
युद्धाय रावणस्य निर्याणं तथा उत्पातदर्शनम् (Ravana’s Mobilization for War and the ظهور of Fatal Portents)
युद्धकाण्ड
लंका में चारों ओर विलाप सुनकर रावण ने नगर की व्याकुलता और युद्ध का गृहस्थ-जीवन पर पड़ा भारी प्रभाव जाना और क्षणभर ठिठक गया। फिर वह क्रोध से भयानक रूप धारण कर महोदर, महापार्श्व और विरूपाक्ष को शीघ्र आज्ञा देता है कि शेष निशाचरों को युद्ध के लिए जुटा दें। अहंकारपूर्ण प्रतिज्ञाओं में वह कहता है कि राघव और लक्ष्मण को यमलोक भेज दूँगा, खर, कुम्भकर्ण, प्रहस्त और इन्द्रजित के वध का प्रतिशोध लूँगा, और मेघ-सम बाणवर्षा से वानर-दलों का संहार कर दूँगा। राक्षस विविध शस्त्र धारण कर रथों पर चढ़ते हैं और गर्जना करते हुए निकल पड़ते हैं। रावण धनुष उठाए तेजस्वी होकर आगे बढ़ता है, तभी घोर अपशकुन प्रकट होते हैं—सूर्य म्लान पड़ता है, दिशाएँ अँधियारी हो जाती हैं, उल्काएँ गिरती हैं, रक्तवृष्टि होती है, पशु-पक्षी अशुभ शब्द करते हैं, और उसके बाएँ नेत्र व भुजा में फड़कन होती है। फिर भी वह नहीं रुकता; घमासान युद्ध छिड़ जाता है और उसके स्वर्ण-पंखों वाले बाण वानर-पंक्तियों में भयंकर घाव कर देते हैं।
Verse 1
आर्तानांराक्षसीनांतुलङ्कायांवैकुलेकुले ।रावणःकरुणंशब्दंशुश्रावपरिदेवितम् ।।6.96.1।।
लंका में घर-घर पीड़ित राक्षसी स्त्रियों का करुण विलाप उठ रहा था; उस शोकपूर्ण रुदन-स्वर को रावण ने सुना।
Verse 2
स तुदीर्घंविनिःश्वस्यमुहूर्तंध्यानमास्थितः ।बभूवपरमक्रुद्धोरावणोभीमदर्शनः ।।6.96.2।।
वह रावण दीर्घ श्वास छोड़कर क्षणभर ध्यान में ठहरा; फिर भयानक रूप वाला रावण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा।
Verse 3
सन्दश्यदशनैरोष्ठंक्रोधसम्रक्तलोचनः ।राक्षसैरपिदुर्दर्शःकालाग्निरिवमूर्छितः ।।6.96.3।।
वह दाँतों के बीच होंठ दबाए, क्रोध से लाल नेत्रों वाला रावण राक्षसों के लिए भी दुर्दर्श हो उठा—मानो प्रलयाग्नि भड़क उठी हो।
Verse 4
उवाच च समीपस्थान्राक्षसान्राक्षसेश्वरः ।क्रोधाव्यक्तकथस्तत्रनिर्दहन्निवचक्षुषा ।।6.96.4।।महोदरंमहापार्श्वंविरूपाक्षं च राक्षसम् ।शीघ्रंवदतसैन्यानिनिर्यातेतिममाज्ञया ।।6.96.5।।
तब राक्षसों के स्वामी ने पास खड़े राक्षसों से कहा—क्रोध से वाणी रुद्ध थी और नेत्र मानो जलाते थे। उसने महोदर, महापार्श्व और राक्षस विरूपाक्ष से कहा—“शीघ्र सेना को बाहर निकालो; यह मेरी आज्ञा है।”
Verse 5
उवाच च समीपस्थान्राक्षसान्राक्षसेश्वरः ।क्रोधाव्यक्तकथस्तत्रनिर्दहन्निवचक्षुषा ।।6.96.4।।महोदरंमहापार्श्वंविरूपाक्षं च राक्षसम् ।शीघ्रंवदतसैन्यानिनिर्यातेतिममाज्ञया ।।6.96.5।।
तब राक्षसों के स्वामी ने पास खड़े राक्षसों से कहा—क्रोध से वाणी रुद्ध थी और नेत्र मानो जलाते थे। उसने महोदर, महापार्श्व और राक्षस विरूपाक्ष से कहा—“शीघ्र सेना को बाहर निकालो; यह मेरी आज्ञा है।”
Verse 6
