राजधर्म बनाम प्रेम—यह सोपान साधक को ‘स्वत्व’ (अहं-हित) से उठाकर ‘धर्म-हित’ (ईश-आज्ञा) में स्थिर करता है। अयोध्या काण्ड में राम का राज्य-त्याग और वन-गमन बाह्य घटना नहीं, वैराग्य-दीक्षा है: आसक्ति का परित्याग, वचन-पालन, और लोक-कल्याण हेतु स्वेच्छा से कष्ट-स्वीकार। इस चरण पर साधक सीखता है कि मुक्ति-मार्ग में ‘उचित’ वही है जो ईश्वर-आज्ञा और सत्य-प्रतिज्ञा के साथ हो, चाहे मन-प्रिय न हो।
अयोध्या काण्ड का प्रधान रस करुण है, पर वह करुणा ‘विषाद’ नहीं—धर्म-तेज से दीप्त करुणा है। राजतिलक के निकट आते ही ‘विपरीत विधि’ से वनवास का विधान होता है; इससे मनुष्य-स्वभाव (क्रोध, हठ, भय, लोभ) और दिव्य-स्वभाव (क्षमा, सत्य, त्याग, शरणागति) आमने-सामने रखे जाते हैं। प्रस्तुत खंड में कैकेयी के हठ के विरुद्ध सखियों की नीति-वाणी, फिर प्रजा का विलाप, और कौसल्या का मातृ-हृदय—इन तीन वृत्तों में अयोध्या का ‘समष्टि-चित्त’ काँपता है। राम का ‘राज के भूखे न होना’ निर्गुण-वैराग्य का संकेत है, जबकि माता-पिता के चरणों में विनय सगुण-भक्ति की मधुरता है। इस प्रकार तुलसी निर्गुण-तत्त्व (अनासक्ति) और सगुण-लीला (मातृ-प्रेम, लोक-शोक) को एक ही सोपान पर जोड़ते हैं—जहाँ त्याग ही प्रेम की सर्वोच्च भाषा बनता है।
Verse 102 (चौपाई)
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।। भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।। नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।। गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।। जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे।। जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।। राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू।। उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।।
Verse 103 (छंद)
जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही।। जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी। तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी।।
Verse 104 (दोहा/सोरठा)
सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित। तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी।।50।।
Verse 105 (चौपाई)
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।। ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी।। राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।। एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।। जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।। बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी।। अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई।। मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।
Verse 106 (दोहा/सोरठा)
नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान। छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।।
Verse 107 (चौपाई)
रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।। दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे।। बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता।। गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए।। प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।। सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।। कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।। सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई।।
Verse 108 (दोहा/सोरठा)
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति। जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।
Verse 109 (चौपाई)
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।। पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ।। मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला।। सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला।। धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।। पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।। आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।। जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।
Verse 110 (दोहा/सोरठा)
बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान। आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।
Verse 111 (चौपाई)
बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।। सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी।। कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।। नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।। धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।। तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।। राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा।। तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।
Verse 112 (दोहा/सोरठा)
निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ। सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।।
Verse 113 (चौपाई)
राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।। लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू।। धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।। राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।। कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।। बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।। सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।। तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।।
Verse 114 (दोहा/सोरठा)
राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु। तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।
Verse 115 (चौपाई)
जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।। जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना।। पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी।। अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।। बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।। जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।। पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।। ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।
Verse 116 (दोहा/सोरठा)
यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ। मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।
Verse 117 (चौपाई)
देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।। अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना।। अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई।। जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।। सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।। बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी।। दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।। राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।
Verse 118 (दोहा/सोरठा)
समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ। जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।।
Verse 119 (चौपाई)
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।। बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता।। चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।। की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।। चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।। मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।। मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी।। तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी।।
Verse 120 (दोहा/सोरठा)
पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।।
Verse 121 (चौपाई)
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।। नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।। कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।। फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।। पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।। जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।। सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा। चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।
Verse 122 (दोहा/सोरठा)
करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि। बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।
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