ‘inner battles’—the struggle against fear, division, and resistance within oneself and within society.

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