तस्यतद्वचनंश्रुत्वाराक्षसास्तेभयार्दिताः ।चोदयामासुरव्यग्रान्राक्षसांस्तान्नृपाज्ञया ।।6.96.6।।
अपने राजा के वे वचन सुनकर वे राक्षस भय से पीड़ित हुए; फिर भी राजाज्ञा से उन्होंने अन्य राक्षसों को—जो डटे हुए थे—उत्साहित कर आगे बढ़ाया।
Verse 7
तेतुसर्वेतथेत्युक्त्वाराक्षसाभीमदर्शनाः ।कृतस्वस्त्वयनाःसर्वेतेरणाभिमुखाययुः ।।6.96.7।।
तब वे सभी भयानक-दर्शन राक्षस “तथास्तु” कहकर, मंगल-स्वस्त्ययन कर, रण की ओर मुख करके चल पड़े।
Verse 8
प्रतिपूज्ययथान्यायंरावणंतेमहारथाः ।तस्थुःप्राञ्जलयःसर्वेभर्तुर्विजयकाङ्क्षिणः ।।6.96.8।।
विधिपूर्वक रावण का प्रतिपूजन कर वे महारथी सब हाथ जोड़कर खड़े रहे, अपने स्वामी की विजय की कामना करते हुए।
Verse 9
अथोवाचप्रहस्यैतान्रावणःक्रोधमूर्छितः ।महोदरमहापार्श्वौविरूपाक्षं च राक्षसम् ।।6.96.9।।
तब क्रोध से मूर्छित रावण हँस पड़ा और उन राक्षसों से बोला—महोदर, महापार्श्व और विरूपाक्ष।
Verse 10
अद्यबाणैर्धनुर्मुक्स्सैर्युगान्तादित्यसन्निभैः ।राघवंलक्ष्मणंचैवनेष्यामियमसादनम् ।।6.96.10।।
आज मैं धनुष से छोड़े गए, युगांत के सूर्य के समान दहकते बाणों द्वारा राघव और लक्ष्मण—दोनों को—यमलोक पहुँचा दूँगा।
Verse 11
खरस्यकुम्भकर्णस्यप्रहसेन्द्रजितोस्तथा ।करिष्यामिप्रतीकारमद्यशत्रुवधादहम् ।।6.96.11।।
आज शत्रु-वध करके मैं खर, कुम्भकर्ण तथा प्रहस्त और इन्द्रजित—इन सबका प्रतिशोध चुकाऊँगा।
Verse 12
नैवान्तरिक्षं न दिशो न नद्यौर्नापिसागराः ।प्रकाशत्वंगमिष्यन्तिमद्बाणजलदावृताः ।।6.96.12।।
मेरे बाणों के मेघ-समूह से आच्छादित होकर न आकाश, न दिशाएँ, न नदियाँ और न ही समुद्र अपना प्रकाश बनाए रख सकेंगे।
Verse 13
अद्यवानरमुख्यानांतानियूथानिभागशः ।धनुषाशरजालेनवधिष्यामिपतत्रिणा ।।6.96.13।।
आज मैं अपने धनुष से पंखयुक्त बाणों के जाल द्वारा उन श्रेष्ठ वानरों के दलों को टुकड़े-टुकड़े करके मार डालूँगा।
Verse 14
अद्यवानरसैन्यानिरथेनपवनौजसा ।धनुस्समुद्रादुद्भूतैर्मथिष्यामिशरोर्मिभिः ।।6.96.14।।
आज मैं रथ पर आरूढ़ होकर, पवन के समान वेग से, अपने धनुष-समुद्र से उठती तरंग-सी बाण-वृष्टि द्वारा वानर-सेनाओं को मथकर चूर-चूर कर दूँगा।
Verse 15
व्याकोशपद्मवक्त्राणिपद्मकेसरवर्चसाम् ।अद्ययूथतटाकानिगजवत्प्रमथाम्यहम् ।।6.96.15।।
जिन वानरों के मुख पूर्ण-विकसित कमलों के समान हैं और जिनकी कांति कमल-केसर जैसी है, उनके दल-रूपी सरोवरों को आज मैं हाथी की भाँति रौंदकर उजाड़ दूँगा।
Verse 16
सशरैरद्यवदनैस्सङ्ख्येवानरयूथपाः ।मण्डयिष्यन्तिवसुधांसनालैरिवपङ्कजैः ।।6.96.16।।
आज संग्राम में बाणों से बेधे हुए मुखों वाले वानर-यूथपति, डंठल सहित कमलों की भाँति, पृथ्वी को अलंकृत करेंगे।
Verse 17
अद्ययूथप्रचण्डानांहरीणांद्रुमयोधिनाम् ।मुक्तेनैकेषुणायुद्धेभेत्स्यामि च शतंशतम् ।।6.96.17।।
आज युद्ध में मैं एक-एक छोड़े हुए बाण से वृक्षों से युद्ध करने वाले उन प्रचण्ड वानरों के सैकड़ों-सैकड़ों को बेध डालूँगा।
