यह सोपान ‘धर्म-संकट में भक्ति की परख’ है: राज-वैभव का द्वार खुलते ही त्याग का द्वार भी खुलता है। अयोध्या काण्ड में राम का ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ रूप करुणा, धीरज, और पितृ-आज्ञा-पालन के द्वारा साधक को सिखाता है कि मुक्ति की सीढ़ी घर-गृहस्थी से भागना नहीं, बल्कि आसक्ति का रूपांतरण है—स्वेच्छा से व्रत बनकर आया हुआ वनवास।
इन पदों में अयोध्या काण्ड का करुण-रस चरम पर है, पर करुणा के भीतर ‘धैर्य’ का स्थायी भाव (शान्त-धीरता) दीपक की तरह निरन्तर जलता रहता है। कैकेयी की कटुता (कुटिल-वाक्) और दशरथ की विवशता के बीच राम का मृदु-सुभाउ—‘बिगत सब दूषन’—भक्ति की कसौटी बन जाता है: सच्ची भक्ति वही है जो वचन-पालन को प्रेम का ही रूप मानती है। यहाँ धर्म (पितृ-आज्ञा), नीति (राज-धर्म) और करुणा (मातृ-मान) एक साथ टकराते हैं; तुलसी का काव्य-यंत्र इस टकराव को ‘सोपान’ बना देता है—साधक को दिखाता है कि ईश्वर-भक्ति भावुकता नहीं, मर्यादा में स्थित प्रेम है। लोक-निन्दा/लोक-शोक का सामूहिक चित्र (नगर-व्याप्त विषाद, कैकेयी-निन्दा) सामाजिक-धर्म की ध्वनि जोड़ता है, जिससे काण्ड का स्थापत्य ‘घर’ से ‘वन’ तक—आसक्ति से वैराग्य तक—एक आन्तरिक यात्रा बन जाता है।
Verse 82 (चौपाई)
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।। सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।। करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।। तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।। मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।। सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।। देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना। सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।
Verse 83 (दोहा/सोरठा)
सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।
Verse 84 (चौपाई)
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।। जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।। जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।। सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।। मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।। बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।। सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।। तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।
Verse 85 (दोहा/सोरठा)
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर। तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।
Verse 86 (चौपाई)
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु। जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।। सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।। तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।। अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।। थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।। राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।। जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।
Verse 87 (दोहा/सोरठा)
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।
Verse 88 (चौपाई)
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।। सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।। तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।। राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।। पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।। तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।। लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।। रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।
Verse 89 (दोहा/सोरठा)
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह। सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।
Verse 90 (चौपाई)
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।। सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।। लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।। रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।। सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।। बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।। सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।। आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।
Verse 91 (दोहा/सोरठा)
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु। बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।
Verse 92 (चौपाई)
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।। सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।। अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।। रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।। देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।। तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।। अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।। देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।
Verse 93 (दोहा/सोरठा)
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।
Verse 94 (चौपाई)
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।। चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।। आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।। बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।। अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।। नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।। सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।। जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।
Verse 95 (दोहा/सोरठा)
मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ। मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।
Verse 96 (चौपाई)
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।। एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।। निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।। कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।। पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।। सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।। सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।। निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।
Verse 97 (दोहा/सोरठा)
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।
Verse 98 (चौपाई)
का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।। एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।। जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।। एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।। सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।। एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।। कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।। सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।
Verse 99 (दोहा/सोरठा)
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।
Verse 100 (चौपाई)
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।। खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।। बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।। लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।। भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।। करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।। कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।। कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।
Verse 101 (दोहा/सोरठा)
सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम। राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।
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