यह सोपान ‘धर्म-संकट में भक्ति की परख’ है: राज-वैभव का द्वार खुलते ही त्याग का द्वार भी खुलता है। अयोध्या काण्ड में राम का ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ रूप करुणा, धीरज, और पितृ-आज्ञा-पालन के द्वारा साधक को सिखाता है कि मुक्ति की सीढ़ी घर-गृहस्थी से भागना नहीं, बल्कि आसक्ति का रूपांतरण है—स्वेच्छा से व्रत बनकर आया हुआ वनवास।
इन पदों में अयोध्या काण्ड का करुण-रस चरम पर है, पर करुणा के भीतर ‘धैर्य’ का स्थायी भाव (शान्त-धीरता) दीपक की तरह निरन्तर जलता रहता है। कैकेयी की कटुता (कुटिल-वाक्) और दशरथ की विवशता के बीच राम का मृदु-सुभाउ—‘बिगत सब दूषन’—भक्ति की कसौटी बन जाता है: सच्ची भक्ति वही है जो वचन-पालन को प्रेम का ही रूप मानती है। यहाँ धर्म (पितृ-आज्ञा), नीति (राज-धर्म) और करुणा (मातृ-मान) एक साथ टकराते हैं; तुलसी का काव्य-यंत्र इस टकराव को ‘सोपान’ बना देता है—साधक को दिखाता है कि ईश्वर-भक्ति भावुकता नहीं, मर्यादा में स्थित प्रेम है। लोक-निन्दा/लोक-शोक का सामूहिक चित्र (नगर-व्याप्त विषाद, कैकेयी-निन्दा) सामाजिक-धर्म की ध्वनि जोड़ता है, जिससे काण्ड का स्थापत्य ‘घर’ से ‘वन’ तक—आसक्ति से वैराग्य तक—एक आन्तरिक यात्रा बन जाता है।
चौपाई 40.1-4
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू।मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।
सरुष समीप दीखि कैकेई।मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।।
करुनामय मृदु राम सुभाऊ।प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।।
तदपि धीर धरि समउ बिचारी।पूँछी मधुर बचन महतारी।।
मोहि कहु मातु तात दुख कारन।करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।।
सुनहु राम सबु कारन एहू।राजहि तुम पर बहुत सनेहू।।
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना।मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।।
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू।छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।
sūkhahiṁ adhara jarai sabu aṁgū |manahũ dīna manihīna bhuaṁgū ||
saruṣa samīpa dīkhi kaikeī |mānahũ mīcu gharī gani leī ||
karunāmaya mṛdu rāma subhāū |prathama dīkha dukhu sunā na kāū ||
tadapi dhīra dhari samau bicārī |pū̃chī madhura bacana mahatārī ||
mohi kahu mātu tāta dukha kārana |karia jatana jehiṁ hoi nivārana ||
sunahu rāma sabu kārana ehū |rājahi tuma para bahuta sanehū ||
dena kahenhi mohi dui baradānā |māgeũ jo kachu mohi sohānā ||
so suni bhayau bhūpa ura socū |chāṛi na sakahiṁ tumhāra sãkocū ||
उनके ओठ सूख रहे थे और सारा शरीर जल रहा था, मानो मस्तक का मणि खो चुका कोई दीन हीन सर्प हो। समीप में क्रोध से भरी कैकेई को देखकर, मानो वह काल ही हो, घड़ियाँ गिनती हुई। राम का स्वभाव करुणामय और कोमल था, उन्होंने पहले कभी दुःख न देखा था, न सुना था। तो भी धैर्य धरकर समय विचारा, और माता से मधुर वचनों में पूछा। माता, मुझे बताओ पिता के दुःख का कारण, जिससे उसका निवारण करने का प्रयत्न किया जाए। सुनो राम, यही सारा कारण है, राजा को तुम पर बहुत स्नेह है। उन्होंने मुझे दो वरदान देने के लिए कहा, और मैंने जो कुछ मुझे सुहाता था, वही माँग लिया। वह सुनकर राजा के हृदय में सोच उत्पन्न हुआ, वे तुम्हारे विषय में अपना संकोच नहीं छोड़ सकते।
दोहा 40
सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।
suta saneha ita bacanu uta saṁkaṭa pareu naresu |sakahu na āyasu dharahu sira meṭahu kaṭhina kalesu ||40||
इधर पुत्र के प्रति प्रेम है, उधर दिया हुआ वचन है, राजा संकट में पड़ गए हैं। यदि समर्थ हों तो उनका आदेश सिर पर धारण करो और उनके कठिन क्लेश को मिटा दो।