Verse 18
हतोभर्ताहतोभ्रातायासां च चतनयोहतः ।वधेनाद्यरिपोस्तासांकरोम्यश्रुप्रमार्जनम् ।।6.96.18।।
जिन स्त्रियों का पति मारा गया है, भाई मारा गया है और पुत्र भी मारा गया है—शत्रु का वध करके आज मैं उनके आँसू पोंछ दूँगा।
Verse 19
अद्यमद्भाणनिर्भिन्नैःप्रकीर्णैर्गतचेतनैः ।करोमिवानरैर्युद्धेयत्नावेक्ष्यतलांमहीम् ।।6.96.19।।
आज युद्ध में मैं अपने बाणों से विदीर्ण, चारों ओर बिखरे और प्राणहीन वानरों से पृथ्वी को ऐसा भर दूँगा कि भूमि का तल देखना भी कठिन हो जाए।
Verse 20
अद्यगोमयवोगृध्राश्चये च मांसाशिनोऽपरे ।सर्वांस्तांस्तर्पयिष्यामिशत्रुमांसैश्शरार्दितैः ।।6.96.20।।
आज मैं गीदड़ों, गिद्धों और अन्य मांसाहारियों—सभी को—बाणों से विदीर्ण शत्रुओं के मांस से तृप्त कर दूँगा।
Verse 21
कल्प्यतांमेरथंशीघ्रंक्षिप्रमानीयतांधनुः ।अनुप्रयान्तुमांयुद्धेयेऽत्रशिष्टानिशाचराः ।।6.96.21।।
मेरा रथ तुरंत तैयार किया जाए; मेरा धनुष भी शीघ्र लाया जाए। यहाँ जो निशाचर शेष हैं, वे युद्ध में मेरे पीछे-पीछे चलें।
Verse 22
तस्यतद्वचनंश्रुत्वामहापार्श्वोऽब्रवीद्वचः ।बलाध्यक्षान् स्थिथांस्तत्रबलंसंत्वर्यतामिति ।।6.96.22।।
उसकी बात सुनकर महापार्श्व ने वहाँ खड़े सेना-नायकों से कहा— “सेना को शीघ्र तैयार करो!”
Verse 23
बलाध्यक्षास्तुसम्रब्दाराक्षसांस्तान् गृहेगृहे ।चोदयन्तःपरिययुर्लङ्कांलघुपराक्रमाः ।।6.96.23।।
तब सेना-नायक तत्पर होकर, शीघ्र पराक्रम करने वाले, लंका में घर-घर घूमते हुए उन राक्षसों को जगाकर (एकत्र होने को) प्रेरित करने लगे।
Verse 24
ततोमुहूर्तान्निष्पेतूराक्षसाभीमदर्शनाः ।नदन्तोभीमवदनानानाप्रहरणैर्भुजैः ।।6.96.24।।असिभिःपट्टसै: शूलैर्गदाभिर्मुसलैर्हलैः ।शक्तिभिस्तीक्ष्णधाराभिर्महद्भि: कूटमुद्गरैः ।।6.96.25।।यष्टिभिर्विमलैश्चक्रैर्निशितैश्चपरश्वथै: ।भिन्दिपालैःशतघ्नीभिरन्यैश्चापिवरायुधैः ।।6.96.26।।
फिर थोड़ी ही देर में भयानक रूप वाले राक्षस बाहर निकल पड़े। वे विकराल मुख वाले, गर्जना करते हुए, भुजाओं में नाना प्रकार के शस्त्र धारण किए हुए थे।
Verse 25
ततोमुहूर्तान्निष्पेतूराक्षसाभीमदर्शनाः ।नदन्तोभीमवदनानानाप्रहरणैर्भुजैः ।।6.96.24।।असिभिःपट्टसै: शूलैर्गदाभिर्मुसलैर्हलैः ।शक्तिभिस्तीक्ष्णधाराभिर्महद्भि: कूटमुद्गरैः ।।6.96.25।।यष्टिभिर्विमलैश्चक्रैर्निशितैश्चपरश्वथै: ।भिन्दिपालैःशतघ्नीभिरन्यैश्चापिवरायुधैः ।।6.96.26।।
तब रावण की आज्ञा से सेना-नायक ने शीघ्र ही सारथि सहित, आठ घोड़ों से जुता हुआ, वेगवान रथ ला दिया। तब अपने तेज से दिप्त, भयानक रावण उस पर चढ़ गया।
Verse 26
ततोमुहूर्तान्निष्पेतूराक्षसाभीमदर्शनाः ।नदन्तोभीमवदनानानाप्रहरणैर्भुजैः ।।6.96.24।।असिभिःपट्टसै: शूलैर्गदाभिर्मुसलैर्हलैः ।शक्तिभिस्तीक्ष्णधाराभिर्महद्भि: कूटमुद्गरैः ।।6.96.25।।यष्टिभिर्विमलैश्चक्रैर्निशितैश्चपरश्वथै: ।भिन्दिपालैःशतघ्नीभिरन्यैश्चापिवरायुधैः ।।6.96.26।।
