
Sukta 1.120
Kakṣīvān Dairghatamasa (traditional for RV 1.120)
Aśvinau
Anuṣṭubh-like/short metre (requires śākhā verification; commonly RV 1.120 uses shorter metres than the preceding triṣṭubhs)
यह सूक्त अश्विन जुड़वाँ देवताओं का सीधा और खोजी आह्वान है—यह पूछता है कि कौन-सा अर्पण और कैसी अंतः-तत्परता उन्हें वास्तव में प्रिय होती है और उनकी सहायता को आकर्षित करती है। इसमें उनकी स्तुति ऐसे उद्धारकों के रूप में की गई है जो प्राणियों को संकुचन और संकट से बाहर खींच लाते हैं; और उनसे ऐसी रक्षा तथा जागरण-शक्ति की याचना की गई है जिससे आलस्य, हानि और केवल आत्मतुष्ट भोग-विलास पर विजय पाई जाए।
Mantra 1
का राधद्धोत्राश्विना वां को वां जोष उभयोः । कथा विधात्यप्रचेताः ॥
हे अश्विनौ! कौन-सा यज्ञ-बल (राधस्) तुम्हें प्राप्त कर सकेगा? हमारा कौन-सा प्रीतिभाव (जोष) तुम दोनों को तृप्त करेगा? जो अभी अप्रबुद्ध, अचेत है, वह तुम्हारे लिए अंतःयज्ञ की उचित विधि-व्यवस्था कैसे करे?
Mantra 2
विद्वांसाविद्दुरः पृच्छेदविद्वानित्थापरो अचेताः । नू चिन्नु मर्ते अक्रौ ॥
जो नहीं जानता, वह उस द्वार के विषय में पूछता है जिसे ज्ञानी जानते हैं; इस प्रकार दूसरा, अचेत, भटक जाता है। और अब भी, मर्त्य में वे दोनों (शक्तियाँ) पकड़ी नहीं जातीं।
Mantra 3
ता विद्वांसा हवामहे वां ता नो विद्वांसा मन्म वोचेतमद्य । प्रार्चद्दयमानो युवाकुः ॥
उन दोनों विद्वान् (अश्विनों) को हम पुकारते हैं; वे दोनों विद्वान् आज हमें प्रेरित वाणी (मन्म) कहें। तुम्हारी दया की कामना करता हुआ युवा साधक स्तुति-गान उच्चारित करे।
Mantra 4
वि पृच्छामि पाक्या न देवान्वषट्कृतस्याद्भुतस्य दस्रा । पातं च सह्यसो युवं च रभ्यसो नः ॥
मैं तुमसे स्पष्ट पूछता हूँ—अज्ञानवश देवों से प्रश्न करनेवाले की भाँति नहीं। हे दस्रा, वषट्कार से अभिषिक्त उस अद्भुत आह्वान में प्रकट होनेवाले! जो सहना पड़े उसमें तुम दोनों हमारे रक्षक बनो, और जो झपटकर ग्रहण करना हो उसमें हमारे लिए शीघ्र सहायक बनो।
Mantra 5
प्र या घोषे भृगवाणे न शोभे यया वाचा यजति पज्रियो वाम् । प्रैषयुर्न विद्वान् ॥
जो वाणी-उच्चार भृगु-अग्नि की भाँति घोष में चमक उठता है—उसी वाणी से पज्रिय तुम्हारा यजन करता है। पर वह तो मानो बिना जाने ही प्रेरित करता हुआ है—जब तक तुम उसके भीतर वचन को प्रकाशमान न कर दो।
Mantra 6
श्रुतं गायत्रं तकवानस्याहं चिद्धि रिरेभाश्विना वाम् । आक्षी शुभस्पती दन् ॥
मैंने तकवान का गायत्री-छन्द सुना है; और मैं, गायक, तुम अश्विनों को पुकारता हूँ। आओ—हे शुभ के स्वामी, दो उज्ज्वल नेत्र प्रदान करो।
Mantra 7
युवं ह्यास्तं महो रन्युवं वा यन्निरततंसतम् । ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं नो वृकादघायोः ॥
तुम दोनों ही महत् (विस्तीर्ण) के आनन्द हो; तुम दोनों ही वे हो जो हमें संकुचन से बाहर निकालते हो। हे वसु (उदार दाता) देवो, हमारे लिए सु-गोपा (सद्-रक्षक) बनो; हमें भेड़िये से और अहित-कर्ता से बचाओ।
Mantra 8
मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो माकुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः । स्तनाभुजो अशिश्वीः ॥
हमें किसी शत्रु-भावी के हाथ न सौंपो; हमारे घरों से हमारी पोषण-शक्तियाँ कहीं न चली जाएँ—वे दुग्ध-दात्री धेनुएँ, जो स्तन से पीने वालों को पोषित करती हैं, जो कभी न चूकतीं।
Mantra 9
दुहीयन्मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै । इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै ॥
मित्र-धिति (मित्र की स्थापन-शक्ति/आधार) के लिए दुहते हुए, हे तुम दोनों, हमारे लिए रयि (समृद्धि) को वाजवती (बल-सम्पन्न) रूप में नापकर दो। और हमारे लिए इष (प्रेरित-आकांक्षा/पोषक शक्ति) भी नापकर दो—धेनुमती (प्रकाश-धेनु से युक्त) रूप में।
Mantra 10
अश्विनोरसनं रथमनश्वं वाजिनीवतोः । तेनाहं भूरि चाकन ॥
अश्विनों का रथ सहज-प्रवृत्त है—और फिर भी विजयी वेग से परिपूर्ण। उसी के द्वारा मैंने बहुत-सा ऐश्वर्य और तृप्ति प्राप्त की।
Mantra 11
अयं समह मा तनूह्याते जनाँ अनु । सोमपेयं सुखो रथः ॥
यह रथ, मेरे देह सहित मुझे धारण करके, जनों के पीछे-पीछे ले चलता है; सोमपान के लिए यह सुख-गामी वाहन है।
Mantra 12
अध स्वप्नस्य निर्विदेऽभुञ्जतश्च रेवतः । उभा ता बस्रि नश्यतः ॥
तब निद्रा की क्लान्ति से, और केवल धन-भोग के आस्वाद से—वे दोनों (बाधाएँ) दूर हो जाती हैं; हे बस्रि, दोनों ही विलीन हो जाती हैं।
The Aśvins are twin deities known as swift horsemen and divine physicians. They are praised for rescuing people from danger and bringing help at dawn.
The hymn asks what kind of offering and inner readiness truly pleases the Aśvins, and it prays for their protection—especially to be drawn out of constriction and kept safe from harm.
It points to inner obstacles: dullness, inertia, and complacency. The Aśvins’ help is sought not only for outer safety but also for awakening and right enjoyment guided by clarity.
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