चौपाई 41.1-4
निधरक बैठि कहइ कटु बानी।सुनत कठिनता अति अकुलानी।।
जीभ कमान बचन सर नाना।मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।।
जनु कठोरपनु धरें सरीरू।सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।।
सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई।बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।।
मन मुसकाइ भानुकुल भानु।रामु सहज आनंद निधानू।।
बोले बचन बिगत सब दूषन।मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी।जो पितु मातु बचन अनुरागी।।
तनय मातु पितु तोषनिहारा।दुर्लभ जननि सकल संसारा।।
nidharaka baiṭhi kahai kaṭu bānī |sunata kaṭhinatā ati akulānī ||
jībha kamāna bacana sara nānā |manahũ mahipa mṛdu laccha samānā ||
janu kaṭhorapanu dhareṁ sarīrū |sikhai dhanuṣabidyā bara bīrū ||
saba prasaṁgu raghupatihi sunāī |baiṭhi manahũ tanu dhari niṭhurāī ||
mana musakāi bhānukula bhānu |rāmu sahaja ānaṁda nidhānū ||
bole bacana bigata saba dūṣana |mṛdu maṁjula janu bāga bibhūṣana ||
sunu jananī soi sutu baṛabhāgī |jo pitu mātu bacana anurāgī ||
tanaya mātu pitu toṣanihārā |durlabha janani sakala saṁsārā ||
निःसंकोच बैठकर कैकेयी कड़े वचन बोली, और उन्हें सुनकर कठोरता भी अत्यंत व्याकुल हो गई। उसकी जीभ धनुष और वचन अनेक बाण थे, और राजा, जितने कोमल थे, मानो उन्हीं का लक्ष्य थे। मानो कठोरता स्वयं शरीर धारण करके धनुर्विद्या सीख रही हो और एक उत्तम वीर बन गई हो। सारा प्रसंग रघुनाथ जी को सुनाकर वह ऐसे बैठी जैसे निर्दयता ने शरीर धारण कर लिया हो। सूर्यवंश के सूर्य, स्वाभाविक आनंद के भंडार राम जी मन में मुस्कुराए। उन्होंने सब दोषों से रहित, कोमल और मंजुल वचन बोले, मानो वाणी के आभूषण हों। सुनो, माता, वही पुत्र बड़ा भाग्यशाली है जो पिता-माता के वचनों में अनुराग रखता है। माता, माता-पिता को तोषाने वाला पुत्र सम्पूर्ण संसार में दुर्लभ है।
दोहा 41
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।
munigana milanu biseṣi bana sabahi bhā̃ti hita mora |tehi mahã pitu āyasu bahuri saṁmata jananī tora ||41||
वन में मुनियों के समूह से मिलना मुझे विशेष रूप से प्रिय है, और वह सब प्रकार से मेरे हित का कारण है। और इसके अतिरिक्त मेरे पिता की आज्ञा है, और साथ ही तुम्हारी सम्मति है, माता।
चौपाई 42.1-4
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू।बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।।
जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा।प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी।परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं।देखु बिचारि मातु मन माहीं।।
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी।निपट बिकल नरनायकु देखी।।
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी।होति प्रतीति न मोहि महतारी।।
राउ धीर गुन उदधि अगाधू।भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।।
जातें मोहि न कहत कछु राऊ।मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।
bharata prānapriya pāvahiṁ rājū |bidhi saba bidhi mohi sanamukha āju ||
joṁ na jāũ bana aisehu kājā |prathama gania mohi mūṛha samājā ||
sevahiṁ arãḍu kalapataru tyāgī |parihari amṛta lehiṁ biṣu māgī ||
teu na pāi asa samau cukāhīṁ |dekhu bicāri mātu mana māhīṁ ||
aṁba eka dukhu mohi biseṣī |nipaṭa bikala naranāyaku dekhī ||
thorihiṁ bāta pitahi dukha bhārī |hoti pratīti na mohi mahatārī ||