वे दण्डों, उज्ज्वल चक्र-शस्त्रों और तीक्ष्ण परशुओं सहित—भिन्दिपालों, शतघ्नियों तथा अन्य उत्तम आयुधों से सुसज्जित होकर आगे बढ़े।
Verse 27
अथानयद्बलाध्यक्षस्सत्वरोरावणाज्ञया ।द्रुतंसूतसमायुक्तंयुक्ताष्टतुरगंरथम् ।आरुरोहतदाभीमोदीप्यमानंस्वतेजसा ।।6.96.27।।
तब रावण की आज्ञा से सेना-नायक ने शीघ्र ही सारथि सहित, आठ घोड़ों से जुता हुआ, वेगवान रथ ला दिया। तब अपने तेज से दिप्त, भयानक रावण उस पर चढ़ गया।
Verse 28
ततःप्रयातस्सहसाराक्षसैर्भहुभिर्वृतः ।।6.96.28।।रावणःसत्त्वगाम्भीर्याद्दारयन्निवमेदिनीम् ।
तत्पश्चात रावण अनेक राक्षसों से घिरा हुआ सहसा चल पड़ा; अपने गर्वित पराक्रम और गम्भीर दृढ़ता के भार से मानो पृथ्वी को चीरता जा रहा था।
Verse 29
रावणेनाभ्यनुज्ञातौमहापार्श्वमहोदरौ ।विरूपाक्षश्चदुर्धर्षोरथानारुरुहुस्तदा ।।6.96.29।।
रावण की अनुमति पाकर महापार्श्व और महोदर तथा दुर्धर्ष वीरूपाक्ष भी तब अपने-अपने रथों पर चढ़ गए।
Verse 30
तेतुहृष्टाविवर्धन्तोभिन्दन्तइवमेदिनीम् ।नादंघोरंविमुञ्चन्तोनिर्ययुर्जयकाङ्क्षिणः ।।6.96.30।।
वे हर्षित होकर गर्व से बढ़ते हुए, मानो पृथ्वी को चीरते हों, भयंकर गर्जना करते हुए विजय की अभिलाषा से बाहर निकल पड़े।
Verse 31
ततोयुद्धायतेजस्वीरक्षोगणबलैर्वृतः ।निर्ययावुद्यतधनुःकालान्तकयमोपमः ।।6.96.31।।
तब तेजस्वी रावण, राक्षस-सेनाओं के बल से घिरा हुआ, धनुष उठाए युद्ध के लिए निकला—मानो प्रलयकाल का यम हो।
Verse 32
ततःप्रजविताश्वेनरथेन स महारथः ।द्वारेणनिर्ययौतेनयत्रतौरामलक्ष्मणौ ।।6.96.32।।
फिर वह महारथी अत्यन्त वेगवान अश्वों से जुते रथ पर, उसी द्वार से बाहर निकला जहाँ राम और लक्ष्मण स्थित थे।
Verse 33
ततोनष्टप्रभःसूर्योदिशश्चतिमिरावृताः ।द्विजाश्चनेदुर्घोराश्चसञ्चचाल च मेदिनी ।।6.96.33।।
तब सूर्य की प्रभा मानो लुप्त हो गई; दिशाएँ अंधकार से ढँक गईं; पक्षी भयावह स्वर में चिल्लाए और पृथ्वी भी काँप उठी।
Verse 34
ववर्षरुधिरंदेवश्चस्खलुश्चतुरङ्गमाः ।ध्वजाग्रेन्यपतद्गृध्रोविनेदुश्चाशिवाःशिवाः ।।6.96.34।।
आकाश मानो रक्त-वृष्टि करने लगा; घोड़े लड़खड़ाए; ध्वज के अग्रभाग पर गिद्ध आ बैठा; और अशुभ सियारों ने करुण-भयावह हुंकार भरी।
Verse 35
नयनंचास्फुरद्वामंवामोबाहुरकम्पत ।विवर्णवदनश्साकतिंचिदभ्रश्यतस्वनः ।।6.96.35।।
उसकी बाईं आँख फड़क उठी, बायाँ भुजा काँपने लगी। मुख का वर्ण फीका पड़ गया और स्वर भी कुछ टूटकर भर्राने लगा॥
Verse 36
ततोनिष्पततोयुद्धेदशग्रीवस्यरक्षसः ।रणेनिधनशंसीनिरूपाण्येतानिजज्ञिरे ।।6.96.36।।
तब युद्ध के लिए निकलते हुए राक्षस दशग्रीव के लिए रण में मृत्यु का संकेत देने वाले ये अपशकुन-रूप प्रकट हुए॥
Verse 37
अन्तरिक्षात्पपातोल्कानिराघतसमनिर्घास्वना ।विनेदुरशिवागृध्रावायसैरभिमिश्रिताः ।।6.96.37।।
