
Sukta 6.13
Bharadvāja Bārhaspatya (traditional for 6.13)
Agni
Triṣṭubh
यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें उस स्रोत के रूप में, जिनसे समस्त कल्याणकारी शक्तियाँ—समृद्धि, विजय, वर्षा और जलों का सुव्यवस्थित प्रवाह—चारों ओर प्रस्फुटित होते हैं। यह प्रतिपादित करता है कि जो मर्त्य वेदी पर स्तोत्र और यज्ञ द्वारा अग्नि तक पहुँचता है, उसे सफलता के लिए प्रत्येक “द्वार/अवसर” (वारा) प्राप्त होता है—अन्न, धन और गृहस्थ-समृद्धि की स्थिरता सहित। अंत में सूक्त संतान, वंश-परंपरा की निरंतरता, और सुयोजित स्तुति से प्राप्त होने वाली “पूर्ति” (पूर्णता/सिद्धि) की प्रत्यक्ष याचना करता है।
Mantra 1
त्वद्विश्वा सुभग सौभगान्यग्ने वि यन्ति वनिनो न वयाः । श्रुष्टी रयिर्वाजो वृत्रतूर्ये दिवो वृष्टिरीड्यो रीतिरपाम् ॥
हे सौभाग्यशाली अग्नि! तुझसे ही सब सौभाग्य-सम्पदाएँ वन से पक्षियों की भाँति फैल जाती हैं। श्रुष्टि (आज्ञापालन/श्रवण), रयि (समृद्धि), वाज (बल-पूर्णता) वृत्र-तूर्य (आवरणकर्ता से संग्राम) में; द्यौः की वृष्टि, इड्य (पूज्य) और अपाम् की रीति (जल-प्रवाह का नियम)—ये तेरे ही प्रस्रव हैं।
Mantra 2
त्वं भगो न आ हि रत्नमिषे परिज्मेव क्षयसि दस्मवर्चाः । अग्ने मित्रो न बृहत ऋतस्यासि क्षत्ता वामस्य देव भूरेः ॥
तू हमारे लिए भग के समान है—रस/इषा के लिए रत्न-धन लाने वाला; सर्वत्र विचरने वाले की भाँति तू निवास करता और शासन करता है, हे अद्भुत-दीप्तिमान! हे अग्नि! मित्र के समान तू ऋत का विशाल रक्षक है; हे देव! तू वाम (वांछित) का क्षत्ता—वितरक/व्यवस्थापक है, बहु-समृद्धि के साथ।
Mantra 3
स सत्पतिः शवसा हन्ति वृत्रमग्ने विप्रो वि पणेर्भर्ति वाजम् । यं त्वं प्रचेत ऋतजात राया सजोषा नप्त्रापां हिनोषि ॥
वह सत्य का स्वामी, अपने बल से वृत्र (आवरणकर्ता) का वध करता है। हे अग्नि, प्रेरित विप्र (ऋषि) पणे (व्यापारी/लोभी) से वाज (बल-समृद्धि) को छीन लेता है। जिसे तुम, हे प्रचेत (पूर्वज्ञ), ऋतजात (ऋत से उत्पन्न), अपने राया (समृद्धियों) से—अपां नप्तृ (जल-अप्सराओं/जल के पुत्र) के साथ एकरस होकर—प्रेरित करते हो, उसी को तुम आगे बढ़ाते हो।
Mantra 4
यस्ते सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैर्यज्ञैर्मर्तो निशितिं वेद्यानट् । विश्वं स देव प्रति वारमग्ने धत्ते धान्यं पत्यते वसव्यैः ॥
हे सहसः सूनो (बल के पुत्र), जो मर्त्य स्तोत्रों, उक्थों और यज्ञों से वेदी पर तुम्हारी तीक्ष्ण धार तक पहुँचता है—वह, हे देव, प्रत्येक वरण (वांछित द्वार/अवसर) को प्राप्त करता है। वह धान्य (पूर्णता का अन्न) को धारण करता है और वसव्यैः (वसुओं-समृद्धियों) का स्वामी बनता है।
Mantra 5
ता नृभ्य आ सौश्रवसा सुवीराग्ने सूनो सहसः पुष्यसे धाः । कृणोषि यच्छवसा भूरि पश्वो वयो वृकायारये जसुरये ॥
वे वर—सुश्रवसा (सत्कीर्ति) और सुवीर (वीर्य-सम्पन्नता)—मनुष्यों के लिए ले आओ, हे अग्नि, सहसः सूनो; जिन्हें तुम पोषित करते हो और हमारे भीतर स्थापित करते हो। क्योंकि अपने बल से तुम पशुओं के झुंडों को और वयः (पंखयुक्त शक्तियों/पक्षियों) को बहुत बढ़ा देते हो; और उन्हें वृक (भेड़िया) तथा अरि (शत्रु) से परे, जसुर (प्रकाश-भक्षक) से भी परे प्रदान करते हो।
Mantra 6
वद्मा सूनो सहसो नो विहाया अग्ने तोकं तनयं वाजि नो दाः । विश्वाभिर्गीर्भिरभि पूर्तिमश्यां मदेम शतहिमाः सुवीराः ॥
हे सहस के पुत्र, व्यापक विहार करने वाले अग्नि! हम तुम्हारा स्तवन करें। हे बल-समृद्धि के दाता, हमें संतान और वंश-वृद्धि प्रदान करो। हमारी समस्त स्तुतिगीतियों से हम पूर्णता को प्राप्त करें; हम सौ-गुणित तेज-प्रेरणाओं वाले, सु-वीर (वीर-संपन्न) होकर आनन्दित हों।
It teaches that Agni is the living source of auspicious powers—prosperity, victory over obstacles, rain, and right order—and that sincere worship at the altar opens the way to success and wellbeing.
It highlights Agni’s vigorous, effective power: he is the sharp force in ritual and life that can overcome resistance and make offerings—and human intentions—bear fruit.
It asks for “openings” to desired outcomes, grain/food and wealth, and especially for child (toka), continuing lineage (tanaya), and overall fulfilment (pūrti).
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