rāu dhīra guna udadhi agādhū |bhā mohi te kachu baṛa aparādhū ||
jāteṁ mohi na kahata kachu rāū |mori sapatha tohi kahu satibhāū ||
भरत, जो मुझे अपने प्राणों से प्रिय हैं, राज्य प्राप्त करेंगे। आज विधाता मुझे हर प्रकार से अनुकूल है। यदि ऐसे कार्य के लिए मैं वन नहीं जाऊँ, तो मुझे मूढ़ों की सभा में पहले गिन लो। जो कल्पवृक्ष को त्यागकर अरंड़ की सेवा करते हैं, जो अमृत छोड़कर विष माँगते हैं, वे भी ऐसे अवसर को नहीं चूकाते। माता, अपने मन में विचार कर देखो। माता, एक दुःख मुझे विशेष रूप से व्याकुल करता है: मैं राजा को अत्यंत दुःखी देखता हूँ। माता, मुझे विश्वास नहीं होता कि इतनी छोटी बात से मेरे पिता को इतना भारी दुःख हो। राजा धीर हैं, गुणों के अथाह समुद्र हैं; मुझसे कोई बड़ा अपराध अवश्य हुआ होगा। इसी कारण राजा मुझसे कुछ नहीं कहते। मैं अपनी शपथ देता हूँ: तुम मुझे सत्य बताओ।
दोहा 42
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।
sahaja sarala raghubara bacana kumati kuṭila kari jāna |calai joṁka jala bakragati jadyapi salilu samāna ||42||
श्री रघुनाथ जी के वचन सहज और सरल थे, पर कुमति वाली रानी ने उन्हें कुटिल मान लिया। जैसे जोंक जल में टेढ़े-मेढ़े चलती है, यद्यपि जल सर्वत्र एक सा ही है।
चौपाई 43.1-4
रहसी रानि राम रुख पाई।बोली कपट सनेहु जनाई।।
सपथ तुम्हार भरत कै आना।हेतु न दूसर मै कछु जाना।।
तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता।जननी जनक बंधु सुखदाता।।
राम सत्य सबु जो कछु कहहू।तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई।चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे।उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे।मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।।
रामहि मातु बचन सब भाए।जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।
rahasī rāni rāma rukha pāī |bolī kapaṭa sanehu janāī ||
sapatha tumhāra bharata kai ānā |hetu na dūsara mai kachu jānā ||
tumha aparādha jogu nahiṁ tātā |jananī janaka baṁdhu sukhadātā ||
rāma satya sabu jo kachu kahahū |tumha pitu mātu bacana rata ahahū ||
pitahi bujhāi kahahu bali soī |cautheṁpana jehiṁ ajasu na hoī ||
tumha sama suana sukṛta jehiṁ dīnhe |ucita na tāsu nirādaru kīnhe ||
lāgahiṁ kumukha bacana subha kaise |magahã gayādika tīratha jaise ||
rāmahi mātu bacana saba bhāe |jimi surasari gata salila suhāe ||
रानी राम की रुचि जानकर प्रसन्न हुई और कपट प्रेम दिखाती हुई बोली। तुम्हारी और भरत की शपथ, मैं कोई दूसरा कारण नहीं जानती। हे तात, तुम किसी अपराध के योग्य नहीं हो, जननी, जनक और बंधु को सुख देने वाले हो। हे राम, तुम जो कुछ कहते हो सब सत्य है, तुम माता-पिता के वचन में रत हो। पिता को समझाकर वही बात कहो जिससे चौथी अवस्था में उनको अपयश न हो। जिन्हें सुकृति ने तुम्हारे जैसा पुत्र दिया, उनका अनादर करना उचित नहीं है। कुमुख से निकले शुभ वचन कैसे भाएँ, जैसे मगध में गया आदि तीर्थ हैं। राम को माता के सब वचन भाए, जैसे गंगा में गिरा जल सुहावना हो जाता है।
दोहा 43
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।
gai muruchā rāmahi sumiri nṛpa phiri karavaṭa līnha |saciva rāma āgamana kahi binaya samaya sama kīnha ||43||
राम का स्मरण करते ही मूर्छा छंडी और राजा ने फिर करवट बदली। सचिव ने राम के आगमन की बात कही और समय के अनुसार विनय की।
चौपाई 44.1-4
अवनिप अकनि रामु पगु धारे।धरि धीरजु तब नयन उघारे।।
सचिवँ सँभारि राउ बैठारे।चरन परत नृप रामु निहारे।।
लिए सनेह बिकल उर लाई।गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।।