आकाश से उल्का गिरी, बिना टकराए भी मेघ-गर्जना-सा शब्द हुआ। गिद्धों और कौवों के साथ मिली अशिवा (सियारिनियों) की अशुभ ध्वनियाँ गूँज उठीं॥
Verse 38
एतानचिन्तयन्घोरानुत्पातान्समवस्थितान् ।निर्ययौरावणोमोहाद्वधार्थंकालचोदितः ।।6.96.38।।
उत्पन्न हुए इन घोर उत्पातों पर विचार न करते हुए, मोहवश और काल से प्रेरित रावण अपने वध की ओर निकल पड़ा॥
Verse 39
तेषांतुरथघोषेणराक्षसानांमहात्मनाम् ।वानराणामपिचमूर्युद्धायैवाभ्यवर्तत ।।6.96.39।।
उन महात्मा राक्षसों के रथों के गर्जन से वानरों की सेना भी आगे बढ़ चली—युद्ध के लिए ही सजग होकर॥
Verse 40
तेषांतुतुमुलंयुद्धंबभूवकपिरक्षसाम् ।अन्योन्यमाह्वयानानांक्रुद्धानांजयमिच्छताम् ।।6.96.40।।
तब वानरों और राक्षसों के बीच घोर युद्ध छिड़ गया। दोनों पक्ष क्रोध से एक-दूसरे को ललकारते हुए विजय की कामना कर रहे थे।
Verse 41
ततःक्रुद्धोदशग्रीवश्शरैःकाञ्चनभूषणैः ।वानराणामनीकेषुचकारकदनंमहत् ।।6.96.41।।
तब क्रोधित दशग्रीव ने स्वर्णाभूषित बाणों से वानरों की सेनापंक्तियों में महान संहार मचा दिया।
Verse 42
विकृत्तशिरसःकेचिद्रावणेनवलीमुखाः ।केचिद्विच्छिन्नहृदयाःकेचिच्छ्रोत्रविवर्जिताः ।।6.96.42।।
रावण के हाथों कुछ वानरों के सिर विकृत हो गए, कुछ के हृदय विदीर्ण हो गए और कुछ कानों से वंचित कर दिए गए।
Verse 43
निरुच्छवासाहताःकेचित्केचित्पार्श्वेषुदारिताः ।केचिद्विभिन्नशिरसःकेचिच्चक्षुर्विनाकृताः ।।6.96.43।।
कुछ आहत होकर निःश्वास-रहित (मृत) हो गए, कुछ के पार्श्व फाड़ दिए गए, कुछ के सिर चूर-चूर हो गए और कुछ की आँखें निकाल दी गईं।
Verse 44
जहाँ-जहाँ रथ पर चढ़ा दशानन क्रोध से नेत्र फैलाए उलटता हुआ बढ़ा, वहाँ-वहाँ वानर-यूथपति उसके बाणों के वेग को सह न सके।
The pivotal action is Rāvaṇa’s decision to escalate personally into battle despite civic grief and repeated death-portents. Ethically, the chapter frames a leadership failure: policy driven by revenge and rage overrides prudence, counsel, and the interpretive warnings of nimittas (omens).
The sarga emphasizes that krodha and moha distort perception: even clear indicators of impending ruin are dismissed when ego and retaliation dominate. It also illustrates epic causality—adharma intensifies violence yet simultaneously accelerates self-destruction.
Laṅkā is presented as a city in collective distress, heard “house after house,” underscoring war’s social footprint. The battlefield threshold is marked by chariot sounds and mass sortie, while the wider cosmos (sun, directions, meteors) functions as a cultural omen-field validating the epic’s moral universe.
Read Valmiki Ramayana in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.