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू।चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।
सोक बिबस कछु कहै न पारा।हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं।जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी।बिनती सुनहु सदासिव मोरी।।
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी।आरति हरहु दीन जनु जानी।।
avanipa akani rāmu pagu dhāre |dhari dhīraju taba nayana ughāre ||
sacivã sãbhāri rāu baiṭhāre |carana parata nṛpa rāmu nihāre ||
lie saneha bikala ura lāī |gai mani manahũ phanika phiri pāī ||
rāmahi citai raheu naranāhū |calā bilocana bāri prabāhū ||
soka bibasa kachu kahai na pārā |hṛdayã lagāvata bārahiṁ bārā ||
bidhihi manāva rāu mana māhīṁ |jehiṁ raghunātha na kānana jāhīṁ ||
sumiri mahesahi kahai nihorī |binatī sunahu sadāsiva morī ||
āsutoṣa tumha avaḍhara dānī |ārati harahu dīna janu jānī ||
जब राजा ने सुना कि राम आ गए, तब उसने धीरज धारकर नेत्र खोले। मंत्रियों ने राजा को सँभालकर बैठाया, और राजा ने राम को अपने चरणों पर गिरते देखा। प्रेम से व्याकुल होकर उसने राम को हृदय से लगाया, मानो नाग ने अपना खोया हुआ मण फिर पा लिया हो। राजा राम को ही निहारता रहा, और उसके नेत्रों से जल की धारा बहने लगी। शोक के वशीभूत होकर वह कुछ कह न सका, परंतु राम को बार-बार हृदय से लगाता रहा। राजा ने मन में ब्रह्मा को मनाया, कि रघुनाथ वन को न जाएँ। महेश को स्मरण करके उसने प्रार्थना की: "सदाशिव, मेरी विनती सुनो।" "तुम शीघ्र प्रसन्न होने वाले और उदार दाता हो, दीन जन जानकर मेरी आर्ति दूर करो।"
दोहा 44
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।
tumha preraka saba ke hṛdayã so mati rāmahi dehu |bacanu mora taji rahahi ghara parihari sīlu sanehu ||44||
आप सबके हृदय के प्रेरक हैं; राम को ऐसी बुद्धि दीजिए कि वे मेरी बात त्यागकर, अपनी नम्रता और स्नेह को त्यागकर घर पर ही रहें।
चौपाई 45.1-4
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ।नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।
सब दुख दुसह सहावहु मोही।लोचन ओट रामु जनि होंही।।
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला।पीपर पात सरिस मनु डोला।।
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी।पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।।
देस काल अवसर अनुसारी।बोले बचन बिनीत बिचारी।।
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई।अनुचितु छमब जानि लरिकाई।।
अति लघु बात लागि दुखु पावा।काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।।
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता।सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।
ajasu hou jaga sujasu nasāū |naraka parau baru surapuru jāū ||
saba dukha dusaha sahāvahu mohī |locana oṭa rāmu jani hoṁhī ||
asa mana gunai rāu nahiṁ bolā |pīpara pāta sarisa manu ḍolā ||
raghupati pitahi premabasa jānī |puni kachu kahihi mātu anumānī ||
desa kāla avasara anusārī |bole bacana binīta bicārī ||
tāta kahaũ kachu karaũ ḍhiṭhāī |anucitu chamaba jāni larikāī ||
ati laghu bāta lāgi dukhu pāvā |kāhũ na mohi kahi prathama janāvā ||
dekhi gosāĩhi pū̃chiũ mātā |suni prasaṁgu bhae sītala gātā ||
जग में अपयश हो और मेरा सुयश नष्ट हो; मैं नरक में गिरूँ, बरन स्वर्गलोक जाऊँ। मुझे सब कठोर दुख सहने पड़ें, पर राम मेरी आँखों से दूर न जाएँ। ऐसे मन में विचार कर राजा बोले नहीं; उनका मन पीपल के पत्ते के समान डोला। रघुपति ने पिता को प्रेमवश जानकर, और माता का भी अनुमान कर, पुनः कुछ कहा। देश, काल और अवसर के अनुसार, विनम्र वचन विचारकर बोले। तात, मैं कुछ कहूँ और ढिठाई करूँ; बालकपन जानकर अनुचित को क्षम करना। अति छोटी बात के लिए दुख पाया, किंतु किसी ने मुझे पहले नहीं बताया। स्वामी को देखकर मैंने माता से पूछा; और प्रसंग सुनकर शरीर शीतल हो गया।
दोहा 45
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।
maṁgala samaya saneha basa soca pariharia tāta |āyasu deia haraṣi hiyã kahi pulake prabhu gāta ||45||
"हे तात, इस मंगल समय में स्नेह से उत्पन्न सोच को त्याग दीजिए और हृदय में हर्ष सहित मुझे आज्ञा दीजिए।" ऐसा कहते हुए प्रभु के शरीर में पुलक आ गया।
चौपाई 46.1-4
धन्य जनमु जगतीतल तासू।पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।
चारि पदारथ करतल ताकें।प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।
आयसु पालि जनम फलु पाई।ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।।
बिदा मातु सन आवउँ मागी।चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।।
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा।भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।।
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी।छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।।
सुनि भए बिकल सकल नर नारी।बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।।
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई।बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।
dhanya janamu jagatītala tāsū |pitahi pramodu carita suni jāsū ||
cāri padāratha karatala tākeṁ |priya pitu mātu prāna sama jākeṁ ||
āyasu pāli janama phalu pāī |aihaũ begihiṁ hou rajāī ||
bidā mātu sana āvaũ māgī |calihaũ banahi bahuri paga lāgī ||
asa kahi rāma gavanu taba kīnhā |bhūpa soka basu utaru na dīnhā ||
nagara byāpi gai bāta sutīchī |chuata caṛhī janu saba tana bīchī ||
suni bhae bikala sakala nara nārī |beli biṭapa jimi dekhi davārī ||
jo jahã sunai dhunai siru soī |baṛa biṣādu nahiṁ dhīraju hoī ||
धन्य है इस पृथ्वीतल पर उसका जन्म, जिसके चरित्र सुनकर पिता प्रमुदित होता है। उसके हाथ के पंजे में चारों पुरुषार्थ हैं, जिसे पिता और माता प्राणों के समान प्रिय हैं। आपकी आज्ञा पालकर मैं अपने जन्म का फल पाऊँगा, और शीघ्र ही लौट आऊँगा, यदि आपकी रजा हो। मैं जाकर माता से विदा माँगूँगा, और फिर आपके चरणों में लगकर वन को प्रस्थान करूँगा। ऐसा कहकर राम ने तब प्रस्थान किया, और राजा शोक में डूबा रहा, उत्तर न दिया। वह बात नगर में फैल गई, मानो बिच्छू चढ़ आया हो और उसका विष सारे तन को छू ले। सुनकर सब स्त्री-पुरुष व्याकुल हो गए, जैसे लताएँ और वृक्ष दावानल देखकर। जो जहाँ सुनता, वह अपना सिर पीटता; बड़ा शोक था और किसी में धैर्य न रहा।
दोहा 46
मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ।मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।
mukha sukhāhiṁ locana sravahiṁ soku na hṛdayã samāi |manahũ karuna rasa kaṭakaī utarī avadha bajāi ||46||
उनके मुख सूख गए, आँखों से अश्रु बहने लगे, उनका शोक हृदय में समाने नहीं पा रहा था। मानो करुण रस की सेना अवध पर उतर आई हो, नगाड़े बजाते हुए।
चौपाई 47.1-4
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी।जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ।छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।।
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा।डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।।
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी।भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।
पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा।सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।।
सदा रामु एहि प्रान समाना।कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ।सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।।
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई।जानि न जाइ नारि गति भाई।।
milehi mājha bidhi bāta begārī |jahã tahã dehiṁ kaikeihi gārī ||
ehi pāpinihi būjhi kā pareū |chāi bhavana para pāvaku dhareū ||
nija kara nayana kāṛhi caha dīkhā |ḍāri sudhā biṣu cāhata cīkhā ||
kuṭila kaṭhora kubuddhi abhāgī |bhai raghubaṁsa benu bana āgī ||
pālava baiṭhi peṛu ehiṁ kāṭā |sukha mahũ soka ṭhāṭu dhari ṭhāṭā ||
sadā rāmu ehi prāna samānā |kārana kavana kuṭilapanu ṭhānā ||
satya kahahiṁ kabi nāri subhāū |saba bidhi agahu agādha durāū ||
nija pratibiṁbu baruku gahi jāī |jāni na jāi nāri gati bhāī ||
जब सब कुछ सिद्ध होने लगा था, तब विधाता ने बात बिगाड़ दी; और यत्र-तत्र लोग कैकेयी को गालियाँ देने लगे। इस पापिनी के मन में क्या बात आई, कि उसने घर बनाकर उसी पर आग लगा दी? अपने ही हाथ से नेत्र नोचकर भी देखना चाहती है; अमृत फेंककर विष का स्वाद लेना चाहती है। कुटिल, कठोर हृदय, दूषित बुद्धि और अभागी, वह रघुकुल के बाँस के वन की आग बन गई। डाल पर बैठकर उसी पेड़ को काट डाला; सुख के बीच में शोक का ठाट जमा लिया। राम उसके प्राण के समान सदा प्रिय थे; किस कारण से उसने ऐसा कुटिलपन ठान लिया? कवि सत्य कहते हैं: स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से अथाह, गहरा और छिपा हुआ है। अपना प्रतिबिंब तो कोई पकड़ ले, पर भाई, स्त्री की गति जानी नहीं जा सकती।
दोहा 47
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।
kāha na pāvaku jāri saka kā na samudra samāi |kā na karai abalā prabala kehi jaga kālu na khāi ||47||
ऐसा क्या है जिसे अग्नि न जला सके, और ऐसा क्या है जिसे समुद्र न समा सके? बलवती होकर अबला स्त्री क्या नहीं कर सकती, और जग में ऐसा कौन है जिसे काल न खा सके?
चौपाई 48.1-4
का सुनाइ बिधि काह सुनावा।का देखाइ चह काह देखावा।।
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा।बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु।अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।।
एक धरम परमिति पहिचाने।नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।।
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी।एक एक सन कहहिं बखानी।।
एक भरत कर संमत कहहीं।एक उदास भायँ सुनि रहहीं।।
कान मूदि कर रद गहि जीहा।एक कहहिं यह बात अलीहा।।
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे।रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।
kā sunāi bidhi kāha sunāvā |kā dekhāi caha kāha dekhāvā ||
eka kahahiṁ bhala bhūpa na kīnhā |baru bicāri nahiṁ kumatihi dīnhā ||
jo haṭhi bhayau sakala dukha bhājanu |abalā bibasa gyānu gunu gā janu ||
eka dharama paramiti pahicāne |nṛpahi dosu nahiṁ dehiṁ sayāne ||
sibi dadhīci haricaṁda kahānī |eka eka sana kahahiṁ bakhānī ||
eka bharata kara saṁmata kahahīṁ |eka udāsa bhāyã suni rahahīṁ ||
kāna mūdi kara rada gahi jīhā |eka kahahiṁ yaha bāta alīhā ||
sukṛta jāhiṁ asa kahata tumhāre |rāmu bharata kahũ prānapiāre ||
विधि ने क्या सुनाया और क्या सुनावाया? क्या दिखाना चाहता है और क्या दिखावाया? एक कहते हैं कि राजा ने भला नहीं किया। बिना विचारे दुष्टबुद्धि स्त्री को वर दे दिया। जिस हठ से वह सम्पूर्ण दुखों का भाजन बन गया, अबला के वश में आकर उसका ज्ञान और गुण चला गया जैसे। एक धर्म की परमिति पहचानने वाले समझदार राजा को दोष नहीं देते। शिबि, दधीचि और हरिश्चंद्र की कहानियाँ एक-एक के पास विस्तार से कहते हैं। एक कहते हैं कि भरत इसके लिए सहमत थे, एक उदास भाव से सुनते रहते हैं। हाथों से कान मूँदकर, दांतों से जीभ पकड़कर एक कहते हैं कि यह बात झूठी है। ऐसा कहने से तुम्हारा सुकृत नष्ट होता है। राम भरत के प्राणप्रिय हैं।
दोहा 48
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।
caṁdu cavai baru anala kana sudhā hoi biṣatūla |sapanehũ kabahũ na karahiṁ kichu bharatu rāma pratikūla ||48||
चाँद अग्नि की चिंगारियाँ बरसाए, और अमृत विष के समान हो जाए; तो भी भरत स्वप्न में भी कभी राम के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे।
चौपाई 49.1-4
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं।सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।
खरभरु नगर सोचु सब काहू।दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।।
बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी।जे प्रिय परम कैकेई केरी।।
लगीं देन सिख सीलु सराही।बचन बानसम लागहिं ताही।।
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना।सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।।
करहु राम पर सहज सनेहू।केहिं अपराध आजु बनु देहू।।
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू।प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।।
कौसल्याँ अब काह बिगारा।तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।
eka bidhātahiṁ dūṣanu deṁhīṁ |sudhā dekhāi dīnha biṣu jehīṁ ||
kharabharu nagara socu saba kāhū |dusaha dāhu ura miṭā uchāhū ||
biprabadhū kulamānya jaṭherī |je priya parama kaikeī kerī ||
lagīṁ dena sikha sīlu sarāhī |bacana bānasama lāgahiṁ tāhī ||
bharatu na mohi priya rāma samānā |sadā kahahu yahu sabu jagu jānā ||
karahu rāma para sahaja sanehū |kehiṁ aparādha āju banu dehū ||
kabahũ na kiyahu savati āresū |prīti pratīti jāna sabu desū ||
kausalyā̃ aba kāha bigārā |tumha jehi lāgi bajra pura pārā ||
कितनों ने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा को दोष दिया, जिन्होंने अमृत दिखाकर विष दिया। नगर में खलबली मची, सबके मन में चिंता थी; सहन करना कठिन जलती हुई वेदना हृदय में बस गई और सब उत्साह मिट गया। ब्राह्मणों की स्त्रियाँ, कुल में सम्मानित वृद्ध स्त्रियाँ, जो कैकेयी को अत्यंत प्रिय थीं। उन्होंने उसके शील की सराहना करते हुए उसे उपदेश देना आरंभ किया, परंतु उनके वचन उसे बाण की तरह लगे। "भरत मुझे राम के समान प्रिय नहीं, यह तुम सदा कहा करती थीं और सारा जग जानता है।" "तो राम पर सहज प्रेम दिखाओ। आज किस अपराध के कारण उसे वन भेज रही हो?" "तुमने कभी सौतिन के प्रति ईर्ष्या नहीं की; सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वास को जानता है।" "कौसल्या ने अब तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, जिसके लिए तुमने नगर पर वज्रपात किया है?"
दोहा 49
सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।
sīya ki piya sãgu pariharihi lakhanu ki rahihahiṁ dhāma |rāju ki bhū̃jaba bharata pura nṛpu ki jiihi binu rāma ||49||
क्या सीता अपने पति का साथ त्याग देंगी, या लक्ष्मण घर पर रहेंगे? क्या भरत राज्य का उपभोग करेंगे और नगर पर राज करेंगे, या राजा राम के बिना जीवित रहेंगे?
भक्ति की परख ‘भावुकता’ नहीं, ‘मर्यादा’ है: पितृ-आज्ञा-पालन को राम प्रेम का रूप बनाते हैं—वचन-पालन ही आराधना। करुणा के बीच धैर्य का स्थायी-भाव साधक को सिखाता है कि शोक में भी चित्त-स्थिरता संभव है। धर्म, नीति और करुणा का संघर्ष दिखाता है कि सच्ची भक्ति निर्णय-क्षमता (धर्म-निष्ठा) मांगती है—परिणामस्वरूप त्याग पलायन नहीं, स्वेच्छा से स्वीकारा व्रत बनता है। लोक-शोक/लोक-निन्दा यह भी सिखाती है कि भक्त का आचरण समाज के नैतिक बोध को जाग्रत करता है; व्यक्तिगत साधना सार्वजनिक मर्यादा का दीपक बन सकती है।
इन पदों में अयोध्या काण्ड का करुण-रस अपने चरम पर है, पर करुणा के भीतर ‘धैर्य’ का स्थायी भाव (स्थायी-भाव: शान्त-धीरता) लगातार दीपक की तरह जलता है। कैकेयी की कटुता (कुटिल-वाक्) और दशरथ की विवशता के बीच राम का मृदु-सुभाउ—‘बिगत सब दूषन’—भक्ति की कसौटी बन जाता है: सच्ची भक्ति वह है जो वचन-पालन को प्रेम का रूप मानती है। यहाँ धर्म (पितृ-आज्ञा), नीति (राज-धर्म), और करुणा (मातृ-मान) एक साथ टकराते हैं; तुलसी का काव्य-यंत्र इस टकराव को ‘सोपान’ बनाता है—साधक को दिखाता है कि ईश्वर-भक्ति भावुकता नहीं, मर्यादा में स्थित प्रेम है। लोक-निन्दा/लोक-शोक का सामूहिक चित्र (नगर-व्याप्त विषाद, कैकेयी-निन्दा) सामाजिक-धर्म की ध्वनि जोड़ता है, जिससे काण्ड का स्थापत्य ‘घर’ से ‘वन’ तक—आसक्ति से वैराग्य तक—एक आंतरिक यात्रा बन जाता है।
करुण-रस का तीव्र उत्कर्ष—(1) शारीरिक-मानसिक दाह: ‘सूखहिं अधर, जरइ सबु अंगू’ से भीतर का ताप/विषाद दृश्य बनता है। (2) क्रोध-घृणा का उभार: कैकेयी की ‘सरुष’ निकटता/कटुता देखकर लोक-मन में रोष और निन्दा का प्रवाह। (3) विवशता-शोक: दशरथ की असहायता से करुणा गाढ़ी होती है; राज-वैभव के द्वार पर ही शोक का अँधेरा। (4) धीर-शान्त स्थायी-भाव का दीप: इसी करुणा के बीच राम का ‘मृदु-सुभाउ’ और मर्यादा-स्थित धैर्य शान्त-रस की धारा खोलता है। (5) धर्म-संकट का रूपांतरण: टकराव (पितृ-आज्ञा बनाम मातृ-मान/राज-धर्म) अंततः ‘व्रत’ में बदलता है—वनवास दण्ड नहीं, स्वेच्छा से स्वीकारा धर्म। (6) सामूहिक विषाद से साधना-पथ: नगर-व्याप्त शोक/लोक-निन्दा एक सामाजिक-ध्वनि बनकर व्यक्तिगत करुणा को ‘भक्ति की कसौटी’ में परिणत करती है।
परंपरागत मान्यता में यह अंश ‘पितृ-भक्ति, वचन-पालन, और संकट में समता’ की सिद्धि देता है; गृहस्थ-साधक के लिए यह पाठ शोक-निवारण, मन-स्थैर्य, तथा ‘धर्म-निर्णय’ की बुद्धि बढ़ाता है—क्योंकि राम के धैर्य का स्मरण स्वयं ‘अशान्त मन’ को शान्त करता है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-संपुट जोड़ा जाता है; वचन-पालन के प्रसंग में कई परंपराएँ ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम’ को भी स्मरण-रूप में रखती हैं (स्थानीय परंपरा-भेद संभव)।
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